• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 03 September, 2019 06:58 AM | Total Read Count 629
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मोदी का पीएमओ और नृपेंद्र मिश्रा

कोई पूछे की भारत के प्रधानमंत्री दफ्तर का क्या मतलब है तो मोटा जवाब होगा कि जिले के कलेक्टर आफिस का ही वह केंद्रीकृत, केंद्रीय स्तर का विस्तार है। जैसे जिला-जनपद मुख्यालय को कलेक्टर चलाता है वैसे ही प्रमुख सचिव प्रधानमंत्री दफ्तर चलाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति के व्हाइट हाउस को वहां जैसे चीफ ऑफ स्टाफ चलाता है वैसी कोई विशिष्टता प्रधानमंत्री दफ्तर या मुख्यमंत्री दफ्तर में प्रमुख सचिव की नहीं हुआ करती है। अमेरिका में राष्ट्रपति की सोच, आइडिया, एजेंडा, बुनावट का प्रतिनिधि चीफ ऑफ स्टाफ होता है। राष्ट्रपति जिसे दफ्तर का प्रमुख बनाता है वह सरकार के भीतर का अफसर नहीं होता है, बल्कि बाहर का आदमी होता है और वह फिर वाशिंगटन की नौकरशाही को राष्ट्रपति के एजेंडे के माफिक हांकता है। 

यह सब भारत में नहीं है। भारत में जिले के कलेक्टर का ऑफिस हो या मुख्यमंत्री का या प्रधानमंत्री का दफ्तर सबमें बॉस आईएएस काडर का ताउम्र नौकरी करने वाला वह अफसर होता है जिसे ट्रेनिंग होती है कि 'गंगा गए तो गंगाराम और जमुना गए तो जमुना दास! पंडित नेहरू के एचवी अयंगर, एवी पाई, बीके कौल जैसे संयुक्त सचिव लेवल के दफ्तर इंचार्ज का वक्त हो या शास्त्री के एलके झा मतलब पहले सचिव लेवल के दफ्तर इंचार्ज से ले कर नरेंद्र मोदी के मौजूदा प्रधानमंत्री दफ्तर में नृपेंद्र मिश्र के कैबिनेट दर्जे वाले प्रमुख सचिव सबकी समान काबिलियत या गुण फाइल बनाना, बढ़ाना और दस्तखत करवाना है। बतौर मिसाल नृपेंद्र मिश्र का उदाहरण है। वे यूपी काडर में नारायण दत्त तिवारी के कभी खास थे। फिर कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री दफ्तर में प्रमुख सचिव रहे। मनमोहन सरकार के वक्त टेलीकॉम जैसे अहम मंत्रालय में रहे और नरेंद्र मोदी के पांच साल प्रमुख सचिव रहे तो इसका अर्थ है कि उन्होंने तिवारी के वक्त समाजवाद को लागू कराया तो मंदिर के वक्त में कल्याण सिंह का हुकुम बजाया, फिर उदारीकरण की नीतियों के वक्त उदारीकरण की फाइलें बनाईं और मोदी के वक्त नोटबंदी करवाई।

जाहिर है नृपेद्र मिश्र का दर्जा प्रमुख सचिव, कैबिनेट मंत्री का चाहे जो रहा हो उन्होंने भी उसी तासीर में काम किया, जैसा नेहरू के समय संयुक्त सचिव या डिप्टी सचिव का हुआ करता था। नेहरू बड़े नेता थे तो उनका दफ्तर डिप्टी, संयुक्त सचिव के आईएएस संभालते थे। फिर ज्यों-ज्यों प्रधानमंत्री बौने होते गए, अफसरों का रूतबा बढ़ता गया। सचिव, प्रमुख सचिव और मोदी के वक्त तो पीएमओ में तीन-तीन अफसर केबिनेट दर्जे वाले बैठने लगे। ये सभी हुकुम-हाजिरी में उम्र गुजार पके हुए। भारत में प्रधानमंत्री का दफ्तर वही जमात चलाती है जिन्हें या तो नौकरी करनी है या देश को कुतर कर खाना है। देश का इनका विचार, आइडिया ऑफ इंडिया नहीं हुआ करता, बल्कि सबका आदर्श 'गंगा गए तो गंगाराम और जमुना गए तो जमुना दास!

हां, बिरले, बहुत बिरले दो-चार ही उदाहरण होंगें, जिसमें किसी आईएएस ने प्रधानमंत्री दफ्तर में बैठ कर देश की तकदीर बदलने वाला कोई मौलिक काम किया हो। नेहरू के वक्त तक उनका दफ्तर संयुक्त-डिप्टी सचिव स्तर के आईएएस संभालते थे। लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो एक अफसर (एलके झा) ने अपने प्रभाव में दफ्तर का दर्जा बढ़ा कर अपना दर्जा सचिव स्तर का बनवाया। इंदिरा गांधी के वक्त पीएन हक्सर ने जरूर प्रधानमंत्री दफ्तर और प्रधानमंत्री निवास का रूतबा बढ़ाने का काम किया लेकिन उसके पीछे बुनियादी मकसद इंदिरा गांधी की धमक बनवाने का था। शासन और रीति-नीति में फोकस तब इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा का था। 

बहरहाल, नृपेंद्र मिश्र अपने लिए इसलिए विचारणीय हैं क्योंकि उनसे मेरा पुराना परिचय रहा है। वे वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का अनुभव लिए हुए थे इसलिए उन्हें जब नरेंद्र मोदी का प्रमुख सचिव बनने का मौका मिला तो मुझे लगा था कि आर्थिकी उनकी निगाहों में रहेगी। वे प्रधानमंत्री को सही आर्थिकी सलाह देंगे। लेकिन जिस दिन नोटबंदी की घोषणा हुई उस दिन मैंने बहुत सोचा कि नृपेंद्र मिश्र के रहते हुए ऐसा सत्यानाशी फैसला कैसे हुआ! पर जैसा मैंने ऊपर लिखा कि भारत का अफसर चेहरा देख कर फाइल बनाता है और फाइल आगे बढ़ा कर इतिश्री करता है। बुद्धि, समझ, विवेक का भला क्या मतलब। तभी नरेंद्र मोदी ने उनका धन्यवाद करते हुए यह जो कहा है कि नृपेंद्र मिश्र से उन्हें प्रारंभिक दिनों में दिल्ली का तंत्र समझ आया तो वह बात ज्यादा जमी नहीं। 

नृपेंद्र मिश्र के गहरे आर्थिकी अनुभव के बावजूद पांच सालों बाद भारत की अर्थव्यवस्था आज जिस दशा में है उस सत्यानाश में प्रधानमंत्री दफ्तर का रोल निश्चित ही अहम था और है। बावजूद इसके यह भी हकीकत है कि अरूण जेटली के वित्त मंत्री रहते पीएमओ में भी आर्थिकी को ले कर किंकर्तव्यविमूढ़ता रही होगी। मतलब नरेंद्र मोदी और अरूण जेटली के दो छोर के बीच नृपेंद्र मिश्र के लिए करने को कुछ नहीं था। उस नाते बरबाद आर्थिकी के लिए नृपेंद्र मिश्र को जिम्मेवार मानना भी ठीक नहीं है। कुछ जानकार चर्चा चलाए हुए हैं कि आर्थिकी की बदहाली के चलते प्रधानमंत्री ने नृपेंद्र मिश्र को रिटायर किया। अपना मानना है कि नृपेंद्र मिश्र की 75 साल की उम्र सीमा थी। जो व्यक्ति 35 साल से डायबिटीज में इन्सुलिन पर हो तो उम्र के इस पड़ाव पर ध्यान, याददाश्त सब पर बोझिलपना लिए हुए हो ही जाता है। सो, खुद नृपेंद्र मिश्र ने बहुत हुआ के मनोभाव में रिटायरी मांगी और वे रिटायर हो रहे हैं। 

सवाल है उनकी कमान के पीएमओ को कैसे याद किया जाएगा? तो अपना दो टूक मानना है कि देश के लोकतंत्र, देश की संस्थाओं के अवमूल्यन, आर्थिकी की बरबादी के नाते उनकी बहुत ही शर्मनाक दास्तां लिखी हुई होगी। मैं मोटे तौर पर पिछले चालीस सालों में सर्वाधिक प्रभावी प्रमुख सचिव याकि पीएमओ पीवी नरसिंह राव का मानता हूं। उनके वक्त एएन वर्मा प्रमुख सचिव हुआ करते थे। वे बहुत गुरू अफसर थे। दलाल दीपक तलवार उन्हीं की छत्रछाया में पसरा था मगर एएन वर्मा ने इस तरह की अफसरी चतुराई के बावजूद प्रधानमंत्री नरसिंह राव के आर्थिकी को सुधारने के इरादे को जैसे पंख लगवाए तो वह मौन क्रांति वाली वह उपलब्धि थी, जिससे भारत राष्ट्र-राज्य बुनियादी परिवर्तन के साथ बहुत बदला।

वैसा कोई श्रेय़ नृपेंद्र मिश्र के खाते नहीं है। फिर भी नृपेंद्र मिश्र ने निजी तौर पर बिना विवाद, दाग के निरापद भाव पांच साल जैसे पीएमओ चलाया तो यदि आगे उन्हें जम्मू-कश्मीर या दिल्ली का उप राज्यपाल या गोवा का राज्यपाल बनाया जाए तो वह प्रधानमंत्री का सही कतृज्ञता ज्ञापन होगा। 

 

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