• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 04 July, 2019 07:35 AM | Total Read Count 377
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तब जनप्रतिनिधि क्या करें?

कैलाश विजयवर्गीय लोकप्रिय नेता हैं। उनकी लोकप्रियता उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय की पूंजी है और वह कुल मिला कर अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए लोक याकि जनता के काम करने-कराने की एप्रोच लिए हुए हैं। तभी वह कर्मचारी पर गुस्सा हुआ। उसने बल्ला उठाया। कर्मचारी को दौड़ाया और वह भारत के तंत्र का खलनायक कहलाया। सोचें, ऐसा उसने क्यों किया? जाहिर है लोग विधायक के घर गए, शिकायत की। जनता की तकलीफ पर विधायक गुस्सा हुआ और आव देखा न ताव बल्ला उठा लिया। नतीजतन कर्मचारी बेचारा और उसे फिर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सरंक्षण मिला।

मैं बल्ले से, हिंसा से, गुंडई से याकि किसी भी तरह के गैर-व्यवस्थागत तरीके का हिमायती नहीं हूं। उलटे मैं सौ टका चेक-बैलेंस की व्यवस्था और अमेरिका, ब्रिटेन जैसे सभ्य देशों की सिविक, लोकतांत्रिक व्यवस्था का खांटी पैरोकार हूं। मैं 40 साल से खबरों के बीच हूं। पर जान लें कि इतने लंबे अनुभव मे मैंने कभी यह नहीं सुना कि अमेरिका या ब्रिटेन के किसी सांसद, विधायक, काउंटी प्रतिनिधि ने कभी कर्मचारी को मारने के लिए बल्ला उठाया हो। भला वहां जनप्रतिनिधि को बल्ला उठाने, दबंगी दिखाने, गुंडई की जरूरत क्यों नहीं? इसलिए क्योंकि अमेरिका, ब्रिटेन में कर्मचारी और अफसर का मतलब है सौ टका जनसेवक! अमेरिका और ब्रिटेन में नौबत नहीं आती कि जनता का दफ्तर में काम हो और अफसर या कर्मचारी उलटे रिश्वत मांगे या अनदेखी करते हुए समस्या न सुलटाए। 

वहां वह लोकतंत्र, वह गणतंत्र है, जिसमें लोक और गण याकि जनता पहले है और बाद में तंत्र याकि बाद में सरकार व कर्मचारी है। इस बेसिक अंतर को भारत के हम सवा सौ करोड़ लोग नहीं समझते हैं। न ही भारत के प्रधानमंत्री और न मुख्यमंत्री इसे समझते हैं।  

आजाद भारत की 72 साला यात्रा का लब्बोलुआब है, पहले प्रधानमंत्री नेहरू से ले कर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिमालयी गलती है जो इन्होंने तंत्र को आगे रखा और गण को बाद में। भारत का लोकतंत्र व्यवहार में ‘तंत्रगण’ है। मतलब ‘तंत्र’ के गुलाम ‘गणों’ का देश। पंडित नेहरू और नरेंद्र मोदी एक अंदाज, एक सोच में भाषण करते हैं कि तंत्र याकि सरकार माईबाप है। सरकार लोगों का पेट भरने, उनके जीवन जीने की ईश्वरीय व्यवस्था है। इसका मतलब कि सत्तावान, कमर्चारी, अफसर सब हुए देवता! तभी कोई बल्ला उठाए तो वह ईश्वरीय, माईबाप व्यवस्था को चुनौती देते हुए गुंडई होती है।   

माईबाप सरकार-सत्ता के आगे जनता और जनता के प्रतिनिधि भारत में वे भक्त और पंडे-पुजारी हैं, जिन्हें अनुशासन में रहना ही है। सो, आश्चर्य नहीं जो नरेंद्र मोदी के लिए आकाश विजयवर्गीय अपराधी, गुंडा हैं जबकि कर्मचारी निर्दोष देवता। नरेंद्र मोदी मानेंगे नहीं, जानने की कोशिश नहीं करेंगे  कि इंदौर का वह कर्मचारी, तंत्र का वह नुमाईंदा लापरवाह, गैर-जिम्मेवार, घमंडी भी हो सकता है। नरेंद्र मोदी के हिसाब से विधायक आकाश विजयवर्गीय को यह मान कर व्यवहार करना चाहिए कि वह वार्ड विशेष का स्थानीय सरकारी देवता है उसकी कृपा पाओ न कि उसे कहो कि तुम काम क्यों नही करते हो। विधायक, सांसद का दायित्व पंडे-पुजारी जैसे भक्तों को, जनता को बहकाने का, बरगलाने का है। माईबाप सरकार के बखान का है। 

तभी भारत की जनता सन् 1947 से 2019 के आज तक के अनुभव में छोटे-छोटे कामों की मोहताज पड़ी है। नरेंद्र मोदी जब प्रचारक के नाते 11, अशोक रोड के पिछवाड़े में बैठे रहते थे, जनता का हिस्सा थे तब उन्हें अनुभव होता था कि रेल टिकट कराने, फोन कनेक्शन लेने के लिए कैसे कर्मचारी के आगे कातर भाव खड़े रहना होता है लेकिन सत्ता में बैठे, तंत्र का हिस्सा हुए तो उन्होंने समझा कि कर्मचारी और तंत्र के वाहन से सत्ता दौड़ती है तो उसको संरक्षण दे कर, उसके उपयोग से अपने को गुजरात का, देश का माईबाप बना सकते हैं। 

अब यहां पहलू उपयोग का है। पहली सीढ़ी पर जो प्रतिनिधि जनता के साथ ख़डा, जनप्रतिनिधि है वह बल्ला उठा कर याकि काम कराने के भदेस तरीके अपनाता है तो जो मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की ऊंचाई के सिंहासन पर बैठा होता वह अलग अंदाज में तंत्र को साधेगा। केंद्र सरकार में सुने एक अनुभव को जानें। भारत में सडकों के निर्माण में रेल विभाग बाधक रहा है। मतलब हाईवे आदि के निर्माण में रेल लाइन के ऊपर से पुल बनाने की अनुमति में रेलवे के विभाग सालों टालमटोल करते रहते हैं। तंग आ कर एक दिन मंत्री ने दफ्तर में रेलवे बोर्ड के चेयरमैंन को बुला कर धमकाया कि इतने दिनों में सारी अनुमति मिलनी चाहिए नहीं तो उठा कर इसी खिड़की से नीचे फेंक दूंगा। धमकी ने काम किया और अनुमतियां धड़ाधड़ आने लगीं। 

वह मंत्री का कमरे में बल्ला चलाना था। ऐसा नरेंद्र मोदी, अमित शाह भी करते होंगे। भारत में डर, खौफ बना कर, जिसने अफसरों, कर्मचारियों का उपयोग किया वहीं सफल हुआ है। ऐसी कार्य संस्कृति की अमेरिका या यूरोप के देशों में जरूरत नहीं है क्योंकि तंत्र, अफसर, नौकरशाही वहां जनता की गुलाम है। वह जनता के प्रति कर्तव्य भाव में बंधी होती है। पर भारत या इंदौर के वार्ड विशेष में जनता बेचारी है। तभी लोग विधायक के पास गए। विधायक की गलती जो उसने मीडिया के सामने बल्ला उठाया। वह दफ्तर के कमरे में खौफ बना कर्मचारी से काम कराता तो काम सधता और सब पर्दे में रहता। सो, भारत के कायदे का निचोड़ है- पर्दे के पीछे, कमरे के अंदर, टेबल के नीचे धमका कर, पैसा दे कर, लल्लोचपों करके भ्रष्ट माईबाप सरकार से काम साधो। भला कैलाश विजयवर्गीय ने यह कायदा अपने बेटे को क्यों नहीं सिखाया?

 

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