• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 18 May, 2019 11:19 AM | Total Read Count 162
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दीपिका पादुकोणः तब और अब

श्रीशचंद्र मिश्रः करीब आठ साल पहले एक ग्लैमरस व बिंदास अभिनेत्री के रूप में पहचान बना चुकी दीपिका पादुकोण ने एक टीवी शो में रणबीर कपूर के बारे में ऐसी टिप्पणियां की कि उनका जवाब देने के लिए रणबीर के पिता ऋषि कपूर को आगे आना पड़ा। अच्छी खासी तल्खी पैदा हो गई। दरअसल ‘बचना ए हसीनो’ में काम करते हुए दीपिका व रणबीर में कथित रूप से रोमांस हो गया था। बाद में जब दीपिका को लगा कि आशिक मिजाज रणबीर उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे हैं तो उन्होंने टीवी शो में अपनी भड़ास निकाल दी। यह कहासुनी दीपिका पर ही भारी पड़ी।

गैर फिल्मी परिवार की होने की वजह से फिल्म बिरादरी का भी उन्हें कोई खास साथ नहीं मिला। उनकी पहचान एक लापरवाह और विवादों में ज्यादा रूचि देने वाली अभिनेत्री की बन गई। इसका असर उनके करिअर पर भी पड़ा। दीपिका की गिनती उन अभिनेत्रियों में की जाने लगी जो सुपरहिट फिल्म से शुरुआत कर तीन-चार साल में गुम हो जाती है।

अचानक तस्वीर का रुख बदल गया। यह बदलाव खुद दीपिका ने अपनाया। जब भी सार्वजनिक मंच पर दिखी उनका व्यवहार बेहद शालीन और संयत रहा। इंटरव्यू टीवी शो और प्रेस कांफ्रेंस में दूसरों की टिप्पणियों का हवाला देकर उन्हें कुरेदने की बार-बार कोशिश हुई लेकिन हर बार उन्होंने मुस्कुरा कर हर विवादास्पद सवाल को टाल दिया। करीना कपूर ने जब यह टिप्पणी की कि उनकी छोड़ी फिल्में कइयों को स्टार बना रही है तब भी दीपिका का जवाब था- ‘मैं उनकी आभारी हूं।’ करीना का निशाना दीपिका ही थीं। रोहित शेट्टी की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रास लीलाः राम लीला’ पहले करीना करने वाली थीं। उनके मना करने पर दोनों फिल्में दीपिका को मिल गई और उनकी दुनिया बदल गई। उसके बाद तो ‘बाजीराव मस्तानी’ व ‘पद्मावत’ से दीपिका ने ऐसी जबर्दस्त छलांग भरी कि करीना जैसी कई अभिनेत्रियां पीछे छूट गई।

यह सही है कि सफलता किसी भी व्यक्ति के व्यवहार और शख्सियत में जबर्दस्त बदलाव ला सकती है। फर्क इस बात का होता है कि बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक। यह व्यक्ति विशेष की अपनी प्राथमिकता पर निर्भर होता है कि वह बदली स्थितियों को किस नजरिए से ले। अक्सर सफलता का नकारात्मक असर ज्यादा छोड़ती है। अभिनेता हो या अभिनेत्री, मुट्ठी में अचानक भर आई सफलता को सहजता से हजम कर पाना सबके लिए आसान नहीं होता। दीपिका अगर अपने संक्षिप्त करिअर में अपवाद साबित हो पाई है तो सिर्फ इसलिए कि उन्होंने फिल्म नगरी का मायाजाल शुरुआती ठोकर खाने के बाद जल्दी ही समझ लिया। अपने अनुभवों से उन्होंने जान लिया कि फिल्मी दुनिया पलक झपकते ही किसी को भी चमका सकती है और किसी को धूल चटा सकती है। बिल्कुल सांप सीढ़ी के खेल जैसा मायाजाल है। खेल के शुरू में ही लंबी सीढ़ी पाकर कोई शिखर तक पहुंच जाता है तो कोई सांप के काटने से लुढ़कता चला जाता है।

लोकप्रियता और सफलता एक छलावे की तरह हमेशा एक निर्मम खेल दिखाती है। दीपिका धड़ाधड़ सीढ़ियां चढ़ती हुई दो साल में जिस तरह से चोटी पर पहुंच गई हैं। वह इसी खेल का नतीजा है। 2012 तक तो यह हालत थी कि नंबर एक की दावेदार के लिए मुख्य टक्कर करीना कपूर, कैटरीना कैफ, विद्या बालन व प्रियंका चोपड़ा में मान ली गई थी। अनुष्का शर्मा, सोनाक्षी सिन्हा और दक्षिण से आई आसिन सरीखी अभिनेत्रियों को दूसरी कतार में रख दिया गया था। फिल्मी विशेषज्ञ दीपिका पादुकोण को तो किसी भी गिनती में रखने को तैयार नहीं थे। उनका आकलन गलत भी नहीं था। पहली फिल्म ‘ओम शांति ओम’ के बाद न तो उनकी फिल्मों को कोई खास सफलता मिल पा रही थी और न ही वे अपनी अभिनय प्रतिभा का कोई कमाल दिखा पा रही थी। करिअर पर ध्यान देने की बजाए उलटे सीधे बयानों से दीपिका विवादास्पद जरूर हो रही थीं। यह खास बात है कि मौका हाथ से खिसकने से पहले ही दीपिका ने स्थिति की नजाकत को समझ लिया। गफलत उन्होंने ही की थी और उसे दुरुस्त भी खुद दीपिका ने ही किया। और कोई सलाह देने वाला था भी नहीं।

पिता प्रकाश पादुकोण प्रतिष्ठित बैडमिंटन खिलाड़ी भले ही रहे हों, फिल्मी दुनिया की उठापटक का उन्हें कोई अनुभव नहीं था। बेटी के उनकी तरह खिलाड़ी न बन कर पहले माडलिंग और फिर एक्टिंग करने के फैसले पर उन्हें एतराज कभी नहीं रहा। लेकिन ग्लैमर की दुनिया में दीपिका को अपनी समझ से खुद फैसला करने की शर्त उन्होंने सामने रख दी। माडलिंग से फिल्मों में दीपिका से पहले भी कोई लड़कियां आई थीं। ज्यादातर अपने विदेशी से लगने वाले व्यक्तित्व, भाषा पर ढीला पकड़ और भाव शून्य चेहरे की वजह से फिल्मों में नहीं चल पाईं। दीपिका को मौका मिलने की एक वजह उनका भारतीय चेहरा रहा। दक्षिण भारतीय होते हुए भी हिंदी उच्चारण में वे कमजोर नहीं पड़ीं। इसी वजह से सामान्य रूप से मान्य लंबाई से कई इंच आगे खिंच जाने के बावजूद दीपिका को स्वीकार कर लिया गया। हिंदी फिल्मों में कभी भी यह बर्दाश्त नहीं किया गया कि हीरोइन का कद हीरो से ज्यादा हो। हीरो का अहं इससे आहत हो जाता है। यही वजह है कि आमतौर पर लंबी हीरोइनें ज्यादा नहीं चल पातीं। दीपिका ने इस बाधा को पूरी कुशलता से लांघा। लेकिन जब करिअर की गाड़ी हिचकोले खाने लगीं तो उन्होंने आत्म मंथन किया। अपनी गलतियां महसूस की। समझ लिया कि रिश्ते नातों की भावुकता में उलझने का कोई फायदा नहीं है। अभिनय पर उन्होंने अपना ध्यान केंद्रित किया।

सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने में संयम बरता। किस्मत ने भी उनका साथ दिया। दो साल की जिन चार पांच फिल्मों ने उन्हें स्टारडम दिया उनमें ‘रेस-2’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘हैप्पी न्यू इयर’ जैसी मसाला फिल्में थीं तो ‘कॉकटेल’, ‘फाइडिंग फेनी’, ‘आरक्षण’ व ‘गोलियों की रास लीला राम लीला’ जैसी भावनात्मक फिल्में भी थीं। संयोग से ये सभी फिल्में या तो हिट हो गईं या सराही गईं। दीपिका ने इन फिल्मों में कोई बहुत विलक्षण अभिनय नहीं किया लेकिन पहले दौर की फिल्मों में दिखी दीपिका बदले हुए माहौल में काफी अलग थीं। अभिनय के प्रति सजग, व्यवहार में संयत और हर सफलता के बाद बढ़ती विनम्रता ने दीपिका को आज अभिनेत्रियों में सबसे ऊपर कर दिया है। पिछले तीन साल में उत्कृष्ट अभिनय से दीपिका ने प्रमाणित कर दिया कि स्टारडम के मामले में ही नहीं, अदाकारा के रूप में भी वे उत्कृष्ट हैं।

आसान नहीं रहा बदलाव

अपने करिअर की दिशा को दुरुस्त करने की दीपिका की कोशिश आसान नहीं रही। नृत्य निर्देशक से निर्देशन की कमान संभालने वाली फरहा खान की दूसरी फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में दीपिका को पहला मौका मिला। सामने थे किंग खान शाहरुख खान। फिल्म नायक प्रधान थी। दीपिका को आकर्षक दिखने के अलावा कुछ और ज्यादा नहीं करना था। दीपिका ने सीमित अवसर का पूरा फायदा उठाया। पूरे आत्मविश्वास से उन्होंने कैमरे का सामना किया। फिल्मों में आने से पहले कुछ साल माडलिंग करने का शायद यह असर था। जो गिने चुने दृश्य उनके हिस्से में आए उसका भरपूर इस्तेमाल कर दीपिका ने दिखा दिया कि वे बेजान सुंदर गुड़िया भर नहीं हैं।

‘ओम शांति ओम’ सुपर हिट हुई। यह अलग बात है कि उसका श्रेय उन्हें नहीं मिला। फिर भी पहली फिल्म की सफलता का ठप्पा लग जाने की वजह से दीपिका को लकी मान लिया गया और उन्हें कई फिल्में मिल गईं। लेकिन तात्कालिक सफलता का जो नुकसान होता है, उससे दीपिका भी नहीं बच पाईं। काम पर कम और बयानबाजी व छींटाकशी पर ज्यादा ध्यान देने की वजह से वे पटरी से उतरने लगीं। इससे उनके अभिनय पर असर तो पड़ा ही, ‘कार्तिक कालिंग कार्तिक’, ‘हाउस फुल’, ‘लव आज कल’, ‘चांदनी चौक टू चाइना’ आदि फिल्मों के पिटने से भी दीपिका का बाजार भाव उखड़ गया। मान लिया गया कि दीपिका भी उन्हीं अभिनेत्रियों की कतार में शामिल हो गई हैं जो पहली फिल्म में धुंआधार सफलता पाने के बाद टिमटिमा कर रह जाती हैं। जब सफलता की डोर हाथ से खिसकने लगी थी, दीपिका चैतन्य हो गईं। करिअर पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर उन्होंने विशुद्ध पेशेवराना अंदाज में फिल्मों को लेना शुरू कर दिया। वे जिस दोराहे पर खड़ी थी उसमें पुराने रास्ते पर चलना उन्हें उन अभिनेत्रियों की कतार में खड़ा कर सकता था जो पहली फिल्म की सफलता का बोझ नहीं उठा सकी।

इस बिरादरी में शामिल अभिनेत्रियों की संख्या अच्छी खासी है। दूसरा रास्ता दीपिका को उन अभिनेत्रियों के समूह से जोड़ देता जो पहली फिल्म की सफलता से बौखलाई नहीं और धीरे धीरे संघर्ष कर उन्होंने अपनी जगह पक्की की। अमिता (तुमसा नहीं देखा), कल्पना (प्रोफेसर), विमी (हमराज), रंजीता (लैला मंजनू), काजल किरण (हम किसी से कम नहीं), शोभा आनंद (बारूद) जैसी दर्जनों अभिनेत्रियां पहली फिल्म की रिकार्ड तोड़ सफलता को हजम नहीं कर पाईं और छोटी पारी खेल कर सिमट गई। दीपिका उसी राह की राहगीर बनने जा रही थी कि उन्होंने सायरा बानो, शर्मिला टैगोर, आशा पारिख जैसी उन गिनी चुनी अभिनेत्रियों से सबक सीख लिया जिन्होंने पहली फिल्म की सफलता के बाद भी अपने कदम जमीन पर टिकाए रखे।

दीपिका के कायाकल्प की झलक मिली इम्तियाज अली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘कॉकटेल’ से। फिल्म में दीपिका ने ऐसी युवती की भूमिका की थी जो प्रेम और रिश्तों को समझ नहीं पाती और जब समझ पाती है तो खुद को ऊहापोह की स्थिति में पाती है। दीपिका ने इस फिल्म में गजब का अभिनय दिखाया। बेहद आधुनिक और जटिल विषय पर बनी ‘कॉकटेल’ की सफलता ने दीपिका के लिए नए रास्ते खोल दिए। ‘रेस-2’ पूरी तरह व्यावसायिक फिल्म थी। उसमें दीपिका के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। फिर भी फिल्म सफल हो गई तो दीपिका की गाड़ी को और रफ्तार मिल गई। प्रकाश झा की बेवजह विवादास्पद हो गई ‘आरक्षण’ हालांकि ज्यादा सफल नहीं हो पाई लेकिन अमिताभ बच्चन के सामने वाले तनावपूर्ण दृश्यों में दीपिका ने जिस तरह का अभिनय किया उसने उनकी प्रगति का संकेत दे दिया।

करन जौहर की फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ रणबीर कपूर के साथ स्वीकार कर दीपिका ने सबको चौंका दिया। ‘बचना ए हसीनों’ के वक्त हुए कांड ने उनके रिश्तों में खासी बदमजगी पैदा कर दी थी लेकिन उस खटास को भुला कर दीपिका ने फिल्म की। परदे के पीछे रणबीर कपूर व दीपिका के बीच कैसे भी रिश्ते रहे हों, परदे पर उनकी कैमिस्ट्री ने गजब ढा दिया। सिलसिला यहीं नहीं थमा। आठ-नौ फिल्में अजय देवगन के साथ करने के बाद रोहित शेट्टी ने शाहरुख खान को लेकर ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ बनाई। रोहित ने पहली बार अपनी फिल्म में दीपिका को लिया। शाहरुख और दीपिका के इस मेल ने ‘ओम शांति ओम’ की सफलता को लांघते हुए ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ को सुपरहिट करा दिया। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ का बुखार थमा तो संजय लीला भंसाली की विवादास्पद फिल्म ‘गोलियों की रास लीला, राम-लीला’ ने दीपिका की उपलब्धियों में एक और तमगा जोड़ दिया। फिल्म को कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ा। इस तरह दीपिका ने लगातार पांच हिट फिल्में देकर ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो उनकी समकालीन अभिनेत्रियों तो कभी दिखा ही नहीं पाईं। यह सिलसिला पद्मावत तक टूटा नहीं है। 

शिखर पर अकेली

यह दीपिका के बदले हुए रूप का ही असर है कि वे आज हर तरह के फिल्मकारों की पसंद बन गई हैं। व्यावसायिक फिल्मों में दीपिका की स्टार वैल्यू अतिरिक्त आकर्षण जोड़ने की गारंटी बन गई है। साथ ही अभिनय प्रधान फिल्मों के लिए उन्हें उपयुक्त मान लिया गया है। यह दोहरी स्वीकार्यता समकालीन अभिनेत्रियों के हिस्से में कम ही आ पाई है। अकेले अपने दम पर फिल्म सफल कराने वाली विद्या बालन ‘बॉबी जासूस’ व ‘घन चक्कर’ में फीकी पड़ गई। करीना कपूर ने लीक से हट कर ‘हीरोइन’ की तो नाकाम साबित हो गई। ‘गोरी तेरे गांव में’ और ‘सिंघम-2’ में भी उनका रंग नहीं जमा।

‘एक था टाइगर’, ‘टाइगर जिंदा है’ ‘धूम-3’ व ‘बैंग बैंग’ की सफलता से कैटरीना कैफ भले ही उत्साहित हों, अभिनय के मामले में उनकी सीमा सभी जानते हैं। प्रियंका चोपड़ा के पीछे ‘कृश-3’ की रिकार्ड तोड़ सफलता है और ‘सात खून माफ’ व ‘बर्फी’ के बाद ‘मैरी कॉम’ का सशक्त अभिनय भी। गायन और फिल्म निर्माण में प्रियंका ज्यादा नहीं उलझी तो दीपिका से मुकाबले में फिलहाल वे ही ज्यादा सक्षम दिखती हैं। लेकिन अपने से बारह साल छोटे निक से शादी और हॉलीवुड में चमकने की महत्वाकांक्षा के चलते भारतीय चुनौती को वे कितनी गंभीरता से ले पाती हैं, यह देखना है।

अभी की स्थिति में तो दीपिका नंबर एक के सिंहासन पर जमी हैं। यह ऐसी पदवी है जिसकी उम्मीद दूसरों को क्या, खुद दीपिका को भी कुछ समय पहले तक नहीं थी। कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि दीपिका की फिल्में हर तीसरे महीने रिलीज हुई और संयोग से सभी हिट हो गईं, इसलिए उनकी वाहवाही हो गई। और अभिनेत्रियां इतनी मजबूती से दस्तक नहीं दे पाईं इसलिए पिछड़ गईं। साल दो साल में स्थिति बदल भी सकती है। यह हर दौर में होता भी रहा है। हर दशक में एक दूसरे से आगे निकलने की अभिनेत्रियों में होड़ मचती है लेकिन सफलता व लोकप्रियता की कसौटी पर चार पांच या ज्यादा से ज्यादा छह अभिनेत्रियों का जलवा ही साबित हो पाता है और श्रेष्ठता का मुकाबला उन्हीं के बीच सिमट कर रह जाता है। एक जमाना नरगिस, मधुबाला, सुरैया व मीना कुमारी की होड़ का था। फिर सामने आईं वैजयंतीमाला, साधना, वहीदा रहमान व नूतन।

फिल्मों पर रंगों और ग्लैमर का बुखार चढ़ा तो सायरा बानो, शर्मिला टैगोर, आशा पारिख आदि की बारी आई। फिर हेमा मालिनी, रेखा, परवीन बाबी, जीनत अमान ने कमान संभाल ली। हिंसा-प्रतिहिंसा से भरी फिल्मों के दौर ने अभिनेत्रियों की उपयोगिता कम कर दी। फिर भी माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी, डिंपल कपाड़िया आदि की दस्तक महसूस होती रही। करिश्मा कपूर, मीनाक्षी शेषाद्रि, अमृता सिंह आदि पूरक के तौर पर ही सीमित रह पाईं। अकेली काजोल व जूही चावला ने ही जम कर प्रतिरोध दिखाया। पिछले पांच सात साल में इसमें बदलाव आया जिसका श्रेय प्रियंका चोपड़ा, करीना कपूर, कैटरीना कैफ, विद्या बालन, ऐश्वर्य राय, रानी मुखर्जी और अब दीपिका को दिया जा सकता है। इन अभिनेत्रियों ने कई धारणाओं और मान्यताओं को तोड़ा।

पिछले एक दशक में अपनी अलग व्यक्तिगत पहचान बनाए रखने में सफल होने वाली इन अभिनेत्रियों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ तो खूब मची लेकिन उनकी स्थिति तत्कालीन परिस्थितियों में अदलती-बदलती रही। नंबर एक की स्थिति में कोई ज्यादा समय तक नहीं रह पाईं। दो साल तक नंबर एक साबित होने का मुकाबला विद्या बालन, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा व कैटरीना कैफ के बीच सिमट कर रह गया था।  उनकी स्थिति में हाल फिलहाल कोई सुधार नहीं हुआ है जबकि नए अंदाज में दीपिका लगातार ताजगी का अहसास करा रही हैं। अपनी समकालीन अभिनेत्रियों से तो वे काफी आगे निकल गई हैं। कान फिल्म समारोह में अपनी पोशाक की वजह से चर्चित हुई सोनम कपूर लगातार कहती रही हैं कि उनमें वह अभिनय प्रतिभा है और गजब की ड्रेसिंग सेंस है जो माधुरी दीक्षित तक में नहीं है।

अपनी ताई श्रीदेवी को संपूर्ण अभिनेत्री मानने वाली अनिल कपूर की यह बेटी पिछले बारह साल में एक दर्जन फिल्में करने के बाद अपनी चटपटी बयानबाजी से सुर्खियां जरूर बटोरती रही हैं लेकिन अभिनय की दुनिया में कोई खास तीर नहीं चला पाई हैं। अपनी बनाई फिल्मों ‘आयशा’ व ‘खूबसूरत’ के अलावा ‘मौसम’ जैसी फिल्मों की नाकामी ने साबित कर दिया कि सोनम अपने बल पर फिल्म नहीं खींच सकती। ‘प्लेयर’ में उनका उत्तेजक रूप भी लोगों को नहीं लुभा सका। ‘भाग मिल्खा भाग’ व ‘रांझना’ से उन्हें आस थी। ‘भाग मिल्खा भाग’ में तो सोनम की सीमित भूमिका थी और उनका कहना है कि उसके लिए उन्होंने सिर्फ ग्यारह रुपए लिए। ‘रांझना’ निर्देशक प्रभु देवा की पहली तमिल फिल्म का रीमेक थी और इसमें सोनम को अपना दम दिखाने का पूरा मौका भी मिला। लेकिन बाक्स आफिस की महारानी कहलाने लायक सफलता वे फिल्म को नहीं दिला पाईं।

मॉडल रहीं अनुष्का शर्मा का करिअर यशराज फिल्म्स से तीन फिल्मों का ठेका मिलने के बाद ऐसा दौड़ा कि काफी समय तक उसकी रफ्तार धीमी नहीं पड़ी। यह जरूर है कि ‘रब ने बना दी जोड़ी’, ‘बैंड बाजा बारात’, ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’, ‘बदमाश कंपनी’ व ‘जब तक है जान’ जैसी उनकी सभी फिल्में एक ही प्रोडक्शन हाउस की थीं। लेकिन बाहर की फिल्मों ‘पटियाला हाउस’, ‘मटरू की बिजली की मंडोला’ में भी अनुष्का ने खासा असर छोड़ा। अपनी प्रोडक्शन कंपनी की फिल्मों ‘एनएच-10’, ‘फिल्लौरी’ व ‘परी’ से उन्होंने एक अलग राह पकड़ने की कोशिश की लेकिन बाक्स आफिसर से मजबूत सहारा नहीं मिला। हालिया फिल्म ‘सुई धागा’ ने उन्हें जरूर मजबूती दी है।

दीपिका के उत्थान के दौर में अनुष्का फिल्मों से ज्यादा क्रिकेटर विराट कोहली से रिश्ते की वजह से ज्यादा चर्चित रहीं। सफलता के लिहाज से देखा जाए तो सोनाक्षी सिन्हा का पांच साल से भी कम का सफर शुरुआत में चौंकाने वाला रहा। अभिनेता-सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी दोनों ‘दबंग’, ‘सन आफ सरदार’, ‘राउडी राठौड़’ हिट हो गई। यह अलग बात है कि इसमें सोनाक्षी का कोई खास योगदान नहीं रहा। सभी फिल्मों में वे शो पीस रहीं।

अभी उन्हें साबित करना है कि वे अभिनय भी कर सकती हैं। ‘बुलेट राजा’ व ‘आर राजकुमार’ में उन्हें अभिनय का मौका मिला भी लेकिन उसका वे फायदा नहीं उठा सकीं। सिर्फ ‘लुटेरा’ में कुछ वे ठोस करती दिखीं। दीपिका की आज फिल्म नगरी में क्या हैसियत है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस ‘हैप्पी न्यू इयर’ को लिखने में फरहा खान को दस साल लग गए, उसे बनाने में उन्हें उतना समय नहीं लगा जितना हीरोइन की तलाश मे लगा। घूम फिर कर उन्हें दीपिका पर ही भरोसा करना पड़ा।

बहरहाल, अब एक शिखर पा चुकी दीपिका पादुकोण के लिए आगे का रास्ता ज्यादा सहज रहने वाला नहीं है। उनसे अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। उन्होंने फिल्में चुनने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी है। उम्मीद है कि आने वाला साल दीपिका के अभिनेत्री रूप का नया विस्तार दिखाएगा।

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