• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 02 March, 2019 11:13 AM | Total Read Count 234
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हास्य कलाकारों की बनी अलग पहचान

हिंदी फिल्मों में हास्य की हालांकि पूरी तरह कभी उपेक्षा नहीं हुई। फिल्म चाहे किसी भी विषय या पृष्ठभूमि की क्यों न रही हो, हास्य प्रसंग उसमें रखने की परंपरा का आमतौर पर पालन किया गया। इसके लिए मूल कथा से दूर दूर तक कोई नाता नहीं रखने वाली उपकथा का समावेश किया गया। इस तरह नायक, नायिका, खलनायक व चरित्र कलाकारों से अलग हास्य कलाकारों की एक नई बिरादरी खड़ी हो गई। उन्हें मुख्यधारा के कलाकारों जितना महत्व काफी समय तक नहीं मिला। शुरुआती दौर में अपनी गोल मटोल काया और मासूम चेहरे के साथ हीरोइन से प्रणय निवेदन करने वाले गोप एक ही शैली को अपनाने के बावजूद सफल रहे।

‘मदर इंडिया’ में सुनील दत्त ने जो भूमिका की थी वही मूल फिल्म ‘औरत’ में याकूब ने निभाई थी। लेकिन याकूब को ज्यादा लोकप्रियता मिली ‘गृहस्थी’, ‘लाल हवेली’, ‘पतंगा’, ‘सगाई’ जैसी फिल्मों में उनकी हास्य भूमिकाओं से। पोपले मुंह वाले वीएच देसाई ने ‘भाभी’, ‘झूला’, ‘बंधन’, ‘कंगन’, ‘किस्मत’ में अपनी धाक जमाई। संवाद बोलने की अलग शैली की वजह से ओम प्रकाश और कन्हैया लाल ने एक अलग मुकाम पाया। आधी सदी का ओम प्रकाश का सफर सौ से ज्यादा फिल्मों में कई यादगार भूमिकाएं दे गया। कन्हैया लाल के हास्य में कुटिलता का समावेश था जो ‘मदर इंडिया’, ‘भरोसा’ से लेकर ‘हम पांच’ तक में उभरा।

आगा, भगवान, राधा कृष्ण, मुकरी, जगदीप मारुति, सुंदर जैसे हास्य कलाकार भी बीच-बीच में आते रहे। हास्य कलाकारों का स्वर्ण युग शुरू करने का श्रेय जॉनी वाकर को दिया जाता है। बस कंडक्टरी करने वाले बदरुद्दीन काजी 1952 में नवकेतन की फिल्म ‘बाजी’ की छोटी सी भूमिका में आए लेकिन बाद में हास्य कलाकार के रूप में स्थापित हो गए। जॉनी वाकर व महमूद अकेले हास्य  कलाकार थे जिन्हें उस समय के कुछ नायकों से ज्यादा मेहनताना मिलता था और हर फिल्म में एक या दो गीत उन पर फिल्माया जाना अनिवार्य था।

लेकिन इन दोनों की भी कुछ ही फिल्मों में मूल कथानक के साथ नातेदारी रही। नहीं तो फिल्म की कहानी अलग होती थी और उनकी कहानी अलग ट्रैक पर चलती थी। जॉनी वाकर को नायक बना कर ‘मिस्टर कार्टून एमए’ जैसी फिल्में बनाने की हिम्मत दिखाई गई। वे एकमात्र अभिनेता थे जिनके नाम पर फिल्म ‘जॉनी वाकर’ बनी। महमूद भी ‘शबनम’, ‘प्यासे पंछी’, ‘छोटे नवाब’ सरीखी कुछ फिल्मों में नायक की भूमिका की। लेकिन हास्य पर ही टिके नहीं रह पाए। नायक वाली हर तरह की धीर गंभीर हरकतें करने की उन्होंने कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। उनकी बनाई फिल्मों में भी सिर्फ ‘पड़ोसन’ ही सही मायनों में हास्य फिल्म रही।

सत्तर के दशक में श्रीधर ने ‘प्यार किए जा’, ऋषिकेश मुखर्जी ने ‘बीबी और मकान’ जैसी फिल्मों में उन्हें लेकर छिटपुट हास्य प्रयोग किए। पिछली सदी के आखिरी दो दशक पूरी तरह व्यावसायिकता को समर्पित रहे। कलात्मकता तो दूर की बात रही, सामान्य संवेदनशीलता भी फिल्मों में नहीं रह गई और पलायनवादी सस्ता मनोरंजन पेश करने की फिल्मों में होड़ मच गई। इस दौर में फिल्मों का हास्य भी दोहरे अर्थवाले संवादों और फूहड़ व अश्लील दृश्यों का मोहताज होकर रह गया।

ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गोलमाल’ व ‘चुपके चुपके’, सई परांजपे की ‘चश्मे बद्दूर’, बासु चटर्जी की ‘छोटी सी बात’ सरीखी फिल्मों ने कुछ हद तक हास्य को बदरंग होने से बचाए रखा। उस दौर में एक नई परंपरा की शुरुआत हुई। इसे एकदम से नया तो नहीं कहा जा सकता। पहले भी इस परंपरा को अपनाया गया लेकिन छिटपुट स्तर पर फर्क यह रहा कि सत्तर के दशक में इस परंपरा को ज्यादा व्यापकता मिली और इसे आज भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इस परंपरा के दो अंग हैं। एक चेहरे की भाव भंगिमाओं से कॉमेडी करना और दूसरा हास्य फिल्मों के लिए कॉमेडियनों पर आश्रित नहीं रहना।

गोप और देसाई की लीक को राजेंद्र नाथ ने ‘जब प्यार किसी से होता है’ से पकड़ा और सालों तक पोपट लाल मार्का अभिनय करते रहे। फिल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लेकर असरानी व पेंटल शुरू में राजेंद्र नाथ की राह पर चलते दिखे लेकिन जल्दी ही उन्होंने धीर गंभीर भूमिकाओं में अपनी क्षमता दिखानी शुरू कर दी। राकेश बेदी व सतीश शाह ने कॉमेडी के अलग-अलग अंदाज अपनाए। लेकिन एक ही शैली में बंधे जॉनी लीवर को ज्यादा सफलता मिली। वही रास्ता बाद में राजपाल यादव ने अपनाया। लेकिन उनका करिअर सीमित ही रहा।

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