• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 02 September, 2019 06:44 AM | Total Read Count 473
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जंग के लिए बचा रहे रिजर्व पैसा!

लाख टके का सवाल है कि रिजर्व बैंक से केंद्र सरकार को मिले पैसे का कैसे उपयोग हो? कुछ जानकार कोई पौने दो लाख करोड़ रू की लाटरी से आर्थिकी का भला चाहते हैं। अपना मानना है कि आर्थिकी से अधिक चिंता भारत -पाकिस्तान की तनातनी, कश्मीर घाटी की स्थिति याकि बाहरी-अंदरूनी सुरक्षा खतरे को ले कर होनी चाहिए। फिर इसी की चिंता में रिजर्व बैंक से मिले पैसे को केंद्र सरकार जंग की संभावना और कश्मीर के लिए बचा कर रखें। इसलिए भी कि यदि आर्थिकी खराब है तो जंग की सूरत में वह और तब गड़बड़ाएगी जब खर्च का आपात बंदोबस्त नहीं हुआ मिला। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 की समाप्ति के बाद की असली चुनौती आने वाले महिनों और सालों में जोर जबरदस्ती हालातों को सामान्य बनवाना है। 

हां, फैसले के बाद पाकिस्तान जैसे पगलाया है तो जंग मुमकिन है। ऐसे ही सितंबर के बाद कश्मीर घाटी से पाबंदियां घटानी ही पड़ेगी। अनंत काल तक 70-80 लाख लोग ओपन जेल में बंद नहीं रह सकते। न ही आंतकी गतिविधियों में विराम संभव है। अनुच्छेद-370 को खत्म करना ताकत के हुंकारे से है तो आगे का अमल भी ताकत से ही होना है। ऐसे में सुरक्षा बंदोबस्तों के खर्च में भारी बढ़ोतरी होनी है। उस नाते अपना मानना है कि केंद्र सरकार की पहली प्राथमिकता यह हो  कि पाकिस्तान से जंग और अंदरूनी प्रतिरोध, आंतक आदि से निपटने का लंबा रोडमैप बने। फिर उसी अनुसार बजट व खर्च का पुख्ता बंदोबस्त हो। उसका सहज जरिया आज रिजर्व बैंक से केंद्र सरकार को मिला पैसा है। 

और यह इसलिए अधिक जरूरी है क्योंकि भारत की आर्थिकी के गिरने का पैंदा फिलहाल किसी को मालूम नहीं है। तेज विकास या सरप्लस वाली आर्थिकी नहीं है जो जंग जैसी आपात स्थिति का झटका वित्तिय घाटे या इधर-उधर की बचत से संभला रहे। मौटे तौर पर भारत में सरकार को और सरकार की एजेंसियों को अनुमान ही नहीं है कि आर्थिकी में गिरावट का पैंदा क्या है! पाकिस्तान की बदहाली जगजाहिर है। वहां बदहाली को छुपाने की सरकार की कोशिश नहीं है। पाकिस्तान का प्रधानमंत्री इमरान खान खुद दुनिया के आगे यह कहते हुए झौली फैलाए हुए है कि हमें मदद चाहिए। जबकि भारत सरकार और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आंकड़ों का मायाजाल बना कर दुनिया को बताया हुआ है कि भारत सोने की चीड़िया बना हुआ है और पैसे की कोई कमी नहीं है।  

सोचें, यदि ऐसा होता तो क्या भारत सरकार को रिजर्व बैंक में रखा रिजर्व पैसा लेने का इतना जतन करना पड़ता?  येन केन प्रकारेण रिर्जव बैंक से सरकार ने जैसे अपनी लाटरी खुलवाई है तो वजह सरकार और आर्थिकी की कड़की स्थिति है। पाकिस्तान सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज ले कर सांस ले रही है तो भारत सरकार ने रिर्जव बैंक से पैसा ले कर अपना जुगाड़ बनाया है। इस जुगाड़ को यदि सरकार ने अपने चालू खर्चों को पूरा करने या बैंकों में पैसा डाल कर उन्हे सेहतमंद बनाने में खर्च किया तो वह पैसे की बरबादी होगी। एक अनुमान अनुसार अगले तीन वर्षों में सरकार को रिजर्व बैंक से कोई तीन लाख करोड़ रू मिलेंगे। इसमें से 45 प्रतिशत चालू खर्चों की पूर्ति, 20 प्रतिशत पैसा बैंकों की पूंजी बढ़ाने में खर्च होगा। कुछ जानकारों का अनुमान रिर्जव बैंक द्वारा सार्वजनिक तौर पर लिए कर्ज अदायगी में भी 25 प्रतिशत पैसा खर्च हो सकता है। 

उस नाते संभव है कि कोई पौने दो करोड़ रू की लाटरी को सरकार अगले छह महीनों में घाटे की भरपाई, योजनाओं की जरूरत में उड़ा दें। जबकि फिलहाल जंग के बादलों, कश्मीर की आगे की चुनौतियों में  रोडमैप और उसके खर्च की प्राथमिकता होनी चाहिए। रक्षा-सुरक्षा बजट में नए सिरे से आवंटन या रिर्जव बनना चाहिए। वित्त मंत्रालय को रक्षा और गृह मंत्रालय के साथ इनकी जरूरत के बजट का नए सिरे से अनुमान लगाना चाहिए। वित्त मंत्रालय या भारत सरकार के बाबूओं का आम जनता की तरह यह सोचना आत्मघाती होगा कि पाकिस्तान दिवालिया है। उसके पास लड़ाई लड़ने का पैसा नहीं है तो वह क्या खांक लड़ाई लड़ेगा। या यह सोचना कि जम्मू-कश्मीर और खास कर कश्मीर में सब नियंत्रण में है तो नया कुछ सोचने की जरूरत नहीं है। 

जान लिया जाए कि पाकिस्तान की सेना का देश की दिवालिया स्थिति से लेना देना नहीं है। पाकिस्तान में सैनिक बजट और तैयारियों में कभी कटौती नहीं हुई है और न होगी। 2018 के आंकड़े के अनुसार पाकिस्तान की सेना पर पिछले साल ग्यारह अरब डालर खर्च हुए थे और वह उसकी जीडीपी का 3.6 प्रतिशत हिस्सा था। वही भारत ने 58 अरब डालर खर्च किए और वह जीडीपी का 2.1 प्रतिशत हिस्सा था। लेकिन भारत का सैनिक खर्च आर्थिक-सैनिक महाबली चीन की चिंता भी लिए हुए होता है। मौटे तौर पर पाकिस्तान में 1993 से 2006 के बीच पाक सरकार के कुल खर्च का बीस प्रतिशत सेना पर खर्च हुआ था। सन् 2017 में यह प्रतिशत 16.7 प्रतिशत था। जबकि इसी अवधि में भारत में सरकार के कुल खर्च का 12 प्रतिशत सेना पर खर्च रहा है और 2017 में यह 9.1 प्रतिशत था। 

जाहिर है पाकिस्तान कितना ही बरबाद और दिवालिया हो वहा सरकार के खर्च में सेना को पैसा मिलने का अनुपात हमेशा ज्यादा रहा है और जंग लड़ने वाली या आंतकियों को तैयार करने वाली सैनिक मशीनरी के लिए पैसे की कभी कमी नहीं रही है जबकि भारत में पाकिस्तान, चीन सहित हिंदमहासागर आदि से चौतरफा सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद सेना का खर्च नियंत्रण में रहा है। पाकिस्तान में सेना क्योंकि सर्वेसर्वा है इसलिए उसने अपने लिए कभी पैसे की कमी नहीं रहने दी। 

तभी इस बात को समझा जाए कि पाकिस्तानी सेना ने अपने आपको जंग में यदि झौका तो वह सुरक्षित खर्च के बंदोबस्तों के साथ होगा। देश दिवालिया है इसकी चिंता न वहा सेना को है और न आज जनता वहां ऐसी कोई चिंता किए हुए है। जम्मू-कश्मीर के मौजूदा मामले ने पाकिस्तानी अवाम में जिहादी जुनून बना दिया है। इमराम खान खुले आम इस्लाम की लड़ाई का रंग देते हुए भारत से लड़ने की जैसी बाते कर रहे है तो उसमें वहा की जनता को भी यह कहते हुए उन्मादी बनाया जा सकता है कि घास खा कर जिंदा रह लेंगे लेकिन हिंदुस्तान से लड़ेंगे। 

तभी भारत को पाकिस्तानी उन्माद से निकले छाया युद्ध या औपचारिक जंग के मुकाबले की तैयारी रखनी चाहिए। पहली जरूरत है कि मोदी सरकार रक्षा-सुरक्षा के मामले में बजट और खर्च के आपातकालीन बंदोबस्त करके रखें। जाहिर है उसमें आज रिर्जव बैंक के पैसे से कुछ आसानी है।  

 

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