• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 01 June, 2019 12:40 PM | Total Read Count 116
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लिएंडर पेस का करिअर क्या खत्म?

श्रीशचंद्र मिश्रः एक समय अपनी बददिमागी के लिए मशहूर जर्मनी के विख्यात लॉन टेनिस खिलाड़ी बोरिस बेकर ने सलाह दी है कि लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा को मिल कर देश में लॉन टेनिस की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए। इशारा साफ है। इन तीन खिलाड़ियों के मनमुटाव की वजह से कई मौकों पर खेल को खासा नुकसान हुआ है। विश्व स्तर पर तो कोई चुनौती बची नहीं है। डेविस कप में एक समय अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाली टीम अब अपने ही क्षेत्र में उलझ कर रह गई है। सोलह टीमों के विश्व ग्रुप में पहुंचना तो खैर कब का असंभव साबित हो गया है। मौजूदा सीजन में भी उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही। यह सब हो रहा है बड़े खिलाड़ियों की गुटीय राजनीति की वजह से और इसका सबसे ज्यादा खमियाजा भुगतना पड़ा है लिएंडर पेस को।

कोच और सपोर्ट स्टाफ की आम सहमति से पिछले साल लिएंडर पेस का डेविस कप टीम से पत्ता कट गया। इसे 45 साल के पेस के करिअर पर अंतिम मुहर लगना भी माना जा सकता है। करीब 29 साल का सफर इस तरह खत्म होगा, किसी ने सोचा नहीं था। हालांकि पिछले कुछ सालों से जिस तरह उन्हें विवादों के केंद्र में खड़ा किया गया, उससे यह संकेत तो गया ही कि फेडरेशन और टीम में वे स्वीकार्य नहीं रह गए हैं। रही सही कसर खुद पेस ने आखिरी वक्त में जकार्ता के एशियाई खेलों से नाम वापस लेकर पूरी कर दी। हालांकि चीन के खिलाफ डेविस कप के डबल्स मुकाबले में जीत पाकर लिएंडर पेस ने दिखा दिया था कि 29 साल के सफर में भी उनकी ऊर्जा और जीतने की ललक खत्म नहीं हुई है।

तियानजिन में हुए एशिया-ओसियानिया ग्रुप एक के दूसरे राउंड के इस मुकाबले में पेस डबल्स में 43वीं जीत के साथ विश्व रिकार्ड बनाने में तो कामयाब हुए ही, टीम के साथियों राम कुमार रामनाथन और प्रजनेश में ऐसा आत्मविश्वास भर दिया कि दोनों रिवर्स सिंगल्स जीत कर उन्होंने भारत को विश्व ग्रुप के प्लेआफ में पहुंचा दिया। एक बार फिर लॉन टेनिस में भारतीय चुनौती का मुख्य आधार बने लिएंडर पेस। बिडंबना यह है कि इतने सफल और इतने अनुभवी खिलाड़ी को बाहर बैठा दिया। उसी का नतीजा था कि इटली से हार कर विश्व ग्रुप में खेलने का सपना टूट गया। हर खिलाड़ी के खेल जीवन पर कभी न कभी विराम लगता है। पर ऐसे तो नहीं?

लिएंडर पेस ने सोलह साल की उम्र में पहली बार मार्च-अप्रैल 1990 में जापान के खिलाफ डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लिया था। तब से वे भारतीय टीम का लगभग अनिवार्य हिस्सा रहे। इस दौरान उन्होंने कई उल्लेखनीय सफलता पाई। 29 साल में कई खिलाड़ी आए-गए। पेस लगातार डटे रहे। डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लेने को वे हमेशा तत्पर रहे। यह सिलसिला टूट गया है। आगे जुड़ पाएगा, इसकी उम्मीद नहीं है।पिछले कुछ सालों से पेस के कई बार अप्रिय स्थितियों का सामना कर रहे हैं। 2016 में रियो द जनेरियो (ब्राजील) में हुए ओलंपिक खेलों में लिएंडर पेस लान टेनिस के पुरुष डबल्स में या मिक्स्ड डबल्स में अथवा दोनों में हिस्सा ले पाएंगे या नहीं, यह तय नहीं हो पा रहा था।

इसका निर्धारण दो आधार पर होना था। एक, विश्व रैकिंग में तब की स्थिति पेस को किस स्पर्धा के लिए अर्हता दिलाती है? दूसरे, टेनिस संघ किस जोड़ी को चुनता है? हालांकि टेनिस संघ की ऐसे मामलों में ज्यादा चलती नहीं है, यह 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक खेलों के वक्त जगजाहिर हो गया था। तब महेश भूपति व सानिया मिर्जा जैसे स्टार खिलाड़ियों की जिद चली थी। नतीजा काफी निराशाजनक रहा था। पेस का रियो में सातवां ओलंपिक था। भारतीय संदर्भ में यह एक नया रिकार्ड था। पिछला रिकार्ड राजा रणधीर सिंह के नाम है जिन्होंने निशानेबाजी में लगातार छह ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। इस नए रिकार्ड से पहले एक और रिकार्ड पेस के नाम के साथ पहले से जुड़ा हुआ था। उनके पिता डॉक्टर वेस पेस उस हॉकी टीम के सदस्य थे जिसने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था।  24 साल बाद पेस ने 1996 में अटलांटा ओलंपिक में लॉन टेनिस में कांस्य पदक जीत कर उस सफलता को दोहरा दिया। भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली पिता-पुत्र की यही एकमात्र जोड़ी है। 

दिलचस्प संयोग यह है कि म्यूनिख ओलंपिक में पेस की मां जेनिफर ने भी हिस्सा लिया था। वे बास्केटबाल टीम की सदस्य थीं। अपने सातवें ओलंपिक में पेस का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना था। लेकिन टीम में चली उठापटक ने उन्हें अपना सपना पूरा नहीं करने दिया। डबल्स में सौ से ज्यादा जोड़ीदारों के साथ करीब साठ टूर्नामेंट जीत चुके पेस को मलाल रहेगा कि वे अभी तक ओलंपिक में डबल्स स्पर्धा का कोई पदक नहीं जीत पाए। बहरहाल लिएंडर पेस रियो ओलंपिक को अपने सफर का अंतिम पड़ाव मानने को तैयार नहीं है। रिटायर होने के लिए उन्होंने असल में कोई सीमा तय ही नहीं की है। उनका मानना है कि खेलते रहने की इच्छा हो और खिलाड़ी को अपनी मानसिक व शारीरिक क्षमता का पता हो तो उम्र उसके लिए बाधा नहीं बन सकती। 1998 में 25 साल की उम्र में पेस ने न्यूपोर्ट (अमेरिका) में सिंगल्स का अपना एकमात्र डबल्यूटीए टूर्नामेंट जीता था। 

लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि उनकी तकनीक सिंगल्स के लिए उपयुक्त नहीं है। लिहाजा उन्होंने डबल्स पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। बड़े लक्ष्य कभी सामने नहीं रखे। शुरू में पांच ग्रैंड स्लैम जीतने पर ध्यान लगाया। वह पड़ाव तय कर लिया तो दस खिताब को कसौटी बना लिया। बढ़ते-बढ़ते 1999 से 2016 तक ग्रैंड स्लैम खिताबों की संख्या 18 तक पहुंच गई। अब इसे बीस तक बढ़ाने का पेस का विचार है। उन्हें लगता है कि दो-तीन साल और खेल कर वे इस मंजिल को भी पार कर लेंगे। उसके बाद जो मन और शरीर कहेगा, पेस मानेंगे। 
पिता हॉकी खिलाड़ी, मां और एक बहन जैकलीन बास्केट बाल खिलाड़ी और दूसरी बहन मारिया सौ व दो सौ मीटर की धाविका।

ऐसे में लिएंडर पेस का लॉन टेनिस में नाम कमाना चौंकाता है। दरअसल, 17 जून 1973 को जन्मे पेस स्कूल में पढ़ते समय हर खेल में दिलचस्पी लेते थे। कोलकाता के ला मार्तिनिएरा स्कूल में हॉकी, फुटबाल, एथलेटिक्स आदि टीमों के कप्तान पेस ही हुआ करते थे। परिवार चेन्नई गया तो फुटबाल के लिए शौक जागा। सपना यही शुरू से पाल लिया था कि पिता की तरह ओलंपिक खेलों में पदक जीतना है। फुटबाल में इसकी कोई गुंजाइश नहीं दिखी। बारह साल की उम्र में पेस को ब्रिटानिया अमृतराज टेनिस का हिस्सा बनने का मौका मिला। यही से उनकी जिंदगी की दिशा बदल गई। शुरू में मन नहीं लगा लेकिन बाद में समझ आ गया कि लॉन टेनिस ही उनका जीवन है। 

छोटी उम्र में ही पेस ने फिटनेस का महत्व समझ लिया और उसे अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना लिया। यही वजह है कि ढाई दशक से ज्यादा समय तक खेलते रहने और सफलता पाते रहने के बाद भी पेस की ऊर्जा और उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। 17 साल की उम्र में कड़कड़ाती सर्दी के बीच वोल्फसबर्ग (जर्मनी) की चैलेंजर सीरिज में छह हफ्ते बिताने से पेस को मुश्किल परिस्थितियों में सामंजस्य बैठाने का जो अनुभव मिला वह उनकी लंबी पारी को संवारने का आधार बना। लिएंडर पेस दुनिया के ऐसे अकेले खिलाड़ी हैं जो 29 साल से ज्यादा समय से खेल रहे हैं और अभी भी उनके रुकने का कोई इरादा नहीं है। अक्सर यह सवाल उठता है कि एक देश से दूसरे देश की यात्रा, लगातार खेलने का दबाव और कांटे की प्रतिस्पर्धा के बीच पेस संतुलन कैसे बनाए रख पाए, और वह भी लगातार कई साल तक। यह हमेशा कौतुक का विषय रहा है। पेस इसका श्रेय अपने पिता की सीख को देते हैं। वोल्फसबर्ग में पेस ने कड़ी मेहनत करना सीख लिया था।

उसी का असर था कि उन्होंने 1990 में विंबलडन का और 1991 में अमेरिकी ओपन का जूनियर खिताब जीत लिया। पिता ने उन्हें जल्दी ही समझा दिया कि शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालने की कोई जरूरत नहीं है। और खिलाड़ियों की तरह वे जिम में ज्यादा समय नहीं बिताते। पारंपरिक ट्रेनिंग पर भी वे ज्यादा जोर नहीं देते। सिर्फ खुद को फिट रखने लायक व्यायाम ही करते हैं। व्यक्तिगत उपलब्धियों के अलावा देश के सम्मान के लिए खेलने को भी उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी। डेविस कप के लिए होने वाली टीम स्पर्धा में पेस कई ऐतिहासिक सफलताओं के नायक रहे। मुकाबले में कैसी भी टीम क्यों न हो, डबल्स में पेस के होते हुए भारत की जीत हमेशा निश्चित होती थी।

लेकिन डेविस कप में डबल्स के अलावा चार सिंगल्स मैच होते हैं और उसमें मजबूती न होने की वजह से तीन बार फाइनल में पहुंच चुकी भारतीय टीम अब सोलह सर्वश्रेष्ठ टीमों के वर्ल्ड ग्रुप में जगह बनाने के लिए लगातार जूझ रही है। पेस इससे चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने के लिए ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे वे विश्व स्तर पर खेलने लायक नहीं बल्कि जीतने लायक बन सकें। अपनी तरफ से वे अगले पांच साल तक डेविस कप में अपना सौ फीसद योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन क्या उन्हें इसका मौका मिलेगा?

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