• [WRITTEN BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 21 August, 2019 06:27 AM | Total Read Count 274
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जगन्नाथ मिश्रः अपने वक्त के बड़े क्षत्रप

जब डा. जगन्नाथ मिश्रा के निधन की खबर सुनी तो अवाक रह गया। वे कोई साधारण आदमी या नेता नहीं थे। वे तो बिहार और सत्तातंत्र द्वारा मनमानी करने के पर्याय के प्रतीक नेता थे। उन्होंने उस समय कि सबसे बड़ी व ताकतवर नेता इंदिरा गांधी से मनचाहा करवाया। आज जिस चारा घोटाले में लालू यादव दोषी होकर जेल की सजा काट रहे हैं उसकी शुरुआत उनके मुख्यमंत्री रहते हुए हुई थी व उन्हें भी इस मामले में जेल की हवा खानी पड़ी थी। 

उन्होंने सत्ता का अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया और वे तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह कहा जाए कि वे तो एक वक्त बिहार के पर्याय बन गए थे तो कुछ गलत नहीं होगा। उनके कार्यकाल में ऐसे-ऐसे कांड हुए कि मुंह में ऊंगली दबा ले। उन्होंने अपनी मनमर्जी से शासन किया। मेरी उनसे काफी दोस्ती हो गई थी और वे मुझे कांग्रेस के बारे में काफी खबरें देते थे व खुलकर मन की बात किया करते थे। 

वे बिहार के जाने-माने नेता ललित नारायण मिश्रा के छोटे भाई थे। एक बम विस्फोट में उनकी मौत होने के बाद उन्हे बिहार के मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। यदि यह कहा जाए कि वे बिहार का पर्याय बन गए थे तो कुछ गलत नहीं होगा क्योंकि वे 1970-80 के दशक में बिहार व देश में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से हुआ करते थे। पर ज्योंहि लालू यादव की राजनीति उभरी तो उसके बाद उनका प्रभाव घटता गया। उनका आरोप था कि कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के कहने पर सीबीआई ने चारा कांड में उनका नाम शामिल करवाया था।

मुख्यमंत्री रहते हुए वे 31 जुलाई 1982 को बिहार प्रेस बिल लेकर आए ताकि प्रेस पर नियम कानूनों की आड़ में रोक लगाई जा सके। जब प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गांधी ने मान-हानि विधेयक लाकर प्रेस को नियंत्रित करने की कोशिश की तो उन्होंने जनसत्ता में मुझे दिए अपने इंटरव्यू में उनको ऐसा न करने की सलाह देते हुए कहा था कि यह कदम आत्मघाती साबित होगा। अतः इससे दूर ही रहे। 

तब उन्होंने मुझसे कहा था कि इंदिरा गांधी पूरे देश में प्रेस को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाना चाहती थी। अतः उन्होंने इसके परिणाम मांपने के लिए मुझसे बिहार में इसकी शुरुआत करने को कहा था और मैं यह विधेयक लेकर आया था। इसके विरोध में देश भर के हजारो अखबारो ने हड़ताल कर दी। यह बिल विधानसभा में पारित भी हो गया मगर डा. मिश्रा ने इसे वापस लेकर राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा। 

इसके अलावा वे अर्जुन सिंह से पहले कांग्रेस में मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी माने जाते थे। उन्होंने उर्दू को राज्य की दूसरी सरकारी भाषा बनाया और जम्मू-कश्मीर के बाद उसे देश में यह स्थान देने वाला दूसरा राज्य बिहार था। वे मैथिल ब्राह्मण थे और इस कारण मैथिल ब्राह्मणों ने मैथिल को राज्य भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग करते हुए उनका दरभंगा में जबरदस्त विरोध किया।

उनके बड़े भाई ललित नारायण मिश्रा बिहार के बड़े मैथिल नेता थे। जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तब वे उनके संसदीय सचिव बने और उन्होंने 1957 में बिहार के दरभंगा अंयारपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीता। वे इंदिरा गांधी की केबिनेट में पहले विदेश व्यापार मंत्री व फिर रेल मंत्री बने। बिहार के समस्तीपुर प्लेटफार्म पर एक बम कांड में उनकी मौत हो गई। वे भारत में बम विस्फोट में मारे जाने वाले पहले व एकमात्र केंद्रीय मंत्री थे। इस हत्याकांड को लेकर तरह-तरह की बातें कहीं जाने लगी व इसके लिए आनंद मार्गियो को जिम्मेदार ठहराया गया। 

ललित मिश्रा कांड के बाद उनके भाई जगन्नाथ मिश्र बिहार व देश की राजनीति में उभरे। मुसलमानों पर उनके प्रभाव के कारण उन्हें मौलाना कहा जाता था। राज्य सकरार ने तमाम मदरसो का सरकारीकरण करने उनके मौलवियो की वाहवाही जुटाने का काम उन्होने किया। वे नरसिंह राव सरकार में कृषि मंत्री रहे। बाद में वे कांग्रेस से अलग हो गए। 1996 में शरद पवार के साथ चले गए। जब देश में इक्का-दुक्का नेता ही भ्रष्टाचार के मामलो में फंसते थे तब उन पर पटना का गांधी मैदान व रेलवे स्टेशन गिरवी रखने व बेचने के आरोप लगाए गए। एक -दो मामलों में उनका दोषी होना तय नजर आ रहा था मगर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस बहरूल इस्लाम ने पटना अरबन काआपरेटिव बैंक कांड में उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया और कुछ समय बाद वे इस्तीफा देकर कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में असम से चुनाव लड़कर लोकसभा में पहुंच गए। 

कुल मिलाकर जगन्नाथ मिश्र का ताउम्र राजनीति करते रहे। राजनीति के कई मुकाम पाए लेकिन उन्हे बुढ़ापे में चारा कांड में जेल की सजा भी काटनी पड़ी। 82 साल की उम्र में वे जमानत पर बाहर आए और अस्वस्थता में अंतिम सांस ली।

 

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