• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 02 August, 2019 05:57 AM | Total Read Count 80
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वास्तविक राजकोषीय घाटे को छिपाया जा रहा है?

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने कहा है कि सरकार का राजकोषीय घाटा केंद्रीय बजट में बताए गए आंकड़ों से ज्यादा हो सकता है। पांच जुलाई को पेश बजट के बाद आठ जुलाई को 15वें वित्त आयोग के साथ हुई बैठक में सीएजी से पूछा गया कि क्या बजट के इतर किए गए प्रावधान सही तस्वीर दिखा रहे हैं। इस पर सीएजी ने 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटे को लेकर दोबारा की गई अपनी गणना को दिखाया। इन आंकड़ों से पता चला कि असल में ये घाटा 5.85 फीसदी है, जबकि सरकार ने इसे 3.46 फीसदी ही दिखाया है।

भारत पूंजीगत खर्च के लिए बजट से बाहर की उधारी पर बहुत हद तक निर्भर करता है। यहां तक की खाद्य और ऊर्वरक सब्सिडी जैसे राजस्व खर्चों की पूर्ति के लिए भी बजट से बाहर के उपाय किए जाते हैं। इन सबके चलते घाटे के आंकड़ों पर और अधिक ध्यान देना पड़ रहा है। बीती चार जुलाई को आर्थिक सर्वे के बाद सरकार ने एक प्रेस रिलीज जारी की थी। इसमें कहा गया था कि सरकार राजस्व समेकन और राजकोषीय अनुशासन के रास्ते पर है। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि वित्त वर्ष 2018-19 के लिए केंद्र और राज्यों का एकमुश्त राजकोषीय घाटा 6.4 फीसदी से गिरकर 5.8 फीसदी पर पहुंच गया है।

इसके अलावा सरकार ने कहा था कि 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के तीन फीसदी पर लाने का लक्ष्य रखा गया है और सरकार इसे पाने के लिए सही रास्ते पर है। सिर्फ राजकोषीय घाटे की गणना में अंतर नहीं आया है बल्कि सीएजी ने अपनी गणना में राजस्व घाटे में भी अंतर पाया है। बजट आंकड़ों में इसे जीडीपी का 2.59 फीसदी दिखाया गया है, जबकि सीएजी की गणना में ये 3.48 फीसदी बताया गया है। सीएजी ने पाया है कि राजस्व खर्चों के लिए बजट से इतर उधारी जीडीपी की 0.96 फीसदी रही। इसी तरह पूंजीगत खर्चों के लिए ये जीडीपी की 1.43 फीसदी रही। सीएजी ने जब इन आंकड़ों को राजकोषीय घाटे के साथ जोड़ा तब ये घाटा तेजी से ऊपर गया।

सीएजी की गणना में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर पहले से बाकी देयताओं को भी जोड़ा गया है। इनमें खाद्य और उर्वरक सब्सिडी के लिए सार्वजनिक कंपनियों पर उधारी शामिल हैं। 

उदाहरण के लिए सरकारी कंपनी जैसे फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया का बकाया। इससे पहले प्रधानमंत्री को आर्थिक सलाह देने वाली परिषद के सदस्य रतिन रॉय ने कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था उस तरह के राजकोषीय घाटे से जूझ रही है, जो दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा था कि कर संग्रह में कमी को केंद्र में रखकर सरकार को अपनी योजनाओं पर एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।

इस दौरान रतिन रॉय ने सवाल खड़ा किया था कि जब टैक्स-जीडीपी अनुपात इतना गिर रहा है तो ऐसी स्थिति में सरकार ने 3.4 फीसदी का राजकोषीय घाटा कैसे हासिल कर लिया। जून के पहले हफ्ते में हुई आरबीआई की मौद्रिक समीक्षा कमेटी की बैठक में भी इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी।

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