• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 20 June, 2019 06:34 AM | Total Read Count 260
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लक्ष्मी वाहन उल्लू और दो आंसू नहीं!

बचपन में जब पढ़ते थे तो हमारे शिक्षक हमें मुहावरो, लोकोक्तियो का अर्थ समझाने के लिए उदाहरण दिया करते थे। जब पत्रकारिता को व्यवसाय बनाया तो सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अपनी जिंदगी में इन्हें चरितार्थ होते हुए देखा। जब पिछले दिनों पूर्व सांसद व कांग्रेसी नेता मणी कुमार सुब्बा के निधन का अखबार में विज्ञापन पढ़ा तो कई बाते याद हो आई। वे कुछ कहावतों व मुहावरो के जीते-जागते उदाहरण थे। जैसे कि लक्ष्मी का वाहन उल्लू होता है व लक्ष्मी व सरस्वती में हमेशा बैर रहा है। 

उन्होंने अपने कर्मों से साबित किया कि इस दुनिया में तकदीर का कितना महत्व रहता है। इस 61 वर्षीय नेता का जीवन हमेशा विवादों में रहा। मेरी उनसे तब जान-पहचान हुई जबकि पीवी नरसिंहराव के मंत्रिमंडल के एक मजबूत मंत्री ने एक बार चाय पर बुलाकर मुझे एक फाइल दी जोकि उनके मुताबिक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे पवन चामलिंग ने उन्हें सीबीआई से जांच करवाने का अनुरोध करते हुए भेजी थी। 

फाइल मणी कुमार सुब्बा के बारे में थी जोकि तब कांग्रेस में हुआ करते थे। इस फाइल में उन्होंने सुब्बा के बारे में तमाम दस्तावेजों की फोटोकॉपी भेजते हुए लिखा था कि वह मूलतः नेपाल का निवासी है जोकि अपनी बहन की हत्या के सिलसिले में जेल में बंद रहने के बाद अपने देश से भाग आया था। उसका नाम मणी कुमार लिंबू था। पहले वह सिक्किम गया जोकि तब एक स्वतंत्र देश हुआ करता था व बाद में असम जाकर रहने लगा। 

मणी कुमार सुब्बा के खिलाफ एक व्यापारी ने बाद में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके अनुरोध किया कि उसे भारत का नागरिक न माना जाए। वह असम में रहते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया के संपर्क में आया और उन्होंने उसे वहां की रौकासिया विधानसभा से चुनाव लड़ने का टिकट दे दिया और वह जीत गया। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

उसने उत्तर पूर्वी राज्यों जैसे असम, मणीपुर, नगालैंड, अरूणाचल प्रदेश में सरकारी लाटरी पर कब्जा जमाया और वह उनके टिकट छापने व बेचने का काम संचालित करने के मामले में उनका एकमात्र विक्रेता बन गया। उसने इस धंधे में अथाह पैसा कमाया। नियंत्रण व महालेखाकार ने अपनी जांच में उसे इस मामले में बिक्री से लेकर ईनाम देने तक का घोटाला कर 500-600 करोड़ का राज्य सरकारो को चूना लगाने का आरोप लगाया। उसने अपनी चिटफंड कंपनी शुरू की। उसने जमकर पैसा कमाया और दिल्ली में छतरपुर इलाके में कई फार्म हाउस व संपत्ति खरीदी। 

कांग्रेस के संपर्क में आने के बाद वह काफी फलाफूला। उसने पैसा पानी की तरह बहाया। उसकी सफलता का अनुमान तो इस बात से लगाया जा सकता है कि वह 1998 से लेकर लगातार असम की तेजपुर लोकसभा सीट से सांसद रहा। वह उत्तर-पूर्व कांग्रेस समिति का कोषाध्यक्ष भी रहा। वह बेटले सरीखे कोट रखता था। जब मैंने उसके कारनामों का खुलासा किया तो उसने 1.5-2 करोड़ रुपए की मान-हानि का मुझे नोटिस भेज दिया। बाद में कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ नेता ने मुझसे कहा कि इस नोटिस का कोई मतलब नहीं है। पर मेरी सलाह है कि तुम्हें उससे एक बार जाकर मिल लेना चाहिए।

हमारी मुलाकात एक कांग्रेसी नेता के जरिए हुई। हम लोग ली मेरीडियन होटल के रेस्तरां में मिले। वहां एक वेटर हमारे पास आया और अंग्रेजी में पूछने लगा कि आपको क्या चाहिए। सुब्बा अंगूठा छाप था। उसने कुछ जवाब नहीं दिया तो वेटर मैनेजर के पास गया। मैनेजर ने इस बार उत्तर पूर्व का कोई वेटर उसके पास भेजा। जिसने अपनी स्थानीय भाषा में उससे बात की। जवाब में दोनों हाथो की अंगलियो व गले में जवहरात पहने हुए सुब्बा ने उससे कहा कि दो सूप तीन जगह लेकर आ जाओ। 

इसके बाद उसने मुझसे कहा कि आप मतंग सिंह के इशारे पर मेरे खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं। वे उस समय केंद्रीय मंत्री थे। मेरे इंकार करने पर वह बोला कि झूठ मत बोलिए। जब आप उससे मिलने जाते थे तो मैं ही तो आपके लिए समोसे लेकर आता था। तब याद आया कि जिस व्यक्ति को मैं घर का मुंडू समझता था वह वास्तव में अरबपति सुब्बा था जोकि असम के उद्योगपति व ऑल इंडिया मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के अध्यक्ष बदरूद्दीन अजमल जी से भी ज्यादा अमीर था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वह किसी मौजूदा जन प्रतिनिधि के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। हालांकि सीबीआई ने उसके खिलाफ लगभग ज्यादातर आरोपो को सही ठहराया था। जब मैंने सुब्बा से पूछा कि उसने मेरे खिलाफ मुकदमा क्यों किया तो वह कहने लगा कि जब कोई इस बारे में मुझसे कुछ पूछता है तो मैं कह देता हूं कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है। अंत मैं कुछ नहीं कह सकता हूं। 

वह हंसते हुए कहने लगा कि आपकी इस खबर से मुझे बहुत फायदा हुआ है। उत्तर-पूर्व में चर्चा होने लगी है कि सुब्बा तो बहुत बड़ा माफिया है। तमाम छोटे अधिकारी अब मेरे तमाम काम मुफ्त में ही कर देते हैं। लोग भी मुझसे डरने लगे हैं। वह बोला कि मैं गांधीजी का प्रशंसक हूं। आज तक इनकी वजह से ही अपना चुनाव जीतता आया हूं। यह कहते हुए उसने 500 के नोट पर रही गांधीजी की तस्वीर मुझे दिखलाई। अपनी खबर में मैंने दिवंगत जीतेंद्र प्रसाद का भी जिक्र किया था जोकि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के करीब थे व मैंने उनसे सुब्बा से पैसे लेने का आरोप लगाया था। जवाब में अपने घर पर चाय पर बुलाकर जीतेंद्र प्रसाद ने मुझसे कहा कि भाई तुमने बेकार में मुझे रगड़ दिया। सुब्बा तो धनपशु है व सब उसे दुहकर अपनी डेरिया चला रहे थे। अगर मैंने चाय के लिए 100-50 ग्राम दूध निकाल लिया तो क्या गलत किया। जिस धन पशु ने कांग्रेस को अपने दूध से सीचा, उसने उसके मरने के बाद उसकी मौत पर दो आंसू तक नहीं बहाए। नोट के जरिए वोट से लेकर नेता तक खरीदने वाला यह व्यक्ति सबकुछ यहां छोड़कर दुनिया से चला गया।

 

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