• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 08 July, 2019 12:05 AM | Total Read Count 565
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‘मां दुर्गा’ या ‘जय श्री राम’

अमर्त्य सेन ने सत्य बताया कि 'मां दुर्गा' बांग्ला जीवन में सर्वव्याप्त हैं और ‘जय श्री राम’ नहीं। इस वाक्य ने दिमाग में कई विचार पैदा किए। सवाल है हम सनातनी हिंदू के मूल, पुराण, जाग्रत प्राच्य, मध्य और आधुनिक इतिहास, उसके मनोविश्व में शिव परिवार अधिक आराध्य रहा है या विष्णु परिवार? भारत की सभ्यता-संस्कृति में शैव बनाम वैष्णव के द्वंद ने हिंदू की सनातनी जड़ों को कैसे प्रभावित किया है? हिंदू के धर्म-अध्यात्म के सत्व-तत्व में, दर्शन-शास्त्रार्थ, चिंतन-मनन में शैव धारा अपनी पहचान, अपना डीएनए है या हम वैष्णव धारा में अधिक रंगे हुए हैं? फिर आज के या आने वाले वक्त को ले कर सवाल है कि जयश्री राम से 21वीं सदी के भारत का बेड़ा कैसे पार लगेगा? जयश्री राम का आज के संदर्भ में क्या मतलब हैं? 

मामला बहुत पेचीदा है। ‘मां दुर्गा’ बनाम ‘जयश्री राम’ के दो शब्दों की खुर्दबीन से हिंदू सभ्यता-संस्कृति, धर्म-अध्यात्म और लोक व्यवहार को बूझना डीएनए की रिसर्च से अधिक जटिल काम है। सर्वप्रथम जानें कि ‘मां दुर्गा’ मतलब शिव परिवार (शिव, पार्वती-दुर्गा, गणेश, हनुमान) याकि शैव परंपरा है। उधर ‘जयश्री राम’ मतलब विष्णु परिवार (उनके विभिन्न अवतार राम, कृष्ण) की वैष्णव पंरपरा है। यह मोटा भेद धर्म-अध्यात्म, अपने पुराण-इतिहास की लौकिक-इहलौकिक मान्यताओं, झगड़ों, द्वंद का आधार रहा है। किसे ज्यादा पूजा जाए, इस बात पर हिंदुओं के शास्त्रार्थ में बहुत झगड़े हुए हैं। कई पुराण लिखे गए हैं। कई मान्यताएं बनी हैं। कई व्यवस्थाएं हुई हैं। शैव अपने मंदिर में विष्णु, कृष्ण या राम की मूर्ति रखें और इतने दिनों में एक बार उनकी पूजा हो या वैष्णव मंदिर में शैव परिवार के भगवान की मूर्ति स्थापति कर उनकी पूजा का वक्त, विधि-विधान सब कुछ शास्त्रार्थों से तय हुआ है। 

बहरहाल, अपना मानना है कि आदि हिंदू के ऋषि-मुनियों के आदि चिंतन-मनन में प्रकृति याकि ब्रह्म- ब्रह्मांड के कौतुक में प्रकृतिजन्य हवा, पानी, प्रकृति के देवताओं इंद्र, वरूण (उन्ही में विष्णु) आदि की वेद स्तुति रही तो प्रकृति-मानव रचना पर मनन के क्रम में लिंग पूजा का धर्म-कर्म बना। इसे मोहनजोदड़ो में प्राप्त शिव आकार व बैल-पशु पूजा स्मृति चिन्ह से भी समझ में आने वाली शैव परंपरा के बीज से बूझा जा सकता है। यह अलग बात है कि वेद और शिव की आध्यात्मिकता को दो सौ साल पहले विलियम जोन्स आदि पश्चिमी विचारकों ने एक और एक ग्यारह वाली एप्रोच में कहीं की ईंट, कही की मिट्टी (इस पर मैं डीएनए के मौजूदा साक्ष्यों के साथ कभी लिखूंगा।) की तुकबंदी में आर्य-अनार्य की फालतू थीसिस बनाई। 

अपना मानना है कि आदि हिंदू की शास्त्रार्थ परंपरा में शैव बनाम वैष्णव, वैदिक बनाम लौकिक लोक देवता के विचार-मनन-अध्यात्म की दो समानांतर धाराओं की निरंतरता कई सनातनी साक्ष्य लिए हुए है।  यह बात आगे के जाग्रत इतिहास के अलग-अलग मोड़ के द्वंदों से भी जाहिर होती है। इसमें पहली बात निर्णायक तौर पर यह स्थापित है कि हिंदू के जीवन में उसके आराध्य देवता-ईश्वर के नाते मोहनजोदड़ो से ले कर आज तक के प्रमाण में शिव और उनके परिवार की पूजा की प्रधानता प्रामाणिक है। शिव भक्त लोक व्यवहार के बीच, उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया में ही जैन और बौध धर्म उत्पन्न हुए और जब देश बुद्धम् शरणम् गच्छामि हुआ तो शैव ज्यादा कन्वर्ट हुए तो कालांतर में शैन पुनर्जागरण में शैव बनाम बौद्धों में शास्त्रार्थ हुआ, हिंसा हुई और फिर शैव वर्चस्व बना। लेकिन तब कि यह बात ध्यान रखने वाली है कि उस वक्त भी ब्राह्यणों ने बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार करार दे उनकी पूजा की वैसी ही मान्यता बनवानी चाही, जिसमें वैष्णव भक्तिभाव रंगा हुआ है।  

मतलब मैं सनातनी हिंदू के तमाम अवतारों को उस दूसरी धारा का पर्याय मानता हूं, जो शिव की स्थायी-सनातनी, आदि लोक आराधना के समानांतर अलग रही और साथ-साथ बढ़ती गई। इसलिए शैव बनाम वैष्णव धारा और उसके द्वंद की गहराई के साथ धर्म-अध्य़ात्म, संस्कृति और सभ्यता के कई उलझे, गहरे बीज छुपे हुए हैं। 

मूल बात पर लौटें। मां दुर्गा, मां पार्वती का रूप शिव परिवार से है। अपने लिए यह न समझ आने वाली बात है कि हम हिंदुओं के लिए शिव याकि शक्ति याकि दुर्गा याकि हनुमान ( हां शिव-भस्मासुर कथा के क्रम में महाबली हनुमान भी शिव परिवार से हैं) से शक्ति आराध्य होता रहा बावजूद इसके व्यवहार में हमारा डीएनए डर, गुलामी, शक्तिहीनता के क्यों करके ज्यादा ढला रहा? शक्ति पूजा के आराधक हनुमान से हम शक्ति नहीं मांगते, बल्कि अपने भय को दूर करने के लिए हनुमान चालीस पढ़ते हुए भय निराकरण चाहते हैं। शक्ति की पूजा हम शक्तिमान होने के लिए नहीं, बल्कि भय को मिटाने के लिए करते हैं! 

लोक व्यवहार की कसौटी में सोचें तो हिंदू की न समझ आने वाली पहेली यह है कि शिव, रुद्र, रौद्र, तीसरी आंख, तांडव और देवी दुर्गा के शक्ति रूप और हनुमान के महाबल की तमाम आराधनाओं, तंत्र-मंत्र-चालीसा की नियमितता के बीच भी साधना भक्ति की वैष्णव तासीर में ही बंधी हुई है। हां, वैष्णव याकि विष्णु-लक्ष्मी (यदा-यदा की धर्मस्य के विचार में श्रीकृष्ण और श्री राम आदि के फिर अवतार) की आराधना के सत्व-तत्व में बहुलता भक्तिभाव है। वचनों में, गीता के उपदेश में कर्मवाद जरूर है पर विष्णु भगवान के अवतार रूपों की कहानियों में वैष्णव लोक व्यवहार वाला भक्ति-समर्पण का संस्कार अधिक कथाएं लिए हुए हैं। 

उस नाते हम हिंदुओं का आराध्यों के प्रति भाव और लोक व्यवहार भारी गुत्थियों का भारी झमेला हैं। इसलिए यह बूझना आसान नहीं है कि मां दुर्गा और जय श्रीराम को लेकर इलाके विशेष के हिंदुओं में अर्थ क्या है? इसलिए कल और विचारना होगा। 

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