• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 09 August, 2019 06:28 AM | Total Read Count 656
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पीठ न थपथपाएं, सोचें आगे की!

इंडियन एक्सप्रेस में कल खबर थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी के मंत्रियों से कहा कि जम्मू-कश्मीर को ले कर जो फैसला है उस पर पीठ न थपथपाएं, बल्कि आगे के लिए कमर कसें।(No chest-thumping please, long haul ahead) यदि ऐसा है तो समझदारी की बात है। इस बात का अर्थ सभी लंगूरों को गंभीरता से समझना चाहिए। लंगूरों को मौन धारण कर अपने घरों में उसी तरह बंद रहना चाहिए जैसे कश्मीर घाटी में कोई 80 लाख लोग आज बेजुबां घरों में बंद हैं। पांच अगस्त से आज नौ अगस्त के दिन और आगे कई दिनों तक शेष भारत के नागरिकों और खास कर हिंदुओं को वैसे ही मौन रखना चाहिए जैसे घाटी के लोगों को भारत का बाहुबल मौन रखना चाहेगा। 

उस नाते राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल गलत कर रहे हैं, जो वहां लोगों के बीच अपनी तस्वीरें खिंचवा कर शेष भारत और खास कर हिंदुओं को मैसेज दे रहे हैं कि सब ठीक है, सामान्य है। लोग संतुष्ट-खुश हैं। क्या डोवाल और सरकार के ऐसे टोटकों से कोई विश्वसनीयता बनती है? फिर यदि ऐसी ही बात है तो श्रीनगर में फोन, इंटरनेट क्यों काटा हुआ है? क्यों पत्रकारों-रिपोर्टरों के सभी कम्युनिकेशन लिंक, फोन, इंटरनेट सब कटे हुए हैं? कल से एडिटर गिल्ड को कुछ पत्रकारों ने मैसेज दे रखा है कि ऐसी सेंसरशिप पर वह मौन क्यों है? कैसे ऐसा हो रहा है कि श्रीनगर से पत्रकारों को शेष भारत से काट दिया है, वहां से रिपोर्टिंग नहीं होने दी जा रही है लेकिन संपादकों की गिल्ड हाथ पर हाथ धरे बैठी है! 

सही है कि परिंदा भी पार नहीं होने देने के सुरक्षा बलों के बंदोबस्तों में मीडियाई परिंदों के भी पंख हर तरह से बांध दिए हैं। कल ही कोलकत्ता के द टेलीग्राफ में वहां से लौट कर आए एक पत्रकार की रिपोर्ट थी, जिसमें उसने दो टूक शब्दों में लिखा कि श्रीनगर पर तालाबंदी का अनुभव अकल्पनीय है। शहर-इलाके को काट कर एकदम उसे शेष दुनिया से अलग-थलग बनाने का मौजूदा अनुभव किसी की भी याददाश्त में नहीं है। ऐसा कभी हुआ ही नहीं जो वहां अभी है! 

संदेह नहीं यह होना था। बिजली भयावह कड़की है तो लोगों को संभालने में कश्मीर घाटी, श्रीनगर को यदि तालाबंद किया है तो यह वक्त-फैसले का तकाजा है। मुझे अपने रिपोर्टिंग दिनों का वह अनुभव अभी भी याद है कि अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सेना का ब्लू स्टार ऑपरेशन हुआ तो इंदिरा सरकार ने अमृतसर और पंजाब को लॉकआउट में डाला। परिंदा इधर से उधर नहीं जा सकता था। लेकिन ऑपरेशन खत्म हुआ तो इंदिरा गांधी और उनके सूचना-प्रसारण मंत्री एचकेएल भगत ने 24 घंटे के बाद पत्रकारों-रिपोर्टरों की अमृतसर यात्रा करवाई। दिल्ली-अमृतसर की विशेष उड़ान में राष्ट्रीय मीडिया के सभी रिपोर्टरों को स्वर्ण मंदिर ले जाया गया। मैं भी गया था और स्वर्ण मंदिर, अगल-बगल, तालाबंद शहर को देखते-गुजरते हुए मेरे दिल-दिमाग में जो भाव आए तो उसमें सेना की कार्रवाई, स्वर्ण मंदिर के हाल देख कर एक भाव गुस्से में यह भी था कि यह तो ज्यादती। 

बावजूद इसके हम रिपोर्टरों ने अपनी-अपनी मीडिया रिपोर्ट में वहीं लिखा जो राष्ट्रहित, देश की अखंडता और सरकार के दायित्व की समझ में होता था। मैंने स्वर्ण मंदिर, ब्लू स्टार ऑपरेशन का उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि सिख समुदाय की भावनाओं के परिप्रेक्ष्य में वह घटना आजाद भारत के इतिहास का सर्वाधिक विकट ऑपरेशन था। उस समय खालिस्तानी आंदोलन, भिंडरावाले आदि को ले कर हरियाणा, दिल्ली या उत्तर भारत का हिंदू बहुत गुस्से में था। लेकिन इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने उस ऑपरेशन को राजनीतिक बहादुरी, हिंदुओं से जश्न मनवाने, पीठ थपथपाने जैसा कोई काम याकि छप्पन इंची छाती की वाह का हल्ला नहीं बनवाया। यहीं नहीं 24 घंटे बाद देशी-विदेशी मीडिया को खुद ऑपरेशन स्थल पर ले जा कर हकीकत से रूबरू करवाया। मीडिया को अपना काम करने दिया। 

शायद इन बातों का, उसका अनुभव, ब्योरा मोदी-शाह-डोवाल और इनके प्रधानमंत्री दफ्तर या गृह मंत्रालय के अफसरों को नहीं है। तभी अनुच्छेद 370 को खत्म करने के फैसले के साथ लड़ाई जीत लेने, मेज और पीठ थपथपाने के हल्ले से देश-दुनिया को जताया गया कि देखो इतना बड़ा फैसला। अब यह प्रोपेगेंडा है कि मोदी-शाह की छप्पन इंची छाती के नीचे सब सामान्य। और इसके लिए ग्राउंड जीरो की रिपोर्टिंग पर पाबंदी और अजित डोवाल की यह ट्विटर रिपोर्टिंग जो वे फोटो भेजते हुए बता रहे हैं कि देखो सब सामान्य है। कश्मीरी खुश हैं!

जो हो, नरेंद्र मोदी ने भले सिर्फ अपने मंत्रियों के बीच कहा लेकिन सही कहा कि वक्त पीठ थपथपाने का नहीं, कमर कसने का है। अनुच्छेद 370 का मामला सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट पर एयर स्ट्राइक जैसी वाहवाही वाला नहीं है, जिसे हिंदुओं ने जाना और जश्न मन गया जबकि दुनिया ने मुस्करा कर अनदेखी की। यह बहुत लंबा-गहरा मसला है। यह भी ध्यान रहे कि कश्मीर घाटी और उसके 70-80 लाख लोग हमेशा लॉकआउट वाली स्थिति में नहीं रहने वाले है। यों पचास हजार या एक लाख सुरक्षाकर्मियों की ताकत कम नहीं होती है बावजूद इसके पांच दिन, पांच सप्ताह या पांच महीने फोन, इंटरनेट, कम्युनिकेशन, आवाजाही रोके रख कर इलाका विशेष को कुछ दिनों के लिए ही साइबेरिया बना कर रखा जा सकता है अंततः तो लोगों की भावना और जमीन का सत्य फूटेगा। 

तभी पहली जरूरत है कि बाड़ेबंदी के बावजूद श्रीनगर के पत्रकारों, मीडियाकर्मियों से सेंसरशिप हटाई जाए। उन्हें लोगों की भावना को अभिव्यक्त करने का खुला मौका मिले। यों भी आज किस अखबार, मीडियाकर्मी की हिम्मत है जो सरकार या मोदी-शाह को दी जा रही गाली या गुस्सा सुना व दिखा दे। जब मीडिया में खौफ का पुख्ता बंदोबस्त है तो उससे आंखों देखी बनवाने में क्या खतरा है? अजित डोवाल की ट्विटर रिपोर्टिंग या उनके जरिए हालात बतलवाना क्या सरकार को शोभा देता है? हिसाब से अल जजीरा, बीबीसी याकि सभी स्वतंत्र विदेशी मीडिया को भी बैरिकेड के बंदोबस्तों के बीच श्रीनगर में घूमने दिया जाए। दुनिया जाने की विरोध है तो भारत राष्ट्र-राज्य का संकल्प भी है कि अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले पर बेखटके अमल हो रहा है। घाटी के अस्सी लाख लोग नाराज हैं तो जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के उससे ज्यादा संख्या में लोग खुश हैं।

 

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