• [WRITTEN BY : News Desk] PUBLISH DATE: ; 12 August, 2019 06:47 AM | Total Read Count 205
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कांग्रेस में मची भगदड़ अब रूकेगी!

जिस समय कांग्रेस पार्टी अपना नया अध्यक्ष चुनने के लिए कार्य समिति की अहम बैठक कर रही थी उस समय भाजपा ने कांग्रेस के दो बड़े नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराया। राज्यसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक रहे भुवनेश्वर कलिता और असम की बराक घाटी में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता गौतम रॉय ने भाजपा का दामन थाम लिया। जाहिर है यह घटनाक्रम अनायास नहीं था। इसे कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के साथ इसलिए जोडा गया होगा ताकि कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाए। 

बहरहाल, इस भारी मनोवैज्ञानिक दबाव के बीच कांग्रेस ने एक बार फिर सोनिया गांधी को अध्यक्ष चुन लिया है। वैसे तो सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुना गया है और कहा गया है कि संगठन चुनाव होने तक वे अध्यक्ष रहेंगी पर बहुत सावधानी से पार्टी ने संगठन चुनावों और नए अध्यक्ष के चुनाव की कोई समय सीमा तय नहीं की है। इसका मतलब है कि हालात सामान्य होने और किसी नाम पर सहमति बनने तक वे अध्यक्ष रहेंगी। 

उनके अध्यक्ष बनने का सबसे बड़ा फायदा कांग्रेस नेता यह देख रहे हैं कि पार्टी में मची भगदड़ थम जाएगी। अभी भाजपा योजनाबद्ध तरीके से कांग्रेस तोड़ रही थी। हर राज्य से नेताओं का इस्तीफा करा कर उनको भाजपा में शामिल कराया जा रहा था। राज्यसभा सांसद संजय सिंह और भुवनेश्वर कलिता का इस्तीफा कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। कर्नाटक, तेलंगाना और गोवा में पार्टी विधायकों का इस्तीफा भी बड़ा झटका था। ऐसे झटके और न लगें इसके लिए जरूरी था कि सोनिया गांधी अध्यक्ष बनें। राहुल के इस्तीफा वापस ले लेने से भी यह भगदड़ नहीं रूकने वाली थी। यह भगदड़ तभी रूकती, जब सोनिया या प्रियंका में से कोई अध्यक्ष बनता। 

इसका कारण यह है कि पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेता राहुल के साथ सहयोग नहीं कर रहे थे। उलटे वे राहुल को फेल करने के लिए काम कर रहे थे। वे अपने अभियान में कामयाब रहे। पर ब उनके सामने चुनौती है कि वे इसे रोकें। अगर सोनिया के कमान संभालने के बाद भी नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी रहा तो इससे पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं की क्षमता पर सवाल उठेगा। तभी वे जी जान से इसे रोकने में लगेंगे। अब कांग्रेस पार्टी की राज्य सरकारें भी स्थिर होंगी और आलाकमान के साथ उनके संबंध में सुधरेंगे। ध्यान रहे पार्टी के पांचों मुख्यमंत्री राहुल के साथ बहुत सहज नहीं थे, जबकि सोनिया गांधी और उनकी टीम के साथ वे ज्यादा गहराई से जुड़े थे। इसका भी फायदा संगठन को मिलेगा। 

 

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