• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 July, 2019 06:18 AM | Total Read Count 452
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बजटः भेड़ों की रेवड़ में चारा-पानी!

खबर पढ़ अच्छा लगा। भारत सरकार के श्रम मंत्री ने देश की संसद में दो टूक शब्दों में कहा-देश में नौकरी की समस्या नहीं है। न ही असंगठित क्षेत्र में रोजगार अवसरों में गिरावट की कोई सूचना है। समस्या सिर्फ यह है कि लोग स्थायी रोजगार चाहते हैं। उन्होंने बताया कि भारत में बेरोजगारी की वृद्धि दर सिर्फ साढ़े तीन फीसदी है। ध्यान रहे भारत सरकार के ही एक संगठन एनएसएसओ की रिपोर्ट में बेरोजगारी दर को 6.1 फीसदी बताया गया था। मतलब 45 सालों में सर्वाधिक। तो सही क्या मानें? सरकार को मानना चाहिए। इसलिए क्योंकि जनता ने मई के लोकसभा चुनाव में जब मोदी सरकार को दोबारा भरपूर समर्थन के साथ जिताया है तो मान लेना चाहिए कि सब ठीक है। चौतरफा खुशहाली है। आर्थिकी चमचमा रही है। रोजगार ही रोजगार है। विकास दर जंप मार रही है तो घर-परिवार, काम-धंधों में पौ-बारह है। शेयर बाजार दौड़ रहा है। कल-कारखाने खुल रहे हैं। लहलहाती खेती है और घी-दूध की बहती नदियों में बाल-गोपाल, कृष्ण-कन्हैया, लव-कुश सब उछलते-कूदते हैं। 

आप व्यंग्य बूझ रहे होंगे। पर व्यंग्य तब होता है जब यह भान हो कि हकीकत और हवा, सत्य और झूठ को बूझने वाले लोग हम हैं। तभी यदि संसद में कहा जा रहा है कि बेरोजगारी नहीं है। विकास तेज रफ्तार है तो मानना ही होगा कि हां, ऐसा हो रहा है। इसलिए आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन बजट में जो कहेंगी वहीं सत्य है। तभी यह बहस या विचार बेतुका है कि बजट में क्या होगा या बजट अच्छा है या बुरा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन या और किसी भी मंत्री को यह जानने-समझने की जरूरत ही नहीं है कि जनता क्या चाहती है या क्या होना चाहिए? क्या समस्या, कैसी चुनौतियां और क्या-कुछ किया जाए? 

ऐसे ही जनता को भी जानने की जरूरत नहीं है कि बजट में उनके लिए क्या है? जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सौ टका समर्पण है, उन पर आस्था है तो जानने, विचारने, समझने की भला जरूरत क्या है? तभी आपने गौर किया होगा कि बजट को ले कर पहले जो सनसनी, जो कौतुक, अर्थशास्त्रियों- उद्योगपतियों का जो हल्ला हुआ करता था वह बजट से पूर्व लगभग नहीं है। जुलाई 2014 और जुलाई 2019 के बजट के वक्त का फर्क यहीं है कि तब कौतुक था, भारत के बदलने का सस्पेंस था और आज सिर्फ हेडिंग है कि बजट पेश होने वाला है। 

जाहिर है बजट को ले कर बजट की भाप खत्म है। भाप बनने, बनाने का काम चुनाव से छह महीने पहले शुरू हो कर चुनाव में खत्म हो चुका है। किसानों को पैसा बांट दिया गया। गरीब को, मध्य वर्ग को तमाम झुनझुने मिल गए। विकास-रोजगार सबकी झांकी दिख गई और उस सब पर सवा सौ करोड़ लोगों ने मोहर लगा दी तो अब क्यों दिमाग खपे। व्यर्थ क्यों चिल्लपौं हो। उछलती-कूदती भेड़ें जब गड़ेरियों के हांकने से रेवड़ याकि बाड़े में लौट आती हैं तो फिर वे शांत रहती हैं, वह भरोसे में होती हैं कि रेवड़ में चारे-पानी का प्रबंध है। इससे ज्यादा उसे और कुछ चाहिए भी नहीं। गड़ेरिए शाम को, अगले दिन सुबह का चारा -पानी का प्रबंधन अपने बजट से लिए हुए ही होते हैं।  और अब अपना मानना है कि हम भारतीयों को अपनी माईबाप सरकार से रेवड़ियों, झुनझुनों और चारे-पानी से ज्यादा कुछ चाहिए भी नहीं। किसान को दो हजार रुपए मिल जाए, महिला को गैस सिलेंडर मिल जाए, लाइट का एक बल्ब मिले या पीने का स्वच्छ जल मिले, मकाननुमा सुरक्षित रेवड़ और खाने को सस्ता राशन मिल जाए तो जीवन हुआ धन्य!  

सो, सोचना फालतू है कि बजट में क्या होगा? अपने एक परिचित बहुत बैचेनी से बार-बार कहते हैं कि बजट में इन्हें कुछ तो करना होगा! नहीं तो चलेगा कैसे? जाहिर है मेरी तरह अपने इन परिचित को भी गलतफहमी है कि आर्थिकी बरबाद है। उनकी दलील है कि इंजिन में भाप तब बनती है जब कोयला याकि पूंजी हो। उद्योगपति, कारोबारी  के पास पूंजी है नहीं। यदि है भी तो वह अभी जोखिम मानता है। पूंजी या तो सरकार उड़ेले या बैंक दें। दोनों या तो खाली हैं या बरबाद है। तब होगा क्या? ऐसे कैसे मोदी चलते रहने दे सकते हैं? बजट में कुछ न कुछ नया तरीका, फार्मूला होगा।

अब क्या कहा जाए? अपना इतना भर कहना है कि गांठ बांध लें, सबको समझ लेना चाहिए कि विकास, काम-धंधे, रोजगार आदि की हम हिंदुओं को चिंता नहीं है। हम घास खा कर रह लेंगे लेकिन देश को विधर्मियों से मुक्त कराना है। बजट अच्छा हो या बुरा हो, काम-धंधे हों न हों, रोजगार मिले या न मिले, ये सब फालतू बातें हैं। यों भी भारत की आजादी के बाद से दुनिया जानती है कि एक हिंदू विकास रेट हुआ करती है, जिसमें दो-तीन प्रतिशत विकास पर हिंदू संतुष्ट होता है। पंडित नेहरू भी दो-ढाई प्रतिशत के विकास से सफल अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री थे तो नरेंद्र मोदी बिना विकास या साढ़े छह प्रतिशत की बेरोजगारी रेट के बावजूद सफल प्रधानमंत्री कहलाएंगे क्योंकि हम हिंदुओं को सूखी रोटी में भी सुदामा सुख प्राप्त होता है। सचमुच भारत देश ही बिरला है और यह बात आज के बजट से भी जाहिर होगी। बजट में संतोष झलकेगा, खुशी झलकेगी न कि चिंता या नया-अनहोना पुरुषार्थ!

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