• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 04 July, 2019 06:54 PM | Total Read Count 25
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कृषि क्षेत्र में पानी के लिए नई नीति बनाने की जरूरत

नई दिल्ली। देश में कुछ क्षेत्रों में कम बारिश के अनुमान तथा इससे फसल उत्पादन प्रभावित होने की आशंका के बीच आर्थिक समीक्षा में कृषि क्षेत्र में जल उपयोग दक्षता में सुधार के लिए नई नीति तैयार करने पर जोर दिया गया है। समीक्षा में इस बात पर चिंता जतायी गयी है कि भारत 2050 तक जल संकट के मामले में विश्व के प्रमुख देशों में शामिल होगा। इसको देखते हुए इसमें भूमि की उत्पादकता से सिंचाई जल उत्पादकता की तरफ जाने की राष्ट्रीय प्राथमिकता पर जोर दिया गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है, ‘इसीलिए नीतियों में सुधार करते हुए किसानों को पानी के कुशल उपयोग को लेकर संवेदनशील बनाना होगा। जल संकट से पार पाने के लिए पानी के उपयोग में सुधार राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। मौसम विभाग ने इस साल दक्षिण पश्चिम मानसून लगभग सामान्य रहने का अनुमान जताया है। हालांकि जून महीने में बारिश 33 फीसद कम रही। इससे खरीफ फसलों का रकबा कम हुआ है। मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि जुलाई और अगस्त महीने में बारिश बेहतर होगी।
समीक्षा में कहा गया है मौसम विभाग ने इस साल बारिश सामान्य के आसपास रहने की संभावना जताई है। इससे कृषि क्षेत्र की वृद्धि में सुधार होनी चाहिए। हालांकि कुछ क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है, इससे प्रभावित क्षेत्रों में फसल उत्पादन पर असर पड़ सकता है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार सिंचाई के मौजूदा चलन की वजह से भूजल निरंतर नीचे की तरफ खिसकता जा रहा है, जो कि चिंता का विषय है। करीब 89 फीसदी भूजल का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है। देश में धान और गन्ना उपलब्ध जल का 60 फीसद से अधिक जल ले लेते हैं जिससे अन्य फसलों के लिए कम पानी उपलब्ध रहता है। इसमें सुझाव दिया गया है, भूमि की उत्पादकता से सिंचाई जल उत्पादकता की तरफ जाने की राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। समीक्षा में सूक्ष्म सिंचाई पर जोर दिया गया है जो पानी के कुशल उपयोग में सुधार ला सकता है। इसमें सूक्ष्म सिंचाई के उपयोग वाले फसल प्रतिरूप को सब्सिडी देने का सुझाव दिया गया है। कृषि क्षेत्र में सिंचाई उत्पादकता बढ़ाने के लिये स्थानीय कृषि-आर्थिक नजरिये से उपयुक्त विभिन्न उपायों को अपनाने की जरूरत है।
समीक्षा में उर्वरक प्रतिक्रिया अनुपात में गिरावट के साथ जैविक और प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर दिया गया है। इससे जल का बेहतर उपयोग और मृदा उर्वरता में सुधार में मदद मिलेगी। इसके अलावा कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में समावेशी और सतत विकास के लिये विविधीकरण महत्वपूर्ण है। ऐसे में नीतियों के मामले में पशुपालन, बागवानी, कटाई के बाद के कार्यकलाप कृषि/सामाजिक, वानिकी, मत्स्य पालन इत्यादि क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है।
समीक्षा के अनुसार कृषि क्षेत्र की वृद्धि 2018-19 में नरम रही और सकल मूल्य वर्द्धन में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी लगातार घट रही है और पिछले वित्त वर्ष में यह 16.1 प्रतिशत रही। इसमें यह भी कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में निवेश दर सेवाओं और उद्योग क्षेत्र के मुकाबले आधे से भी कम है। तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में खाद्यान्न उत्पादन 28.34 करोड़ टन रहने का अनुमान है जो इससे पूर्व वित्त वर्ष में 28.5 करोड़ टन था। कृषि, वानिकी और मत्स्यन की वृद्धि दर 2.9 प्रतिशत वृद्धि रहने का अनुमान है।

 

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