• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 September, 2019 07:08 AM | Total Read Count 395
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ब्रिटेन की संसद को सलाम!

वाह! क्या बात है। इसे कहते हैं जिंदा कौम का जीवंत और जिंदादिल लोकतंत्र! ब्रिटेन की संसद ने प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन की मनमानी को जैसे खारिज किया, सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों ने अपनी सरकार के खिलाफ वोट दे कर विपक्ष के प्रस्ताव को जैसे पारित किया वह ब्रिटेन जैसे पुराने लोकंतत्र में भी ऐतिहासिकता की घड़ी है। उसके लोकतंत्र को चार चांद है। क्यों? इसलिए कि ब्रिटेन जैसा लोकंतत्र यदि परंपरा और व्यवस्था के कायदे में व्यवहार नहीं रखेगा, फैसले नहीं लेगा तो दुनिया में कौन रखेगा? प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन एक हद तक अपनी जगह सही है। उनका सोचना सही है कि नागरिकों ने यदि जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने का फैसला किया है तो उसकी पालना होनी चाहिए। लेकिन उसके लिए संसद का कायदा बदला जाए या ब्रिटेन अपने आपको व्यापारिक अराजकता में धकेले तो यह भी सही नहीं है। 

तभी तीन साल से ब्रितानी लोकतंत्र इस बहस में उलझा हुआ है कि यूरोपीय बाजार से अलग होने का फैसला कैसे हो? किन शर्तों पर हो और कहीं जनमत संग्रह का फैसला आत्मघाती तो नहीं है? इस चक्कर में दो प्रधानमंत्री और उनकी सरकारें गईं। फिलहाल बॉरिस जॉनसन यह ठान कर प्रधानमंत्री बने हैं कि कुछ भी हो जाए, यूरोपीय संघ के साथ आगे के करार, समझौते हों या न हों 31 अक्टूबर का दिन ब्रिटेन का यूरोपीय संघ में आखिरी होगा। 

यह प्रधानमंत्री की जिद्द है। लेकिन इसके लिए प्रधानमंत्री ने धांधली रची जो संसद का अधिवेशन ऐसे टाइमफ्रेम वाला बनवाया, जिसमें संसद न बैठी हो और बिना संसद के ठप्पे के याकि ब्रेक्जिट समझौते के ब्रिटेन आधी रात को यूरोपीय संघ से बाहर हो जाए। तभी बॉरिस जॉनसन की इस मंशा, इरादे से ब्रिटेन में भारी बवाल हुआ। ब्रिटेन में ऐसा हल्ला हुआ मानो तानाशाह आ गया हो और पुतिन जैसे तानाशाह बॉरिस ज़ॉनसन हों। संदेह नहीं कि यूरोपीय संघ से ब्रिटेन को बाहर कराने के आंदोलन में बॉरिस जॉनसन का रोल और कंजरवेटिव पार्टी में उनके उधम ने उन्हें पुतिन, डोनाल्ड ट्रंप जैसे राष्ट्रवादी सांड़ के चेहरे-मोहरे वाले नेताओं में शामिल किया हुआ है। इसलिए ज्योंहि उन्होंने संसद को बाईपास करते हुए ब्रेक्जिट का रोडमैप बनाया तो दुनिया भर में चर्चा हुई कि देखो, ब्रिटेन जैसे पुराने, खांटी लोकतांत्रिक देश में भी कैसा उदंड-तानाशाह नेता सत्ता में आया है। 

तभी सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी में भी विद्रोह हुआ। अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री के खिलाफ 21 सांसदों ने विद्रोह किया। ससंद में सरकार के 301 वोटों के आगे 328 वोट के बहुमत से अब जो फैसला है तो उस अनुसार लेबर पार्टी के सांसद के उस बिल का रास्ता बना है, जिसमें कहा गया है कि यदि यूरोपीय संघ के साथ सहमति से ब्रेक्जिट न हो तो तारीख आगे बढ़े।  लेकिन अपने खिलाफ वोट पड़ने के बाद जॉनसन ने कहा है कि वे देरी करने और यूरोपीय संघ से वापिस बात करने का प्रस्ताव नहीं मानेंगे क्योंकि तब यूरोपीय संघ का सौदेबाजी में कंट्रोल होगा। यूरोपीय संघ अपनी चलाएगा।  

तभी प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने लोगों से कहा है कि वे चुनाव के लिए तैयार रहें। 15 अक्टूबर को चुनाव की सिफारिश करेंगे। आम चुनाव का फैसला आसान नहीं है। इसके प्रस्ताव के लिए फिक्स टर्म पार्लियामेंट एक्ट की बंदिश से बाहर निकलने के लिए संसद का दो-तिहाई समर्थन सरकार को चाहिए।  फिलहाल सरकार के पास बहुमत नहीं है और विपक्ष के नेता ने दो टूक ऐलान किया हुआ है कि जब तक समझौता नहीं तो ब्रेक्जिट नहीं वाला प्रस्ताव यह संसद पास नहीं करती तब तक वे सरकार का प्रस्ताव नहीं मानेंगे।

कुल मिलाकर ब्रेक्जिट ने ब्रिटेन के लोकतंत्र को झिंझोड़ा हुआ है। पार्टियों में फूट है। संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग राय है। जनता बंटी हुई है। मीडिया बंटा हुआ है और राष्ट्र-राज्य की दशा-दिशा तय करने वाले हर क्षेत्र में यह तय नहीं हो पा रहा है कि ब्रिटेन के हित में, दीर्घकाल में यूरोपीय संघ से उसका अलग होना हितदायी होगा या नुकसानदायी। ध्यान रहे जनमत संग्रह में भी सिर्फ दो प्रतिशत के अंतर से यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला हुआ था। तब से अब तक कई बार बहस हुई है कि जनमत संग्रह का वह फैसला चलते-चलाते अलटप्पे में यूं ही हो गया था। उस वक्त लोगों को अनुमान नहीं था कि इससे कितना नुकसान होगा और ब्रिटेन को आयरलैंड, स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड आदि पर असर में भी बहुत उलझनें होगी। इसलिए दोबारा जनमत संग्रह की भी बड़ी मांग हो गई है। 

ब्रिटेन की समस्या है कि वह यदि बिना करार के तय दिन पर यदि बिना पूर्व सहमति, समझौते के अलग हुआ तो उसका व्यापार, और व्यवहार यूरोप के तमाम देशों से बुरी तरह ठप्प पड़ जाएगा। यूरोपीय संघ और उसके देशों को फर्क नहीं पड़ना है लेकिन ब्रिटेन से जो सामान यूरोप में जाता है वह पूरा निर्यात गड़बड़ाएगा। डोनाल्ड़ ट्रंप, चीन और रूस ने परोक्ष तौर पर ब्रिटेन के ब्रेक्जिट समर्थक नेताओं को भड़काया हुआ है कि यूरोपीय संघ छोड़ा तो हम मदद और व्यापार समझौते के लिए तैयार हैं। लेकिन एक तरफ सीमा से सटा जमा जमाया बाजार है तो दूसरी तरफ दूर की अनिश्चितताएं है। ऐसे में कैसे ब्रिटेन में  आम राय बन सकती है? 

कुल मिला कर तीन सालों में ब्रिटेन ने अपने को बहुत अनिश्चय में फंसाया है। बावजूद इसके यह अनुभव बताता है कि ब्रिटेन में लोकतंत्र कैसा पका हुआ है। लम्हों से खता हुई तो उसे आंख मूंद कर, मूर्खताओं के साथ नहीं माना जाता है, बल्कि संसद, राजनीतिक दल, व्यवस्था और सरकार-दर-सरकार विचार मंथन से आगे बढ़ा जाता है, यह ब्रिटेन का अनुभव बताता है। इस प्रक्रिया को नए प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने हाईजैक करना चाहा। सर्वमान्य ब्रेक्जिट समझौते की जगह तारीख आई तो यूरोप से अलग हो जाएंगे के अंदाज में अपनी राय को प्रधानमंत्री ने जब थोपना चाहा तो उनकी पार्टी के लोग ही बागी हो गए। ध्यान रहे खांटी पुराने कंजरवेटिव नेताओं (जैसे चर्चिल का पोता, दो पूर्व मंत्री) ने बॉरिस जॉनसन के खिलाफ अविश्वास जतलाया है। पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट डालते हुए इन्होंने अपने जो वैचारिक आधार बताए, अंतर आत्मा से जो कुछ कहा वह वैचारिकता से साथ है। भारत में जैसे दलबदल होता है वैसा वहां कुछ नहीं है। 

जो हो, बॉरिस जॉनसन अपनी नहीं चला पा रहे हैं। सत्तारूढ पार्टी में बगावत हो गई है। मध्यावधि चुनाव होते दिख रहे हैं और वे कंजरवेटिव पार्टी के लिए आत्मघाती भी हो सकते हैं। सचमुच ब्रिटेन का ब्रेक्जिट ब्रिटेन को बहुत बुरी तरह खदबदा दे रहा है।      

 

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