• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 04 May, 2019 11:58 AM | Total Read Count 284
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मन्ना डे की निशानियां ढेरों

श्रीशचंद्र मिश्रः मूल रूप से बांग्ला में छपी और बाद में हिंदी, अंग्रेजी, मराठी समेत कई भाषाओं में अनुदित हुई अपनी आत्मकथा- ‘जिबोरन जल्साघोरे’ (मेमोरीज कम अलाइव) में मन्ना डे कहीं भी शिकायत या अफसोस करते नहीं दिखते हैं। यह आत्मकथा 2005 में बाजार में आई थी। उसी साल फिल्म ‘उमर’ में मन्ना डे ने आखिरी फिल्मी गीत- ‘दुनिया वालों को नहीं भी कुछ खबर’ गया था। यह सचमुच बड़े आश्चर्य की बात है कि 63 साल के इस सफर में आए उतार-चढ़ाव में किसी व्यक्ति से उन्हें शिकायत नहीं हुई, किसी स्थिति से वे निराश नहीं हुए और न ही अपनी उपेक्षा से उन्हें वेदना हुई। 

फिल्म उद्योग हमेशा से खेमेबंदी में बंटा रहा है। इससे दूर रह कर संगीत को ही अपना खेमा मान कर लगातार उससे खूंटा बांध कर बैठे रहे मन्ना डे को निश्चित रूप से कुछ अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ा होगा। यही कम पीड़ाजनक नहीं रहा होगा कि 63 साल में गाए गए करीब एक हजार फिल्मी गीतों में से बमुश्किल तीस चालीस हीरो पर फिल्माए गए। उनके ज्यादातर गीत चरित्र अभिनेताओं के हिस्से में आए। तीस से ज्यादा संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया। लेकिन अनिल विश्वास, एसडी वर्मन, शंकर जयकिशन और सलिल चौधरी के साथ ही उनकी निरंतरता बन पाई। यह कई बार हुआ कि कोई मुश्किल गीत किसी और पार्श्वगायक से गाते नहीं बना तो उसे अंतिम विकल्प के रूप में मन्ना डे को सौंप दिया गया। मन्ना डे ने इस तरह की स्थितियों को कभी मान-अपमान या हार-जीत से नहीं जोड़ा। 

मन्ना डे के करीबी लोग बताते हैं कि निजी बातचीत में भी वे कभी किसी की आलोचना नहीं करते थे। उन्हें अगर कभी शिकायत होती थी तो अपने आप से कि संगीत की अपार संपदा का वे पर्याप्त इस्तेमाल नहीं कर पाए। पूरन चंद और महामाया डे के घर जलियांवाला कांड के तीन हफ्ते बाद एक मई 1919 को जन्मे प्रबोध चंद्र डे को संगीत का शौक अपने चाचा संगीताचार्य केसी डे से लगा। केसी डे यानी कृष्ण चंद्र डे नेत्रहीन थे लेकिन उनकी संगीत विद्वता की पूरे कोलकाता में धूम थी। 

 इंदु बावुरा पाठशाला से प्राइमरी शिक्षा पाने के बाद स्काटिश चर्च कालेज में गायकी की लगन ने उन्हें इतना लोकप्रिय कर दिया है कि कालेज का सालाना जलसा हो या गली मोहल्ले का पूजा उत्सव, सब जगह उन्हें गाने के लिए बुलाया जाने लगा। लेकिन भविष्य की चुनौतियां सामने खड़ी थी। करिअर का सवाल उठा तो कोलकाता में बेहतर संभावना न पाकर 1940 के दशक में मन्ना डे चाचा के साथ मुंबई पहुंच गए। पहले चाचा के सहायक बने। 1942 में केसी डे के संगीतबद्ध किए ‘तमन्ना’ के गीत ‘जागो आई उषा पंछी बोले जागो’ से उनके पार्श्वगायन की शुरुआत हुई। 

यह गीत मन्ना डे ने सुरैया के साथ गाया था। अनिल विश्वास ने 1944 में ‘कांदबरी’ के लिए गीत गवाया- ‘ओ प्रेम दीवानी संभल के चलना।’ जफर खुर्शीद के संगीत निर्देशन में ‘दूर चले’, फिल्म का गीत ‘दिल चुराने के लिए’ गाने के अलावा 1950 तक  ‘आज भोर आई’ (चलते-चलते) ‘हे गगन में बादल ठहरे’ (विक्रमादित्य) व ‘आओजी मोरे’ (इंसाफ) जैसे  करीब तीन दर्जन गीत मन्ना डे ने गाए। लेकिन ज्यादातर फिल्में पौराणिक, स्टंट या छोटे बजट की थी। संगीतकार पंडित इंद्र ने फिल्म ‘गीत गोविंद’ के चार गीत मन्ना डे से क्या गवाए कि उनकी किस्मत पलट गई। 

चाचा केसी डे के मुंबई वाले घर में अक्सर संगीत की महफिल जमती थी जिसमें एसडी बर्मन, बेगम अख्तर व फैयाज खान आदि बैठते थे। यहीं सचिन देव बर्मन से उनकी घनिष्ठता हुई। मन्ना डे का कहना था कि एसडी के गोरे रंग व सरल स्वभाव की वजह से वे उनकी तरफ आकर्षित हुए। दोनों की दोस्ती लंबे समय तक चली। लेकिन उनमें खटपठ भी होती थी। मन्ना डे को हालांकि बचपन में कुश्ती व मुक्केबाजी का शौक था। आंख की तकलीफ की वजह से खिलाड़ी बनने का सपना तो टूट गया। शौक पूरा करने के लिए उन्होंने क्रिकेट के मैच देखने शुरू कर दिए। बंगाली होने की वजह से फुटबाल से उन्हें जन्मजात लगाव था और यही वह मुद्दा था जिस पर मन्ना डे और एसडी बर्मन में हमेशा मतभेद रहे। वजह सिर्फ यह थी कि एसडी बर्मन ईस्ट बंगाल के समर्थक थे और मन्ना डे मोहन बागान के। कोलकाता के इन दो दिग्गज फुटबाल क्लबों के बीच सौ साल से कांटे की टक्कर होती रही है। 

शुरुआती दौर में हालांकि शंकर राव व्यास, एसके पॉल, मोहम्मद शफी, खेम चंद प्रकाश जैसे संगीतकारों ने मन्ना डे से गीत गवाए लेकिन सबसे ज्यादा मौका दिया अनिल विश्वास ने। ‘गजरे’, ‘हम भी इंसान हैं’, ‘हम दर्द’, ‘महात्मा कबीर’, ‘जासूस’, ‘परदेसी’ के गीतों ने मन्ना डे को मुंबई में स्थापित तो कर दिया लेकिन उन्हें स्टार बनाया सचिन देव बर्मन के संगीत निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘मशाल’ के गीत ‘ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल’ ने 1950 में बनी इस फिल्म के गीत कवि प्रदीप ने लिखे थे। 1952 में मराठी व बांग्ला में एक ही नाम व एक ही कहानी पर बनी फिल्म ‘अमर भूपाली’ के गीत मन्ना डे ने गाए।

लेकिन बांग्ला फिल्मों में उनका विधिवत प्रवेश 1954 में बनी फिल्म ‘गृह प्रवेश’ से हुआ। बांग्ला का एक गीत ‘आमी श्री श्री भोजोहारी मन्ना’ गीतकार पुलक वंद्योपाध्याय ने मन्ना डे को रसोई में खाना बनाते देख कर लिखा और यह गीत जबर्दस्त हिट हुआ। फिल्म संगीत का स्वर्णिम युग माने जाने वाले 1050 से 1070 तक के दौर में मन्ना डे ने मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, तलत महमूद व मुकेश को बराबर की टक्कर दी। 1953 से 1969 तक मन्ना डे ने 758 फिल्मी गीत गाए। 1953 से 1955 के बीच 83 गीत उनके हिस्से में आए। 1956 में मन्ना डे ने 45, 1957 में 95 और 1958 में 64 गीत गाए।

आवाज में गजब की विविधताः पिछले दिनों शास्त्रीय और सुगम संगीत के विशेषज्ञों ने हिंदी फिल्मों के 32 सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ गीत चुने। उनमें दो गीत मन्ना डे के थे। 1961 में फिल्म ‘काबुली वाला’ के लिए प्रेम धवन का लिखा और सलिल चौधरी का संगीतबद्ध किया गीत- ‘ए मेरे प्यारे वतन, तुझ पे दिल कुर्बान’ में देश प्रेम का, अपनों के पास न होने की कसक का भाव इतनी मार्मिकता से उभरा कि उसने हर सुनने वाले को सम्मोहित कर दिया। 1963 में बनी फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’ के लिए शैलेंद्र ने एक गीत लिखा- ‘पूछो न मैंने कैसे रैन बिताई।’ संगीत दिया था एसडी बर्मन ने। पार्श्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति का कहना है कि इस गीत में जो आध्यात्मिक तल्लीनता थी, उसे मन्ना डे के अलावा कोई उतनी सजीवता से गा नहीं सकता था। 

चौरासी साल के सवाक फिल्मों के इतिहास के पंद्रह हजार गीतों में से 32 छांटना आसान काम नहीं है। संतुलन बनाए रखने के लिए कहीं न कहीं गफलत हो जाने की संभावना हमेशा बनी रहती है। इस लिहाज से 32 गीतों में मन्ना डे के गाए दो गीतों का शामिल होना उनके कद और उपलब्धियों का सही मूल्यांकान नहीं हो सकता। अगर उनके पूरे फिल्मी सफर का मूल्यांकन किया जाए तो हिंदी फिल्मों के लिए गाए उनके करीब नौ सौ गीतों में से कम से कम सौ अपनी विविधता और विशिष्टता की वजह से फिल्म संगीत की अमूल्य धरोहर में बिना किसी विवाद के शामिल किए जा सकते हैं। 

समकालीन पार्श्वगायकों की तुलना में मन्ना डे के हिस्से में भले ही कम गीत आए लेकिन गुणवत्ता और मधुरता की कसौटी पर उनके कई गीत बराबर की टक्कर देने वाले रहे। मन्ना डे कभी किसी शैली के मोहताज नहीं रहे। रोमांटिक गीत उन्होंने गाए तो उनके गीतों में पीड़ा व तड़प भी उभरे। भजन गाने में उन्होंने जो कौशल दिखाया वह कव्वाली में भी गूंजा। संगीतकार मदन मोहन के लिए ‘देख कबीरा रोया’ का गीत ‘कौन आया मेरे घर के द्वारे पायल की झंकार लिए’ गीत गाने वाले मन्ना डे ने रोशन के लिए ‘बरसात की रात’ की कव्वाली ‘न तो हमसफर की तलाश है’ और ‘यह इश्क इश्क है इश्क इश्क’ गाकर ऐसा समां बांधा कि दोनों गीत सदाबहार गीतों की कतार से जुड़ गए। 

शास्त्रीय संगीत का मन्ना डे ने उस्ताद अमन अली खां और उस्ताद अब्दुल रहमान खां से बाकायदा प्रशिक्षण लिया और वह भी तब जब वे फिल्मों में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस प्रशिक्षण को उन्होंने बेकार नहीं जाने दिया। सुगम संगीत की चौखट में सजा कर उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित कई गीत गाए। ‘मंजिल’ का ‘हटो काहे को झूठी बनाओ बतिया’, ‘हम दर्द’ का ‘पतझड़ जैसी जीवन मेरा’ ‘चाचा जिंदाबाद’ का ‘प्रीतम दरस दिखाओ’ तो कुछ मिसाल है। यह शास्त्रीय आवाज पाश्चात्य संगीत में रचे बसे ‘भूत बंगला’ के गीत ‘आओ ट्विस्ट करें’ में भी पूरी शिद्दत से उभरी। जिन गीतों को गाने से मुकेश, मोहम्मद रफी या किशोर कुमार जैसे पार्श्वगायक कतराते रहे उन्हें मन्ना डे ने पूरी तन्मयता से गाया।  

‘मामा ओ मामा’ (परवरिश), ‘मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा’ (पगला कहीं का), ‘एक चतुर नार करके सिंगार’ (पड़ोसन), ‘जोड़ी हमारी जमेगा कैसे जानी’ (औलाद), ‘चुनरी संभाल जरा उड़ी चली जाए रे’ (बहारों के सपने) ‘दो दीवाने दिल के चले हैं देखो मिलके’ (जौहर महमूद इन गोवा), ‘फुल गेंदवा न मारो लगत करेजवा में चोट’ (दूज का चांद) ‘लागी मनवा के बीच कटारी कि मारा गया ब्रह्मचारी’ (चित्रलेखा), ‘मैं तेरे प्यार में क्या क्या न हुआ दिलवर’ (जिद्दी), ‘खाली डिब्बा खाली बोतल’ (नील कमल) जैसे दर्जनों गीत जो फूहड़ लग सकते थे, मन्ना डे की आवाज पाकर शिष्ट और मनोरंजक हो गए। इनमें कई गीत महमूद पर फिल्माए गए और इन्हीं गीतों के बल पर महमूद एक जमाने में नायक से ज्यादा पारिश्रमिक पाने वाले कलाकार हो गए थे।

चुनौती कभी बाधा नहीं बनीं ः मन्ना डे की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने कभी चुनौतियों की चिंता नहीं की। एक बार वे जरूर संशय में पड़ गए जब ‘बसंत बहार’ के गीत ‘केतकी गुलाब जूही’ में उन्हें शास्त्रीय गायन के दिग्गज पंडित भीमसेन जोशी के साथ गाने को कहा गया। मन्ना डे तैयार नहीं हुए। पत्नी सुलोचना कुमारन ने हौंसला बंधाया तो वे राजी तो हो गए लेकिन रिकार्डिंग से पहले एक पखवाड़े रिहर्सल की। गीत रिकार्ड हुआ पंडित भीमसेन जोशी ने उनकी पीठ थपथपा कर शाबासी दी और कहा ‘तुम शास्त्रीय गायन क्यों नहीं करते?’ इसी फिल्म का एक और यादगार गीत मन्ना डे ने गाया- ‘सुर ना सजे क्या गाऊं मैं।’ इसी तरह एक बार वे उलझन में पड़े ‘पड़ोसन’ के गीत ‘एक चतुर नार करके सिंगार’ के मौके पर।

  वह गीत उन्हें किशोर कुमार के साथ गाना था। बरसो पहले हालांकि मन्ना डे ने किशोर कुमार के साथ ‘चलती का नाम गाड़ी’ के लिए गीत ‘बाबू समझो इशारे हारन पुकारे’ गाया था लेकिन दोनों में ट्यूनिंग कभी नहीं जमी। कुल जमा छह गीत उन्होंने किशोर कुमार के साथ गाए। ‘पड़ोसन’ के गीत को लेकर मन्ना डे की उलझन यह थी कि उस गीत में किशोर कुमार उन पर हावी हो रहे थे। महमूद ने उन्हें समझाया कि मुकाबला दो गायकों के बीच नहीं, दो फिल्मी पात्रों के बीच है। तब कहीं जाकर मन्ना डे राजी हुए और बारह घंटे में गीत रिकार्ड हुआ।

आमतौर पर मन्ना डे को किसी गीत की रिकार्डिंग में इतना समय नहीं लगता था। एक बार तो सुबह सुबह लुंगी और बनियान में एसडी बर्मन उनके घर पहुंचे, बोले- हारमोनियम निकालो और इस धुन पर यह गीत गाओ। घंटे भर में मन्ना डे ने तैयारी कर ली और अगले दिन राग अहीर भैरवी पर आधारित ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’ का गीत- ‘पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई’ रिकार्ड हो गया। मन्ना डे की गायकी पर अभिनय करना हर कलाकार को मुश्किल लगता था। ‘दिल ही तो है’ के गीत -‘लागा चुनरी में दाग’ की रिकार्डिंग के वक्त राज कपूर स्टूडियो पहुंच गए। बोले ‘दादा इसे आसान तरीके से गा दो।’ मेरे लिए इस पर अभिनय करना मुश्किल हो जाएगा।

संगीतकार रोशन बदलाव के विरोध में थे। राज कपूर को आखिर उन्होंने मूल गीत गाने को राजी कर लिया। कल्याणजी आनंद जी जब ‘उपकार’ का गीत ‘कस्मे वादे प्यार वफा’ रिकार्ड करा रहे थे, प्राण ने कहा ‘मन्नाजी गाना ऐसे गाना कि मैं ठीक से उस पर अभिनय कर सकूं।’ प्राण की खलनायक की छवि खरोचने में इस गीत का सबसे बड़ा योगदान रहा। बाद में ‘जंजीर’ में प्राण के लिए एक और यादगार गीत मन्ना डे ने गाया- ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी।’ अनिल विश्वास, सलिल चौधरी व एसडी बर्मन के अलावा शंकर जयकिशन ने मन्ना डे की आवाज का बेहतरीन इस्तेमाल किया।

खुद मन्ना डे ने स्वीकार किया कि उनकी क्षमताओं को शंकर जयकिशन ने अच्छी तरह समझा। ‘तू प्यार का सागर है’ (सीमा), ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ व ‘मुड़ मुड़ के न देख’ (श्री420), ‘लपक झपक तू आ रे बदरवा’ (बूट पालिश), ‘झूमता मौसम मस्त महीना’ (उजाला), ‘मुस्कुरा लाडले मुस्कुरा’ (जिंदगी), ‘ये रात भीगी भीगी’, ‘आजा सनम मधुर चांदनी में हम’ व ‘जहां मैं जाती हूं’ (चोरी-चोरी) ‘दिल की गिरह खोल दो’ (रात और दिन) और ‘ए भाई जरा देख के चलो’ (मेरा नाम जोकर) जैसे दर्जनों गीत उनकी जुगलबंदी में निखरे। मन्ना डे हालांकि किसी एक संगीतकार के मोहताज नहीं रहे। तीस से ज्यादा संगीतकारों के लिए उन्होंने गीत गाए। शायद ही कोई ऐसा संगीतकार होगा जिसके लिए मन्ना डे ने यादगार व लोकप्रिय गीत न गाए हों।

मदन मोहन के लिए ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’ (देख कबीरा रोया),  वसंत देसाई के लिए ‘ए मालिक तेरे बंदे हम’ ( दो आंखे बारह हाथ) नौशाद के लिए ‘चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया घटती जाए रे’ (मदर इंडिया), रवि के लिए ‘ए मेरी जोहार जबी’ (वक्त) व ‘तूझे सूरज कहूं या तारा’ (एक फूल दो माली) सी रामचंद्र के लिए ‘तू छुपी है कहां’ (नवरंग), सज्जाद हुसैन के लिए ‘फिर तुम्हारी याद आई ए सनम’ (रुस्तम सोहराब)और जयदेव के लिए ‘चले जा रहे हैं मुहब्बत के मारे’ (किनारे किनारे) जैसे गीत गाकर मन्ना डे ने सफलता के नए प्रतिमान हुए।

और भी कई कीर्तिमान मन्ना डे के साथ जुड़े ः मसलन वे अकेले पार्श्व गायक हैं जिन्होंने चौदह पंद्रह भाषाओं में गीत गाए। हिंदी के अलावा बांग्ला में 6121, गुजराती में 85, मराठी में 55, भोजपुरी में 35, पंजाबी में तेरह, उड़िया में सात गीत गाने वाले मन्ना डे ने मगधी, मैथिली, असमिया, कोंकणी, सिंधी, नेपाली व मलयालम भाषा की फिल्मों के लिए भी गीत गाए। खास बात है कि इन सभी भाषाओं में गाए गए गैर फिल्मी गीतों की संख्या भी अच्छी खासी है। कन्नाड़ की तीन फिल्मों के लिए ही मन्ना डे ने गीत गाए लेकिन कन्नड़ भाषा और बेंग्लेरू शहर से उनका गहरा लगाव रहा। पत्नी सुलोचना कुमारन से उनकी मुलाकात बेंग्लुरू में हुई थी।

1953 में केंचप्पा रोड पर उनकी शादी हुई थी। पति-पत्नी अक्सर बेंग्लुरू के मशहूर कब्बन पार्क व लाल बाग में घंटों घूमा करते थे। 2000 में मन्ना डे ने बेंग्लुरू को अपना स्थाई निवास बना लिया था। नब्वे साल की उम्र तक वे खुद गाड़ी चला कर मछली खरीदने जाते थे। पिछले साल तक उनमें खासा जोशो खरोश था। अक्सर समारोह में वे अपने गीत गाते थे। ‘लागा चुनरी में दाग’ तो उन्होंने बेंग्लूर में कई बार गाया। जिन तीन कन्नड़ फिल्मों के उन्होंने गीत गाए थे उन्हें अक्सर महफिलों में गाया करते थे। जनवरी 2012 में पत्नी का कैंसर से निधन होने के बाद वे टूट गए थे। यह कसक बाकी रह गई कि चाह होते हुए पत्नी के लिए कोई व्यक्तिगत प्रेम गीत नहीं गा सके।

प्रतिद्वंद्वंता का अनुभव उन्हें कोलकाता में उस समय हो गया था जब 18 साल की उम्र में 1937 में स्काटिश चर्च कालेज के सांस्कृतिक समारोह में पहली बार भीड़ के सामने गाकर उन्होंने पहला स्थान पाया। लगातार तीन बार अव्वल रहने की वजह से आयोजकों को उनसे यह अनुरोध करना पड़ा कि आगे से वे न गाएं ताकि औरों को भी मौका मिल सके। फिल्मों में जमने के बाद उन्होंने प्रतिद्वंद्वता को खुद पर हावी नहीं होने दिया। मोहम्मद रफी उनके खास दोस्त थे। मुंबई में उनके घर आमने सामने थे। खाली वक्त में दोनों अक्सर पतंग उड़ाया करते थे।  ‘मेरे हुजूर’ के गीत ‘झनक झनक तोरी बाजे पायलिया’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के अलावा मन्ना डे को 1971 में पद्मश्री, 2005 में पद्मभूषण और 2007 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

आखिरी सालों में मन्ना डे राजेश खन्ना की आवाज बन गए। ‘जिंदगी कैसी है पहेली’ (आनंद), ‘तुम बिन जीवन कैसा जीवन’ व ‘भोर आई गया अंधियारा’ (बावर्ची), ‘हसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है’ (आविष्कार), ‘गोरी तोरी पैजनिया’ (महबूब)  व  ‘नदिया चले चले रे धारा’ (सफर) इसका प्रमाण है। ‘बंदिनी’ का गीत- ‘मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे’ गाने वाले मन्ना डे ने ‘दो बीघा जमीन’ में गाया था ‘कुछ तो निशानी छोड़ जा, अपनी कहानी छोड़ जा।’ अपने मधुर गीतों की सचमुच ये ऐसी निशानियां छोड़ गए हैं जो हमेशा उनकी याद दिलाती रहेगी।

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