• [EDITED BY : हरि शंकर व्यास] PUBLISH DATE: ; 03 April, 2019 06:47 AM | Total Read Count 446
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महिलाओं में क्यों मोदी की बात?

सोचें पांच साल में सर्वाधिक रोने वाला कौन रहा? तो जवाब व्यापारी-कारोबारी, बेरोजगार नौजवान का नहीं बनता है, बल्कि भारत की महिलाओं का बनता है। इसलिए क्योंकि भारत की हर गृहिणी की बचत को नोटबंदी ने काला बनवाया। नोटबंदी और फिर पैसे की किल्लत, महंगाई में महिलाओं का जीना मुश्किल हुआ। गृहिणियों की बचत, उनके पैसे को जैसे छीना गया, उनके मान-सम्मान के साथ जैसा जो खेल हुआ वैसा लक्ष्मी और लक्ष्मी की चंचलता के साथ पहले कभी नहीं हुआ। तभी हिसाब से गृहिणियों को, महिलाओं को नोटबंदी का अनुभव नहीं भूला हुआ होना चाहिए। मगर महिलाओं में वह गुस्सा दिख नहीं रहा है। विपक्ष और खास कर प्रियंका गांधी भी महिलाओं के गुस्से को उभारने, उन्हें मोदी राज में हुए छल का अनुभव याद कराने की कोशिश में नहीं हैं। उलटे हल्ला है कि महिलाएं मोदी की दिवानी हैं।  

मैं भी फीडबैक की हकीकत में मान रहा हूं कि हिंदू परिवारों में, उत्तर भारत के शहरों के मध्य-गरीब वर्ग के घरों में महिलाओं का मूड मोदी की मंशा पर भरोसे का है। जैसा गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी के प्रति गुजराती महिलाओं में भाव हुआ करता था वैसा उत्तर भारत में बना दिख रहा है। यों गंगा-अयोध्या यात्रा और यूपी दौरे में प्रियंका गांधी को ले कर महिलाओं में कौतुक होने की फीडबैक मिली है। बावजूद इसके मोटे तौर पर पुलवामा, एयर स्ट्राइक और नरेंद्र मोदी के जुमलों के भभकारों में महिलाओं में भाजपा के प्रति पॉजिटिव रूख के संकेत हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, बिहार आदि में मोदी राज के खिलाफ महिलाओं में वह खुन्नस नहीं है, जो नोटबंदी में बचत के पैसे लूटे जाने के बाद गृहिणियों की बातों में झलका करती थी। मतलब नोटबंदी, महंगाई, पैसे की किल्लत का गुस्सा नहीं बोल रहा है।  

भला क्यों? इसका कारण अपने को ज्यादा समझ नहीं आ रहा है। क्या उज्ज्वला योजना या शौचालय, प्रधानमंत्री आवास योजना या महिलाओं-कन्याओं की अलग-अलग योजनाओं के पैसे के खातों में जाने जैसी बातों से महिलाओं में (खास कर गरीब और ग्रामीण क्षेत्र में) जादू बना है? मतलब क्या सब्सिडी के सीधे ट्रांसफर से घर-परिवारों की बातचीत, चखचख, नैरेटिव में मोदी राज की वाह है? यदि ऐसा है तो इसे तब मोदी सरकार के पांच सालों की सच्ची उपलब्धि मानना चाहिए। अलग-अलग कई तरीकों, छोटी-छोटी योजनाओं से यदि महिलाओं को सचमुच लाभ मिला है और उससे भरोसा बना है तब तो मोदी सरकार का महिला वोटों का अधिकार बनता है? 

तब अर्थ यह है कि यूथ, जहां महज हवाबाजी से जमूरा बना हुआ है वहीं महिलाओं में नरेंद्र मोदी के प्रति रूझान में नोटबंदी का अनुभव गायब है और योजनाओं का उन पर ठोस असर है। मगर यह बात ज्यादा गले इसलिए नहीं उतरती है क्योंकि कुछ भी हो नोटबंदी, महंगाई, काम-धंधे में कमी, पेट्रोल-डीजल जैसी मार का लगातार अनुभव भला कैसे भुलाया जा सकता है? नोटबंदी ने महिलाओं को और खास कर मध्यवर्ग की महिलाओं को जितना रूलाया है, बाद की महंगाई और आर्थिक बदहाली में घरों में तकलीफ का जैसा नैरेटिव रहा है उस सबकी हकीकत में कैसे नरेंद्र मोदी की वह इमेज बन सकती है, जैसी कभी इंदिरा गांधी के वक्त महिलाओं में इंदिरा गांधी के प्रति मौन भक्ति थी। 

मैं छोटी-छोटी बातों से बड़ा अर्थ निकालता हूं। दिल्ली में संसद भवन की और जाते इंदिरा गांधी स्मारक पर दर्शकों की भीड़ में महिलाओं की बहुसंख्या देख हमेशा सोचता हूं कि इंदिरा गांधी ने क्या खूब अमिट छाप बनाई जो इंदिरा गांधी के घर को देखने का महिलाओं में इतना कौतुक। (जान लें दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्रियों के स्मारकों में सिर्फ और सिर्फ इंदिरा गांधी स्मारक पर भीड़ उमड़ी रहती है। बाकि किसी के यहां नहीं) वजह इंदिरा गांधी की शक्तिमान, दुर्गा इमेज और गरीब के लिए सबसे लड़ने वाली धारणाएं हैं। तभी इस संदर्भ में सवाल बनता है कि इंदिरा गांधी के महिलाओं पर स्थायी जादू की हकीकत को कांग्रेस, सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका गांधी क्यों नहीं समझ पाए हैं? हिसाब से सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी को महिलाओं की राजनीति पर ही, महिलाओं के अनुभव पर पूरा फोकस करना चाहिए था। सोनिया गांधी अकेली नेता हैं, जो लगातार महिलाओं की राजनीति में आरक्षण की जिद्द बनाए रही हैं। लेकिन कांग्रेस की दस सालों की राजनीति का निचोड़ है जो महिला वोटों को ले कर किसी तरह का प्रोपेगेंडा फोकस नहीं बनाए रखा गया। जबकि याद करें, सोचें कि एक उज्ज्वला योजना को नरेंद्र मोदी ने किस कदर बेचा है। 

हां, नोटबंदी का अनुभव गृहिणियों, महिलाओं के मान-सम्मान पर हथौड़ा था। उनकी बचत को काला बनाते हुए नरेंद्र मोदी ने उसे जबरदस्ती निकलवाया। उसने घर-परिवार में गृहिणियों पर चोरी छिपे पैसा मारने, जमा रखने का लांछन बनवाना। उस नाते उज्ज्वला की होर्डिग में या रेडियो प्रचारबाजी में महिलाओं के मोदी द्वारा ख्याल रखने की बात घाव पर नमक छिड़कने माफिक है। लेकिन इस पहलू पर विपक्ष न तो सोचता दिख रहा है और न महिलाओं को अनुभव याद कराया जा रहा है कि उनके पैसे, उनकी आर्थिक सुरक्षा पर नोटबंदी से कैसे हथौड़े मारे गए। घर-घर में उन्हें कैसे चोर बनाया गया।   

सो, महिलाओं का पांच साला अनुभव, नरेंद्र मोदी के प्रति महिलाओं की सोच और चुनावी नैरेटिव का मोटा निचोड़ है कि महिलाओं पर मोदी का ध्यान है लेकिन विपक्ष का नहीं। विपक्ष ने किसान, बेरोजगारी, राफेल आदि के चलते महिलाओं का जीना रहा बेहाल का मसला जब आगे बढ़ाया नहीं तो उज्ज्वला जैसी छोटी-छोटी बातों के सतत प्रोपेगेंडा से महिलाओं के अनुभव की हकीकत दबनी ही थी। 

तभी सोनिया गांधी, प्रियंका, मायावती, ममता बनर्जी आदि से महिला वोटों का नैरेटिव नहीं बन पा रहा है। महिलाओं में राहुल और प्रियंका के लिए स्वंयस्फूर्त जोश उमड़ता नहीं दिख रहा है। मतलब कांग्रेस हो या बाकी विपक्षी पार्टियों सभी में महिला वोटों को ले कर वैसा कोई बारीक फोकस, माइक्रो मैनेजमेंट नहीं है जैसा मोदी-शाह-योगी ने बना रखा है। अपनी थीसिस है कि नरेंद्र मोदी के धर्म-कर्म के फोटोशूट से भी महिलाएं रीझी हुए हो सकती हैं तो योगी-शाह की इन बातों पर भी हिंदू महिलाओं का मनोविज्ञान पका हुआ हो सकता है कि बहू-बेटियों की सुरक्षा किससे है? 

मतलब अनुभव, भावना और मनोविज्ञान के पहलुओं में महिला वोटों का मसला बहुत गहरा है। लेकिन उस गहराई के माफिक महिला वोटों के आगे मुद्दे रखने, विचार करवाने, प्रचार की कोशिशें सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी की भी नहीं है तो मायावती और ममता बनर्जी की भी नहीं हैं। तभी महिलाओं को ले कर ख्याल बना हुआ है कि वे चुपचाप मोदी के लिए वोट करेंगी। निश्चित ही उत्तर भारत में यूथ के बाद महिलाओं की पहेली विपक्ष और कांग्रेस की कमजोरी है।

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