• [EDITED BY : हरि शंकर व्यास] PUBLISH DATE: ; 06 February, 2018 12:20 AM | Total Read Count 873
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‘द पोस्ट’:  प्रजातंत्र हो तो अमेरिका जैसा!

मैं अमेरिका को उसकी ताकत, उसके विकास, उसके वैभव, उसके पैसे के कारण नहीं मानता। मैं अमेरिका का कायल उसकी श्रेष्ठताओं से हूं। विषय कोई हो, क्षितिज कोई हो, मंजिल कोई हो, विधा कोई हो उसमें उसकी श्रेष्ठता देख बार-बार विचार बनवाती है कि क्या तो राष्ट्र है और क्या उसके लोग गजब। अमेरिका को ले कर मेरी पुरानी थीसिस (कई बार लिख चुका हूं) है कि दो-तीन सौ साल पहले योरोप के सर्वाधिक जीवट वाले, संकल्पवान, स्वतंत्रचेता लोगों ने सात समंदर पार राष्ट्र बनाया तो उसकी नियति इसलिए नंबर एक बनी रहनी  की है क्योंकि लोगों के डीएनए, तासीर में स्वतंत्रता की जिद्द कूट-कूट कर भरी है। लोगों में जोखिम-उद्यम- नयेपन की आंकक्षा डीएनएगत है। ऐसे ही डीएनए वाले तो सात समंदर के खतरे को पार कर अमेरिक पहुंचे थे। उनकी पीढिया अमेरिका है। भारत से भी वे अमेरिका गए जो श्रेष्ठता, स्वतंत्रता की चाह लिए है। तमिलनाडु के अय्यर, अयंगर याकि श्रेष्ठीजनों को आरक्षण ने नौकरियों से महरूम किया तो वे अमेरिका गए और वहां क्रीमी लेय़र बने। अमेरिका जोखिम उठाने वालों, श्रेष्ठ बुद्वी, स्वतंत्रचेताओं का जब है तो वह सिरमौर बनेगा ही! वह तमाम प्रयोगों के साथ स्वतंत्रता की मूल बात पर अडिग रहेगा। 

तभी अमेरिकी समाज में एक्स्ट्रीम देखेगा तो चेक और बैलेंस का प्रबंधन भी। सब स्वतंत्र तो जवाबदेह भी! स्वतंत्र इतना कि क्रिएटिविटी की हर छूट तो जवाबदेही ऐसी कि खरबपति हो या राष्ट्रपति उसे कोई भी एक्सपोज कर सकता है। उसे छोटी अदालत भी जवाबदेह बना सकती है।  

कह सकते है दूर के ढोल सुहाने और व्यवहार में वहां माफिया है तो दस तरह का कदाचार, भ्रष्टाचार भी है। पर यदि आधुनिक काल की उपलब्धियों, मानवीय विकास, श्रेष्ठताओं में दिनोंदिन निखार के रिकार्ड पर समग्रता से सोचे तो संदेह नहीं रहेगा कि इंसान को अमेरिका में जो संपूर्णता प्राप्त है वह न पहले कहीं थी न है और न शायद आगे हो। इस सबकी एक वजह उसका संविधान भी है। व्यवस्था के तमाम अंगों का चेक-बैलेंस में बंधा हुआ होना और अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की आजादी से नागरिक को आजाद, बलशाली बनाएं रखने का सौ फिसद प्रंबंधन लोगों के पंख है। 

अपनी थीसिस है वहा हर नागरिक के बंदूक रख सकने का संवैधानिक अधिकार और मीडिया की स्वतंत्रता वे दो प्रतीकात्मक बाते है जिससे प्रमाणित है कि वहां संविधान ने सचमुच में निज स्वतंत्रता के सत्व के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तत्व में कौम को ऐसे गुथा है जिसमें नागरिक को हक को ले कर चिंता करनी की जरूरत नहीं पडती। इसी की सहज नेसर्गिकता में सबकुछ बना है, निखरा है और श्रेष्ठता के एवरेस्ट छूए है। सो आश्चर्य नहीं उसका ज्ञान-विज्ञान ब्रहाण्ड के रहस्यों में सैंध लगाने में, शेष मानवता को लीड करने में लगातार सफल, समर्थ है।  

इतनी बडी बात के साथ अब मैं यह छोटी बात जोड दे रहा हूं कि इसका एक प्रतीक हालीवुड की फिल्में भी है। भला कहानी सुनाने में हॉलीवुड का कोई मुकाबला है!  मनोरंजन में जिसकी जो भी चाहना है उसका पूर्तिकर्ता यदि अमेरिका है तो यह अमेरिकी वर्चस्व, दादागिरी, सांस्कृतिकता का हमला नहीं है बल्कि वह सहज क्रिएटिवी है जिसमें सबकुछ बेजोड है तो है। अमेरिकी अंदाज, रचनात्मकता, क्रिएटीविटी में स्वतंत्रता के चलते इतना कुछ नया मिलता है कि शेष विश्व अनदेखी नहीं कर सकता।  या तो उसे सलाम करना होगा या नकल करनी होगी।  

इस फर्क को समझना चाहिए कि अमेरिका मौलिक है और बाकि नकल करते हुए तो ऐसा वहा लोगों को प्राप्त सहज, नैसर्गिक आजादी से श्रेष्ठता बनाने के अवसर से है। भारत में आजादी नहीं है इसलिए भारत में रहते हुए लोगों की प्रतिभा वैसी नहीं खुलती जैसी अमेरिका में खुलती है। अमेरिका का संविधान पंख देता है, उडने को कहता है और वह भी सुरक्षा के साथ।  हमारा संविधान, उससे बनी व्यवस्था पंख काटती है, उड़ने देने की बात तो दूर उठ खडे होने की कोई कोशिश करेगा तो केकडों की तरह व्यवस्था उसे नीचे खींच लेगी। वहां उड़ने का खुला कंपीटिशन है तो भारत में क्रोनीवाद से तय होगा कि कौन उडेगा और कौन नहीं! 

तभी अमेरिका मौलिक है और बाकि सब उसके क़ॉपीराइट का उल्लंघन करके नकल करने वाले। अमेरिकीयों की  स्वतंत्रता उन्हे सबकुछ सोचने का, करने का मौका देती है। इसकी बानगी इस्लाम को ले कर 9/11 के बाद का अमेरिका भी है। मेरी स्मृतियों में अमेरिका के दो वक्त, फेज की कहानियां है। एक वक्त कम्युनिस्ट विचारधारा के खिलाफ अमेरिका के कमर कसे हुए होने का था। दूसरा इस्लाम के खिलाफ बने माहौल का है। दोनों मामलों में अमेरिकीयों में एक्स्ट्रीम चिंतन-मनन और रीति-नीति रही। वह भी वक्त था जब साम्यवाद के खिलाफ माहौल में हालीवुड से लेकर विश्वविद्यालयों तक में मैकॉरर्थिज्म में लोगों को छांट-छांट कर कलंकित किया गया। केनेडी, जॉनसन, निक्सन का वह दौर कई तरह की ज्यादतियों का था। बावजूद इसके कौम का सामूहिक अवचेतन तब भी इस मूल बात से प्रेरित था कि जीने की स्वतंत्रचेता के अमेरिकी तरीके पर क्योंकि खतरा है इसलिए अपने आपको झौंक कर बचाना है। 

सोवियत संघ खत्म हुआ और साम्यवाद फेल हुआ तो अमेरिका सामान्य स्थिति में लौटा। फिर इस्लामी उग्रवाद का दौर शुरू हुआ तो बुश काल से अमेरिका इस विचार मंथन में उलझा हुआ है कि जीने के उसके स्वतंत्रचेता तरीके पर इस्लामी घात से कैसे निपटा जाए? नतीजे में आज डोनाल्ड ट्रंप वैसे ही राष्ट्रपति है जैसे साम्यवाद की विकट चुनौती के बीच अनुदारवादी निक्सन राष्ट्रपति बने थे। 

तभी राष्ट्रपति निक्सन और डोनाल्ड ट्रंप कई समानताएं लिए हुए है। उन्होने भी साम्यवाद के भूत में मनमानी चाही थी। अपने आपको निरंकुश राष्ट्रपति बना नागरिकों को उल्लू बनाना चाहा कि वे जो कर रहे है वह उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए है। क्या वैसा ही अंदाज आज डोनाल्ड ट्रंप का नहीं है? 

है! तभी निक्सन ने अपने वक्त में मीडिया को दबाना चाहा, उनका प्रेस से पंगा हुआ तो आज डोनाल्ड ट्रंप का भी मीडिया से पंगा है। डोनाल्ड ट्रंप और निक्सन की तासीर की साझा भंडास यह है कि वे देशहित, राष्ट्रीय सुरक्षा में काम कर रहे है और वांशिगटन का मीडिया उन्हे काम नहीं करने दे रहा। इनकी शिकायत थी कि अखबार हमें समर्थन नहीं दे रहे है, हमसे सवाल कर रहे है, हमें जवाबदेह बना रहे है? 

सोचे, दुनिया का सर्वाधिक ताकतवर सत्तावान और उसकी परवाह न करते हुए अमेरिकी अखबार! अंत में कौन जीता! अखबार, द पोस्ट, द न्यूयार्क टाइम्स!  इसलिए क्योंकि अमेरिका संविधान से चलता है, चेक-बैलेंस की व्यवस्था लिए हुए है। वहां सचमुच है स्वतंत्र-ईमानदार सुप्रीम कोर्ट। और भारत में हम.....

बहरहाल लौटा जाए स्टीव स्पीलबर्ग की फिल्म ‘द पोस्ट’ पर!  पत्रकारिता,  मेरे पेशे पर बनी एक अतुलनीय फिल्म पर।

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