• [WRITTEN BY : News Desk] PUBLISH DATE: ; 12 September, 2019 08:24 AM | Total Read Count 284
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कांग्रेस में बना रहा भानुमति का कुनबा

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी के दूसरे कार्यकाल का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी। आखिर पहले कार्यकाल में वे करीब 20 साल अध्यक्ष रहीं और अभी उनको अध्यक्ष बने मुश्किल से एक महीना हुआ है। इस लिहाज से अभी दोनों की तुलना नहीं होनी चाहिए। पर पहले महीने में उन्होंने जैसे और जिस अंदाज में फैसले किए हैं उससे यह तो जाहिर हुआ है कि पार्टी को एकजुट रखने की चिंता दिख रही है और वे भानुमति के कुनबे के अंदाज में पार्टी संगठन को बना रही हैं। 

मिसाल के तौर पर उन्होंने हरियाणा में भानुमति का कुनबा जोड़ा है। पहले अशोक तंवर की जगह कुमारी शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया और किरण चौधरी की जगह भूपेंदर सिंह हुड्डा को कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया। उसके बाद उन्होंने चुनाव की तीन समितियां बनाईं। चुनाव प्रबंधन समिति की कमान हुड्डा को, चुनाव समिति की कमान शैलजा को और इसके ऊपर एक चुनाव अभियान समिति, जिसकी कमान कैप्टेन अजय सिंह यादव को। इसके अलावा अभी लगता है कि समन्वय समिति, घोषणापत्र समिति आदि का गठन होना है। इन सारी समितियों में सैकड़ों की संख्या में नेताओं को भरती किया गया है। 

पार्टी को एकजुट रखने का कमजोर नेतृत्व के पास हमेशा यहीं एक फार्मूला होता है कि हर नेता को कोई न कोई पद दे दो। सो, जाहिर है कि सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस में जिस मजबूती की उम्मीद की जा रही थी वह नहीं दिख रही है। तभी झारखंड में कामचलाऊ प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर 72 साल के रामेश्वर उरांव को कमान दी गई और उनके साथ पांच कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिए गए। जितने लोग अध्यक्ष पद के दावेदार थे उनको या उनके खेमे से किसी न किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया।

यहीं फार्मूला सोनिया गांधी दूसरे राज्यों में भी लागू करने वाली हैं। इसलिए मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के बीच संतुलन बनाने का रास्ता खोजा जा रहा है। कैसे एक अध्यक्ष और आधा दर्जन कार्यकारी अध्यक्ष बना कर काम चलाया जाए, इसका रास्ता निकालने की जद्दोजहद में कांग्रेस अध्यक्ष को फैसला करने में इतना समय लग रहा है। राजस्थान और दिल्ली में भी इसी वजह से प्रदेश अध्यक्ष का फैसला अटका है। सोनिया गांधी और राज्यों के प्रभारी महासचिव संतुलन बनाने का रास्ता खोज रहे हैं। इसका रास्ता यहीं है कि हर खेमे के नेता को कोई न कोई पद दिया जाए। तय मानें कि हर राज्य में इसी तरह नियुक्तियां होंगी और ज्यादा से ज्यादा लोगों को संगठन में रखा जाएगा। जो बच जाएंगे, उनको राष्ट्रीय संगठन में जगह दी जाएगी। 

 

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