• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 12 July, 2019 01:12 PM | Total Read Count 394
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हूक से न राम हैं और न रामराज्य!

हिंदू मन की आस्था और दिमागी हूक ने इस्लाम के आगे पलायन, प्रतिकार और विकल्प के रूप में राम व रामराज्य को जितने रूपों, जितने नारों, जैसे संघर्षों की तस्वीरों में उकेरा है वह दुनिया के धर्मों में अपना अनूठा मामला है। मैं बचपन में राम-सीता के खड़े व सौम्य- आदर्श रूप के फोटो देखा करता था। गांधी के बोले गए ‘हे राम’ शब्द का भी जेहन में भाव था। रामलीलाएं देखते हुए राम कथा के चित्र थे। फिर विश्व हिंदू परिषद ने रामनवमी मनवाना शुरू किया, आडवाणी की रथयात्रा निकली तो गठीले शरीर वाले लड़ाके के रूप में धनुष चलाते, रौद्र रूप में राम के फोटो दिखे। सोचें कि पिछले सौ सालों में राम के हवाले गांधी और उनकी कांग्रेस, करपात्री और उनकी रामराज्य परिषद्, संघ-आडवाणी और उनकी भाजपा के राम उपयोग, अलग-अलग तस्वीरें, फोटो की मूल बात क्या है? अपना मानना है सबके पीछे एक हिंदू हूक है राम को मनवाने की, अपने राम के राज को लाने की। फालतू बात है कि गांधी का रामराज्य विचारना धार्मिक नहीं था। सेकुलर था। 26 जनवरी 1947 की प्रार्थना सभा में कहा उनका यह वाक्य कोट होता रहा है कि कोई यह समझने की भूल न करे कि रामराज्य का अर्थ है हिंदुओं का शासन। मैं खुदाई राज चाहता हूं, जिसका अर्थ है धरती पर परमात्मा का राज। अपना तर्क है कि यदि यहीं बात थी तो उन्होंने आजादी के साथ जिन्ना के जरिए दिल्ली में खुदाई राज क्यों नहीं होने दिया? क्यों नहीं गांधी ने कांग्रेस के आगे जिन्ना को पीएम, नियंता बनने देने की जिद्द नहीं की? क्यों धर्म के आधार पर देश का विभाजन होने दिया?  

यहां मामला फिर हिंदू डीएनए का है। हम हकीकत के आगे पलायनी, मध्यमार्गी शुतुरमुर्गी जीवन जीते हैं। बात को सन् 1300 याकि स्वामी रामानंद, तुलसी, कबीर और सोमनाथ, अयोध्या, काशी, मथुरा में मंदिर विध्वंस वाले अंधकार याकि मध्यकाल की और ले जाया जाए। तब हिंदू हैरान-परेशान-किंकर्तव्यविमूढ़ थे। लुटेरे आ बैठे। मंदिर टूटे। हिंदू राजे-रजवाड़े मनसबदार बने। हिंदू फौज बिखर गई। सो, दीन-हीन-लुटा-पीटा हिंदू जाए तो जाए कहां? ऐसे वक्त में दक्षिण के आलवार संतों, रामानुजाचार्य, स्वामी रामानंद का सुझाया भक्ति का मार्ग घर-घर पहुंचा। संत वाणी हुई कि राज, राजा, राजनीति छोड़ो। तुलसीदासजी का तर्क घर-घर पहुंचा कि ‘कोऊ नृप हो हमें का हानी’। हमें राज और राजा से क्या लेना देना। हमें तो रामजी जैसे रखेंगे वैसे रहेंगे। तब वह रामानुजाचार्य, रामानंद, तुलसी, नाभादास, वल्लभाचार्य, समर्थ रामदास का लोक भाषा से लोक मन को संवाद (रामचरितमानस से लेकर रामलीलाओं के प्रायोजन) था, जिसमें अयोध्या के राजा राम का रामराज्य आम हिंदू में एक शक्ल, एक तस्वीर बनाता गया। पलायनवादी दीनता में तब भी राम की तस्वीर याकि राम का उपयोग दो तरह से हुआ। स्वामी रामानंद के एक शिष्य कबीर ने सगुणोपासक गुरू से मंत्र ले कर राम को खुदाई रूप में देखा तो दूसरे शिष्य तुलसी ने राम को हिंदुत्व की धारा के अंदाज में पूजनीय बनवाया। 

सो, सोच सकते हैं कि कबीर के राम गांधी के राम और तुलसी के राम करपात्री के राम! पर दोनों ने प्रायोजन विशेष से आराध्य तो राम को ही बनाया। दोनों का यदि राम के पीछे ही दीन-हीन-लुटे-पीटे हिंदू का भक्ति भाव जोड़ना है तो वह इस आस्था, चाहना से है कि रामजी कृपा करो। विधर्मी से मुक्ति का, रामराज्य का आशीर्वाद दो। तभी राम की भक्ति दरअसल गुलामी को भूलते हुए, राजनीतिक दीनता में जीने का तरीका था तो मन की यह हूक भी लिए हुए था कि अय़ोध्या में, भारत में राम और रामराज्य की पुनर्स्थापना होनी है।    

मध्यकाल हिंदुओं का भक्ति काल था। विस्तार के साथ कह सकते हैं कि गजनवी के बार-बार हमले से लेकर मुगल-अंग्रेज के 12 सौ साल के कालखंड में गुलामी से हिंदुओं की ज्यों-ज्यों राज्येंद्रियां, पुरुर्षाथ और साहस कमजोर होता गया त्यों-त्यों हमारी भक्ति बढ़ती गई। भक्ति व अंधविश्वासों में भटकते गए। नतीजतन बुद्धि और कर्म भुला बैठे, गंवा बैठे। हमारा जीना भेड़ियाधसान, शुतुरमुर्गी प्रतिक्रिया और जुगाड़ में जीना हो गया! हां, गजब बात है जो तुलसीदास ने भी अपने वक्त में यह बूझा था कि अधिक भक्ति और भक्तों का मतलब भेड़ जैसी भोली जनता भी है। ‘दोहावली’ में उनका एक यह दोहा है- तुलसी भेड़ी की धंसनि, जड़ जनता सनमान। उपजत ही अभिमान भो, खोवत मूढ़ अपान।। भोली जनता (मैं यहा भक्त जनता कहूंगा) तो भेड़ियाधसान के समान है - एक भेड़ जहां गिरी, वहीं सब गिरने लगती हैं। इसलिए ऐसी जनता से मिली मान-बड़ाई भी मिथ्या है। इसे पाकर जिसके मन में अहंकार उत्पन्न होता है, वह मनुष्य मूढ़तावश अपना आपा खो बैठता है और अपने पद से गिर जाता है। (मोदीजी और मोदी भक्तों को विचार करना चाहिए!) 

बहरहाल, इस सबके बाद समकालीन मोटी हकीकत पर विचार करें। पिछले 72 सालों की आजादी का यह अनुभव है कि भक्तों की आस्था और राम व रामराज्य की हूक के बावजूद न गांधी के रामराज्य की तस्वीर भारत में मूर्त रूप पा सकी तो न करपात्री महाराज की रामराज्य परिषद् या वाजपेयी-आडवाणी राज और मोदी-भाजपा का राज किसी भी रूप में रामराज्य की भारत यात्रा बना। इसलिए क्योंकि भोला हिंदू भेड़ियाधसान है तो उसका राजा भी भेड़ियाधसान है। ऐसा इसलिए क्योंकि आस्था व भक्ति के चलते बुद्धि और कर्म को भारत से निर्वासन, वनवास मिला हुआ है। 

जरा समग्रता से हिंदू की बुद्धि और कर्म के पिछले सौ सालों पर विचार हो। भारत के अधिकांश महान विचारकों ने, आइडिया ऑफ इंडिया बनवाने वालों में (इन्हीं का व्यवहार दशा-दिशा बनवाता है) कितनों ने स्वतंत्र बुद्धिवाद के अनुष्ठान में भारत के विचार, आइडिया गुंथे? भारत को समझने, खोजने में यात्राएं गांधी, नेहरू, मोदी सबने की लेकिन किसी ने आस्था, हूक में सदियों जीती आई भोली, भेड़ियाधसान जनता को समझना नहीं चाहा। यदि समझा होता तो आइडिया ऑफ इंडिया वह नहीं होता जो आज है। न ही मंदिर आंदोलन या जयश्री राम के नारे से मुसलमान को डराने, हिंदू को बहकाने की जरूरत होती। न ही पश्चिम की मार्क्सवादी, समाजवादी, उदारवादी, बाजारवादी, नारीवादी विचारधाराओं के भक्त बन कर, इनके वैचारिक खांचों में (उनकी सरंचनात्मकता में) अपना इतिहास, साहित्य, पाठ्यपुस्तकें या विमर्श-नैरेटिव लिखा-बना होता।  

हां, भारत की हकीकत असलियत में आयातित विचार, चुराए टैंपलेट, चुराए आइडिया के बने-बनाए सांचों में अबुद्धि के देशी कुम्हारों की कुम्हारगिरी, कुलीगिरी है। अपनी तासीर में, आस्था और हूक में विचार कर, राष्ट्र-राज्य-समाज का कोई स्वतंत्र मॉडल अपना नहीं है जो राष्ट्र-राज्यों में बाहरी योगदान के बीच भी जापान, चीन, इजराइल या यूरोपीय देशों के जीवन में व्याप्त सौंध जैसा कुछ मौलिक लिए हुए हो। 

मैं भटक गया हूं। मूल बात है गांधी-नेहरू के वक्त या मोदी-शाह के वक्त में ‘हे राम’ और ‘जयश्री राम’ आदि के तमाम राम अर्थ- रूप में कितनी ही ताकत पा जाएं, उससे हिंदू की, भारत की सिद्धि इसलिए संभव नहीं है क्योंकि बुद्धिवाद, कर्मवाद के बिना सब भेड़ियाधसान है। लोगों का मूर्ख बनना है और बनाना है। 

अब यहीं इतिश्री! ‘मां दुर्गा’ बनाम ‘जयश्री राम’ पर विचार करते-करते मैं कहां से कहां भटक लिया। पुरानी किताबों के पन्ने पलट गए। पर लिखते हुए स्वांतः सुखाय मजा भी आया। सचमुच हिंदू डीएनए के तंतुओं को स्वतंत्र विचार में बांधना चुनौतीपूर्ण है तो मजेदार भी।

 

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