• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 August, 2019 06:46 AM | Total Read Count 562
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ऐसे ताकत दिखा कर क्या मिलेगा?

उफ! देश-विदेश सभी तरफ हल्ला कि कश्मीर में भारत एक्शन लेने वाला है। तभी अमरनाथ यात्रा रद्द, पर्यटकों की कश्मीर से वापसी और सुरक्षा बलों के कभी दस हजार तो कभी पच्चीस हजार जवानों को तैनात किए जाने की खबरें! क्या यह ताकत का प्रदर्शन नहीं? और कहां, किसमें? भारत के जम्मू-कश्मीर में। माना घाटी के लोग मुसलमान हैं और उनमें असंख्य कट्टरपंथी व अलगवावादी। लेकिन वे हैं तो भारत के नागरिक। इन्हें रहना तो भारत में है। यदि ऐसा है तो भारत राष्ट्र-राज्य की सरकार को जो करना हो करे लेकिन देश-दुनिया में ताकत का हल्ला बनवा कर क्यों? अनुच्छेद 370 या 35ए खत्म करने के एक प्रशासकीय आदेश के लिए घाटी के चप्पे-चप्पे में सैनिक, जवान खड़े कर शूरवीरता दिखलाना भला किसलिए? क्यों भय, भागमभाग, भगदड़, हड़बड़ी या हडकंप बनाना? क्या पाकिस्तान ने अपने अधिकृत कश्मीरी हिस्से को प्रदेश में कन्वर्ट किया या इजराइल फिलस्तीनी इलाके में फिलस्तीनी मुसलमानों को हटाता है, वहां यहूदी बस्ती बनाने का नोटिफिकेशन करता है तो क्या दुनिया सुनती है कि इतने हजार सुरक्षाकर्मियों का मूवमेंट है और अनहोनी होने वाली है! 

तभी क्यों है यह मूर्खता जो भारत सरकार कश्मीर घाटी को सुरक्षा बलों से भर देने का हल्ला बना रही है? इसका अर्थ है कि आप बलात कुछ करना चाहते हैं। अपना मानना है कि पंडित नेहरू ने अनुच्छेद 370 या 35ए का जम्मू-कश्मीर को अधिकार दिया तो वह सरकार के विचार से बनी महज एक आदेश, एक व्यवस्था थी। उसकी जगह नई व्यवस्था की यदि जरूरत है तो वह भी शासकीय प्रक्रिया में नई रीति-नीति से उठे कदम हैं। जब संविधान संशोधन तक सामान्य शासकीय, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहज बात है तो जम्मू-कश्मीर को तीन प्रदेशों याकि तीन प्रशासकीय ईकाईयों में बांटना हो या अनुच्छेद 370 या 35ए हटाना है तो भला कौन सी बड़ी बात या भारी खतरे कि बात जो बलात उसे होता बताएं! 

इसलिए जिस एप्रोच से आज जम्मू-कश्मीर में ताकत का प्रदर्शन है वह घातक है। पहली बात हम झूठे दुनिया को बता रहे हैं कि घाटी का मुसलमान बहुत खौफनाक है। वह 35ए, 370 या प्रदेश के पुनर्गठन जैसे फैसले से आग लगा देगा। तभी सरकार भारी ताकत का इस्तेमाल करने को मजबूर है। दूसरी बात, भारत सरकार, भारत का गृह मंत्रालय खुद दुनिया को बता रहा है कि कश्मीर घाटी में हालात भयावह हैं। तीसरी बात, यह धारणा बनवाना है कि कश्मीर को मिले हुए अधिकार उसके नैसर्गिक हैं, जिन्हें केंद्र सरकार बलात बदल रही है। चौथी बात अमित शाह अपना भविष्य बिगाड़ेंगे यदि हवा बनी कि वे वह कर दिखाएंगे जो पहले किसी गृह मंत्री की हिम्मत नहीं हुई। पांचवीं बात, इससे कश्मीर घाटी और वहां के मुसलमान को भारत राष्ट्र-राज्य ऐसे निरूपित कर रहा हैं, जो न विशेष अधिकारों से संतुष्ट है और न सहज तरीके से मुख्यधारा में लाया जा सकता है। छठी बात, देश और दुनिया सभी को मैसेज जा रहा है कि जब जम्मू-कश्मीर के खास मुसलमानों से भी भारत सरकार ऐसे बलात व्यवहार कर रही है तो भारत में बाकी मुसलमानों के साथ क्या हो रहा होगा। 

हां, ऐसे पहलू कई हैं, जिन पर कश्मीर के चलते देश-दुनिया के चेतन-अवचेतन में अलग-अलग विचार बन रहे होंगे। हिंदू अलग तरह से सोच रहा है तो मुसलमान बिल्कुल अलग। उदारवादी अलग तो अनुदारवादी अलग तरह से। ऐसा भी होना अनहोना नहीं है लेकिन बात तब चौंकाने वाली बनती है जब दुनिया में हल्ला हो कि कश्मीर में सुरक्षा जवानों को तैनात करके कुछ हो रहा है। 

अपनी जगह तथ्य है कि भारत की इतिहासजन्य शाश्वत ग्रंथि हिंदू बनाम मुसलमान है। इसमें दक्षिण एशिया 1947 में भी बंधा था और आज भी है। तब उसके मनोविश्व से हिंदू लोग गांधी-नेहरू की शरण में इसलिए थे क्योंकि उनसे दिल्ली के तख्त का पॉवर ट्रांसफर हिंदू को था। हिंदू का प्रधानमंत्री बनना ही मुक्ति थी। हिंदू तब नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया से इसलिए सुकून में था कि कमान हिंदू की थी और वह जिन्ना, मुस्लिम लीग, शेख अब्दुल्ला याकि मुसलमानों को हैंडल करने का अनुभव लिए थी।  

यह भी नोट रखें कि नेहरू और तमाम प्रधानमंत्रियों की प्राथमिकता मुसलमान, इस्लामी पाकिस्तान रही। मुस्लिम समस्या में गांधी-नेहरू ने अपनी समझ के जो फार्मूले सोचें, उनके फैसले हुए और जीवन खपा। नेहरू का सेकुलरवाद मुस्लिम चिंता में, मुसलमानों को हैंडल करने के तरीके में बना। शेख अब्दुल्ला, कश्मीर घाटी के मुसलमानों का दिल जीतने, उनको अपना बनाने के लिए उन्होंने अनुच्छेद 370 और 35ए जैसे टोटके अपनाए। उनसे क्या हुआ और क्या नहीं, यह अपनी जगह बहस है लेकिन वैश्विक स्थितियों, 9/11 के बाद वे टोटके हिंदू के जहन से उतरे और मुसलमानों को हैंडल करने का सेकुलर आइडिया ऑफ इंडिया तुष्टीकरण समझ आया तो वह देश की करवट याकि हिंदू राष्ट्रवाद का नया रूप था।   

उस नए रूप में कश्मीर के मुसलमानों का तुष्टीकरण आज अमान्य है और अनुच्छेद 370 व 35ए भी खारिज। तभी बतौर गृह मंत्री अमित शाह जम्मू-कश्मीर में जो फैसला लेंगे वह हिंदू मनोविश्व के वक्त का तकाजा है। उन्हें हक है फैसला लेने का। आखिर सरकार को छप्पर फाड़ जनादेश है तो वह देश की समस्याओं के समाधान में यदि अनुच्छेद 370 व 35ए को खत्म करने या राज्य के पुनर्गठन का फैसला ले है तो ऐसा लोकतंत्र के खाके में ही है।  

लेकिन इसके लिए शक्ति प्रदर्शन या पानीपत की तीसरी लड़ाई को स्थायी लड़ाई में कन्वर्ट करने की जरूरत नहीं है। सनसनी, भय, उन्माद के माहौल की भला क्यों जरूरत? कश्मीर घाटी को रणक्षेत्र बताते हुए चप्पे-चप्पे में सैनिक तैनात करने का हल्ला बनवाना और शासन निर्णय को भारत की जीत या हिंदू की जीत बनवाने की शूरवीरता किसलिए? 

हिसाब से खुद मोदी-शाह को ताकत की बजाय तर्क से दुनिया को बताना चाहिए कि भारत राष्ट्र-राज्य ने 72 साल विशेष अधिकार देते हुए लोगों का दिल जीतने की हर संभव कोशिश की लेकिन उन व्यवस्थाओं से उलटे अलगावी पहचान को हवा मिली। सो, केंद्र सरकार पुरानी प्रशासकीय व्यवस्थाएं खत्म कर फलां-फलां नए प्रशासकीय फैसले ले रही है। पंडित नेहरू ने जैसे 35ए प्रशासकीय आदेश जारी किया वैसे ही अब शासन अधिकार में उसे वापिस लिया जा रहा है।

इसके बजाय कभी इसे सुप्रीम कोर्ट के जरिए खारिज करवाने की चर्चा होती है तो कभी घाटी को छावनी बना कर फैसले की अफवाह है। बार-बार कहा गया कि अफवाहों पर ध्यान नहीं दें। सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है! लेकिन तब क्यों यात्रियों-पर्यटकों से कश्मीर घाटी को खाली कराया गया? क्यों कभी दस, कभी पच्चीस हजार जवानों को भेजे जाने की खबरें प्लांट हुईं? या गृह मंत्रालय के कथित नोट लीक हुए? आतंकी हमले की आशंका में तैनातगी की बात फालतू इसलिए है क्योंकि आंतक से निपटने के तो घाटी में पहले से ही पुख्ता सुरक्षा बल हैं। 

मोटे तौर पर वजह लगती है कि इससे देश में माहौल, चर्चा बने कि अमित शाह तो सरदार पटेल से भी अधिक मर्द गृह मंत्री हैं। यह बंदा है जो डरता नहीं। जो कश्मीरी मुसलमानों, भारत के मुसलमानों का जीना बदल देगा! देखो, कितने सैनिक-जवान वहां पहुंचा दिए! देखो, तीन तलाक का कानून बनवा दिया। संसद से वह कानून बनवा डाला, जिससे किसी को भी पहले ही आंतकी घोषित कर देंगे!

सो, संसदीय बहुमत व सुरक्षा बलों दोनों की ताकत के प्रदर्शन से धारणा बनाई जा रही है कि सरकार इस बार फुर्ती-चुस्ती-बेखौफी से फैसले ले रही है। 2014 से 2019 के बीच जो नहीं हुआ वह जून से अगस्त के तीन महीने में हो जाएगा। 15 अगस्त 2019 का लाल किले का भाषण जम्मू-कश्मीर में जीत की उपलब्धि लिए हुए होगा! लोग तब भाषण नरेंद्र मोदी का सुन रहे होंगे और दिल-दिमाग में अमित शाह की तस्वीर घूम रही होगी। 

इसमें भी हर्ज नहीं है। अमित शाह सच्चे सावरकर अनुयायी प्रमाणित हो और खांटी वैचारिक हिंदुवादी सरदार पटेल कहलाएं, यह भी स्वीकार्य है। लेकिन देश के एक इलाके में सैनिक बाहुबल का हल्ला (हां, आपत्ति हल्ले और तरीके पर है) बना कर एक्शन की अनुभूति कराना क्या पानीपत की लड़ाई को स्थायी स्वरूप देना नहीं हैं? क्या इसका अर्थ अमित शाह ने सोचा है? क्या यह मां भारती की दीर्घकालीन सेहत के लिए घातक नहीं होगा? 

 

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