• [EDITED BY : नया इंडिया राजनैतिक ब्यूरो] PUBLISH DATE: ; 12 April, 2019 10:02 AM | Total Read Count 225
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सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा, मीडिया आजादी सर्वोपरी

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की आजादी में 10 अप्रैल 2019 का दिन अविस्मरणीय रहेगा। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने रफाल मामले में जो फैसला दिया है वह आज की पत्रकारिता को न केवल नसीहत है बल्कि हमेशा के लिए यह फैसला है कि कोई सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता और गोपनीयता के नाम पर मीडिया में रिपोर्ट नहीं रूकवा सकती। उसे अधिकार नहीं कि ऐसी गोपनीय रिपोर्ट अखबार छापे तो देशद्रोह या गोपनीयता कानून की आड़ में सत्य को दबाया जाए।  

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी क़ानून मीडिया को गोपनीय काग़ज़ात प्रकाशित करने से नहीं रोक सकता है। प्रेस की आज़ादी की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा कि "न तो भारतीय संसद का बनाया कोई क़ानून और न अंग्रेज़ों का बनाया 'ऑफ़िशियल सीक्रेट ऐक्ट' मीडिया को कोई दस्तावेज़ या जानकारी प्रकाशित करने से रोक सकता है और न ही कोर्ट इन दस्तावेज़ों को 'गोपनीय' मान सकता है।"

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर आरटीआई या सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी देने से इनकार नहीं कर सकती है।हालांकि अदालत ने अपने फ़ैसले में ये भी कहा है कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ जानकारी मांगने भर से जानकारी मिल जाएगी। सूचना मांगने वाले को अपने तर्कों से ये साबित करना होगा कि ऐसी जानकारी छिपाना, जानकारी देने से ज़्यादा नुक़सानदेह हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 56 पेज के फैसले में केंद्र सरकार की उस दलील को नहीं माना जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता के पेश किए दस्तावेज विशेषाधिकार प्राप्त हैं, इन्हें सरकार के अतिरिक्त किसी और द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेषाधिकार उन दस्तावेजों पर होता है जो प्रकाशित नहीं हुए हों और पब्लिक डोमेन में न हो, मगर याचिकाकर्ता ने जो दस्तावेज लगाए हैं वो पब्लिक डोमेन में हैं और अखबार में प्रकाशित हो चुके हैं। 

रफाल मामले में सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार की तरफ से एडवोकेट-जनरल ने दलील दी थी कि याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका में तीन दस्तावेज ऐसे लगाए हैं, जो मंत्रालय से गैरकानूनी ढंग से चोरी कर फोटोकॉपी से बाहर निकाले गए हैं। इन्हें इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 123 के तहत सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। ये गोपनीयता की श्रेणी में संरक्षित हैं। इनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। 

इस पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई व जस्टिस संजय किशन कौल ने संयुक्त रूप से लिखे 18 पेज के फैसले में लिखा है कि अखबार ने दस्तावेजों को प्रकाशित करके उन्हें रोमेश थापर बनाम मद्रास और ब्रजभूषण बनाम दिल्ली सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रखने संबंधी निर्णय की याद दिलाई है। कोर्ट जनहित में ऐसे दस्तावेजों को देख सकती है। इससे जनहित खतरे में नहीं पड़ता। जस्टिस केएम जोसेफ ने 38 पेज के अपने अलग से लिखे फैसले में कहा कि यह सही है कि उक्त दस्तावेजों को याचिकाकर्ता ने उचित तरीके से हासिल नहीं किया। मगर ऐसे सबूतों को बंद या अनदेखा नहीं करना चाहिए।

प्रशांत भूषण ने दलील दी थी कि इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 123 सिर्फ अप्रकाशित दस्तावेजों को ही संरक्षण प्रदान करती है। उन्होंने कहा था कि हमने जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं उन्हें अखबार में छापा गया है। ये दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हैं। केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता नहीं है, बल्कि रफाल सौदे में शामिल अधिकारियों की चिंता है।

रफाल मामले में ही अलग से लिखे 38 पेज के फैसले में जस्टिस केएम जोसेफ ने मौजूदा समय में पत्रकारिता के बदल रहे ट्रेंड पर चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा है कि मीडिया के एक वर्ग में पक्षपात का गलत ट्रेंड दिख रहा है। इसके लिए उन्होंने अपने फैसले में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर की आत्मकथा वाली किताब का भी उदाहरण दिया है। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि मेरा मानना है कि स्वतंत्रता के कई पहलू हैं। एक आजाद व्यक्ति को बेखौफ होना चाहिए। वह कभी पक्षपात नहीं करता। उन्होंने कहा कि वास्तव में आर्टिकल 19 (1ए) के तहत जो अधिकार किसी नागरिक के पास हैं, वही अधिकार भारत में प्रेस के लिए भी हैं। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘बियोंड द लाइन’ के एक लेख ‘द इंडियन मीडिया’ में कहा है कि पत्रकारिता का व्यवसाय बदल गया है। मैं इससे भारी निराश हूं कि पत्रकारिता की दिशा ही नहीं बिगड़ी है बल्कि पत्रकार अपने मूल्यों को पुनर्जीवित करने की दिशा में कोई प्रयास ही नहीं कर रहे हैं।

जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि यदि ज़िम्मेदारी की गहरी समझ के बिना प्रेस द्वारा स्वतंत्रता का फायदा उठाया जाता है, तो यह लोकतंत्र को कमज़ोर कर सकता है। एक स्वतंत्र व्यक्ति को निडर होना ज़रूरी है। भारत में मीडिया ने लोकतंत्र की मजबूती में बहुत योगदान दिया है और देश में एक जीवंत लोकतंत्र के लिए प्रेस की हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी।’ उन्होंने कहा कि विजुअल मीडिया काफी ताकतवर है और इसकी पहुंच काफी दूर तक है। जनसंख्या का कोई भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है।

जस्टिस जोसेफ ने इस बात पर चिंता जताई कि आज मीडिया के कुछ वर्ग पक्षपात कर रहे हैं। उन्होने प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा, ‘यदि जिम्मेदारी की गहरी समझ के बिना प्रेस द्वारा स्वतंत्रता का फायदा उठाया जाता है, तो यह लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है। कुछ वर्गों में, पक्षपात करने की एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई देती है। व्यावसायिक हितों और राजनीतिक निष्ठाओं की वजह से निष्पक्ष तरीके से सूचनाएं प्रसारित करने में समस्या होती है।’ एक स्वतंत्र व्यक्ति को निडर होना ज़रूरी है।

जस्टिस जोसेफ ने अपने फैसले में आगे लिखा, ‘भारत में मीडिया ने लोकतंत्र की मजबूती में बहुत योगदान दिया है और देश में एक जीवंत लोकतंत्र के लिए प्रेस की हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी।’ उन्होंने कहा कि विजुअल मीडिया काफी ताकतवर है और इसकी पहुंच काफी दूर तक है। जनसंख्या का कोई भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। ‘मीडिया को यह अहसास होना चाहिए कि दर्शकों/पाठकों को अधिकार है कि उन्हें बिना किसी मिलावट के सच उन तक पहुंचाया जाए। मैं समझता हूं कि आजादी में कई सारी चीजें शामिल होती हैं। एक स्वतंत्र व्यक्ति को निडर होना जरूरी है।’

उन्होंने आगे लिखा, ‘डर, एक पत्रकार को प्रिय लगने वाली सभी चीजों या किसी भी चीज को खोने का हो सकता है। एक आजाद व्यक्ति पक्षपात नहीं कर सकता है। पक्षपात कई तरीकों का होता है। पक्षपात के खिलाफ नियम जजों द्वारा देखा गया एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।’

फैसले में कहा गया कि विजुअल मीडिया समेत हर तरीके का प्रेस पक्षपात नहीं कर सकता। बल्कि उसे स्वतंत्र रहना चाहिए। जज ने लिखा, ‘पक्षपातपूर्ण जानकारी प्रसारित करना, वास्तविक स्वतंत्रता को धोखा देना है। यह अनुच्छेद 19(1) (ए) के तहत लोगों को सही जानकारी देने के महत्वपूर्ण अधिकार का उल्लंघन है। ये अधिकार नागरिकों को दिए गए कई अन्य अधिकारों का आधार भी है। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि महत्वपूर्व बात ये है कि भारत में प्रेस का अधिकार, अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत जनता के अधिकार से बड़ा नहीं है।

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