• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 02 March, 2019 10:56 AM | Total Read Count 287
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फिल्मों में हंसी मजाक के बदले अंदाज

श्रीशचंद्र मिश्र फिल्मों का शुरू से ही खास फार्मूला हास्य रहा। यह पिछले कुछ सालों में दो तरह की धाराओं में बंट गया है। एक तरफ ‘ढिशुम’, ‘मस्ती’, ‘वेलकम’ ‘धमाल’, ‘गोलमाल’ (रोहित शेट्टी वाली) या ‘नो एंट्री’ जैसी उन तमाम फिल्मों को रखा जा सकता है जिन्होंने हास्य को विकृत किया। संयोग से इनमें से ज्यादातर फिल्में बड़े सितारों की रही है। इस कथित मनोरंजक धारा से उलट छोटे बजट की कुछ फिल्मों ने औसत समाज की उलझनों, सपनों और बिषमताओं को गुदगुदाने वाले अंदाज में परोस कर एक ऐसा हास्य रचा जो आमजन से ज्यादा करीब था।

यही वजह है कि बड़े बजट की फिल्मों का हास्य जहां बाक्स आफिस पर लगातार फीका होता गया वहीं सहज हास्य की धारा बहाने वाली फिल्मों ने खूब रंग जमा दिया। ‘हाउसफुल’, ‘मस्ती’, ‘क्या कूल है हम’ के तीसरे-चौथे सीक्वल की नाकामी और उसके मुकाबिल ‘बरेली की बर्फी’, ‘टॉयलेटः एक प्रेम कथा’, ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘शादी में जरूर आना’ आदि एक दर्जन से ज्यादा फिल्मों को मिली सराहना इसका प्रमाण है। हालिया बदलाव कोई नई बात नहीं है।

कॉमेडी यानी हास्य हिंदी फिल्मों का पारंपरिक तत्व रहा है। बदलते समय के साथ इसका रूप बदलता रहा है। शुरुआत से हिंदी फिल्मों की सफलता के दो ही मुख्य आधार रहे हैं। एक रोमांस और दूसरा कॉमेडी यानी हास्य। हास्य फिल्मों की बाक्स आफिस सफलता में खासा योगदान देता रहा है। मूक दौर में जब फिल्में बोलती नहीं थी, पौराणिक या ऐतिहासिक आख्यानों के अलावा जोकरनुमा हरकतें कर लोगों को हंसाने का काम किया जाता था।

फिल्मों का आवाज मिलने के बाद शुरू के दो तीन दशक में मूर्ख दिखने वाले नूर मोहम्मद चार्ली, मिर्जा मुशर्रफ, मंजनू आदि की ऊटपटांग हरकतें हास्य का आधार बनीं। आजादी के बाद फिल्मों का व्यवस्थित ढांचा विकसित होने के बाद हास्य को ज्यादा मान्यता मिली। परिस्थितिजन्य हास्य की शैली सामने आई। उसे गोप और याकूब जैसे कलाकारों ने विस्तार दिया। बाद में चुटीले संवादों और हाजिर जवाब के जरिए कॉमेडी का नया अंदाज आया।

फिल्मों में हास्य के इन अलग-अलग रूपों ने आज तक अपनी अहमियत कम नहीं होने दी है। स्थितियां जरूर बदलती रहीं। पहले भी कई बार फूहड़ता का सहारा लेकर हास्य रचा गया। हाल के सालों में यह प्रवृत्ति ज्यादा बढ़ी। इस क्रम को पिछले दो-तीन साल में बनी उद्देश्यपूर्ण हास्य फिल्मों ने तोड़ा है। हालांकि सुरूचिपूर्ण हास्य फिल्में पहले भी बनती थीं, आज भी बन रही हैं।

फर्क सिर्फ इतना आया है कि पिछले कई साल तक हास्य कलाकारों का जो एक विशिष्ट वर्ग हुआ करता था, वह थोड़ा संकुचित हो गया है। वजह यह है कि हीरो या हीरोइन ने कॉमेडी का जिम्मा भी संभाल लिया है। एक फर्क यह भी आया है अब हास्य को सामाजिक स्थितियों से जोड़ा जा रहा है। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित 2013 में रिलीज हुई फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ और उसके बाद 2016 में आए उसके सीक्वल वाली फिल्म वकीलों और अदालतों की कार्यवाही पर चुटीली टिप्पणियों के लिए विवादास्पद जरूर हुई। लेकिन जिन लोगों का अदालतों से वास्ता पड़ता रहा है उन्हें फिल्म में स्वाभाविकता दिखी।

आमतौर पर कटाक्ष करने वाली फिल्मों को कम सफलता मिलती है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि अक्सर फिल्मी कटाक्ष वैचारिक या सांकेतिक होने की वजह से आम दर्शकों के गले नहीं उतर पाते। ‘जॉली एलएलबी’ की टिप्पणियां आम जन जीवन से जुड़ी होने की वजह से पसंद की गईं। सेंसर की कैंची से बच गई। गाली-गलौच जरूर फिल्म का एक नकारात्मक पहलू रहा। हालांकि जिस क्षेत्र को फिल्म में कथानक का हिस्सा बनाया गया है वहां की बोल चाल गाली के बिना पूरी नहीं होती।

मामला सिर्फ कुछ फिल्मों तक सीमित नहीं है। सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों पर चुटकी लेने वाली फिल्में कम सही लेकिन समय समय पर बनती रही हैं। कटाक्ष या व्यंग्य को फिल्मों ने कभी गंभीरता से उठाया है तो कभी हास्य का सहारा लिया है। व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने वाली कुंदन शाह की फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ मील का पत्थर कही जा सकती है। 

भ्रष्ट स्थितियों से त्रस्त पात्रों की विवशता और बेचारगी को गुदगुदा देने वाले हास्य से ऐसा उभारा गया था कि उसे हास्य फिल्मों में आइकॉनिक (मील का पत्थर) फिल्म माना जाता है। भरत के नाट्यशास्त्र में जिन नौ रसों का वर्णन है उसमें हास्य भी है। फिल्मों ने शुरू से इस रस को भी अपनाया है। लेकिन आम तौर पर हास्य को फिल्म का मुख्य आधार बनाने से संकोच किया गया। दरअसल शुरू से ही फिल्मकारों की यह धारणा बनी रही कि भारतीय दर्शक खालिस हास्य नहीं पचा सकते।

उन्हें हर तरह के मनोरजंक तत्व चाहिए। इसीलिए फिल्मों में आम तौर पर हास्य को सजावट के रूप में इस्तेमाल किया गया। बीच बीच में कुछ फिल्मकारों ने साहस भी दिखाया। एसएस वासन की फिल्म ‘मिस्टर संपत’ पचास के दशक में आई थी। फिल्मों के पारंपरकि ढांचे को तोड़ कर फिल्म उस चालबाज नायक पर केंद्रित थी जो जेब में आठ आने लेकर एक शहर में पहुंचता है और लोगों को बेवकूफ बना कर मालामाल हो जाता है।

पोल खुल जाने के बाद जब वह लौटता है तो उसकी जेब में आठ आने ही होते हैं। फिल्म में नायक की भूमिका मोतीलाल ने की थी। उसी दौर में ‘जागृति’ व ‘दोस्ती’ जैसी संदेशपरक गंभीर फिल्में निर्देशित करने वाले सत्येन बोस ने ‘हाफ टिकट’ व ‘ चलती का नाम गाड़ी’ जैसी हास्य फिल्में बनाई। विलियम शेक्सपीयर के विख्यात नाटक पर विमल राय ने हास्य फिल्म ‘दो दूनी चार’ बना कर सभी को चौंकाया। दो दशक बाद इसी विषय पर गुलजार ने ‘अंगूर’ बनाई।

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