• [WRITTEN BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 12 August, 2019 05:29 AM | Total Read Count 170
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दिवस व जुमले बनाए और व्यवहार...

आदतन सुबह उठते ही जैसे अपने सैलफोन का एसएमएस खोला तो तमाम लोगों ने मित्रता दिवस के संदेश भेजे थे। तब पता चला कि आज तो मित्रता दिवस है। कुछ देर बाद कॉलबैल बजी। दरवाजा खोला तो बाहर खड़े अपने नाती के स्कूल के व पड़ोसी दोस्त सिद्दू को खड़े पाया। वह उसके लिए ग्रीटिंग कार्ड लेकर आया था। नाती को पायलट बनने का शौक है। अतः उसने मित्रता दिवस पर संदेश लिखने के साथ ही कार्ड पर विमान बनाया था। 

फिर बेटी ने बताया कि आस-पड़ोस की उसकी सहेलियां वहां बच्चों के लिए फ्रेंडशिप-डे का आयोजन कर रही है जिसमें तमाम बच्चे जाकर एक दूसरे का अभिवादन करेंगे और खाएगें-पिएंगे। मित्रता व संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए यह एक अच्छा कदम है। मगर आज हम लोगों को विदेशी यह समझाएं कि मित्रता क्या होती है यह बात गले नहीं उतरती है। और अपने बचपन के दोस्तो को फोन किया और उनसे इस बारे में पूछा तो वे कहने लगे कि यह तमाम दिवस पश्चिम व बहुराष्ट्रवादी कंपनियों की देन है जोकि अपना उत्पाद जैसे फ्रेंडशिप बैंड, लंच आदि बेचने के लिए इस तरह के धंधे करते हैं। 

फिर याद आया कि जब हम बच्चे थे तो हमने कभी भी फादर्स-डे, मदर्स-डे, पिज्जा-डे, जलेबी-डे, समोसा-डे आदि नहीं मनाया था। अपने बुजुर्गो की हम बहुत इज्जत करते थे व अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर तमाम बुजुर्गो को चाचा, ताई से संबोधित करते थे। हमारे समय में ऐसी औपचारिकताएं नहीं थी। शायद इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि विदेशों में बच्चे अपने मां-बाप से बहुत जल्दी अलग हो जाते हैं व साल में एक बार उन्हें याद करने के लिए उन्हें फादर्स-डे या मदर्स-डे की याद आती है। 

जबकि हमारे देश में बच्चे ताउम्र मां-बाप के साथ रहते हैं। अतः कभी किसी ने उनको किसी एक दिन विशेष रूप से याद करने की जरूरत समझते हुए कोई दिवस नहीं बनाया। यह तो हमारे लिए रोटी दिवस, जलेबी दिवस, समोसा दिवस मनाए जाने जैसा है ताकि साल में एकाध बार उन्हें हम याद कर सकें। विदेशों में इस दिन बच्चे अपने मां-बाप से मिलने के लिए उपहार लेकर जाते हैं। हालांकि यह बात मेरे गले नहीं उतरती है। 

मुझे तो मदर्स व फडर्स-डे सरीखे दिवस श्राद्ध के दिनो पित्र पक्ष सरीखे लगते हैं। तब हम लोग जिस तरह से गाय, कुत्ते व कौव्वे को पूड़ी खीर खिलाकर उन्हें याद करते हैं। इन दिवसों पर उनकी इज्जत करते हैं। सरकारी कर्मचारियों को जैसे नगर निगम, बैंको आदि द्वारा शिष्टाचार या हिंदी दिवस मनाया जाना तो मेरी समझ में आता है क्योंकि साल भर वे हिंदी भाषा व आम नागरिक के साथ जमकर बदतमीजी करते हैं। अतः सरकार ने यादगार के कुछ दिनों के लिए उनकी इज्जत का आरक्षण कर दिया है। मगर जैसे-जैसे भूमंडलीकरण के साथ हमारे समाज में कमियां व बुराइयां आई हमने वहां के आयोजको व दिवसो को स्वीकार कर लिया।

जब हम बच्चे थे तब हमने दो ही दिवसो के बारे सुना था। 14 नवंबर को जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर बालदिवस मनाया जाता था व स्कूल में सांस्कृतिक समारोह होते थे। बाद में बच्चो के बूंदी के लड्डू दिए जाते थे। दूसरा अहम दिन 5 सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षण दिवस होता था।जो कि हमारे दूसरे राष्ट्रपति के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता था व उस दिन क्लास का एक छात्र टीचर बनता था व बच्चो को पढ़ाता था। उस दिन औपचारिक पढ़ाई-लिखाई की पूरी तरह से छुट्टी हो जाती थी।

मैंने कभी विदेशियों को शिक्षक दिवस मनाते नहीं देखा। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि ज्यादातर वहां शिक्षको का खास सम्मान नहीं किया जाता है। इसका उदाहरण अब हमारे यहां देखने को मिलने लगा है। दिल्ली में तो मां अपने बच्चो को ट्यूशन वाला शब्द का इस्तेमाल करती हे। उनके लिए दूध वाला, कामवाली, सफाईवाली व ट्यूशनवाला लगभग एक जैसे हैं। शायद इसकी एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि इन सभी को उनकी सेवाओं के बदले में पैसा देना पड़ता है व पैसा देने वाला खुद को उनका मालिक समझता है। आस-पास के माहौल के कारण हमारे मन में किसी और के प्रति भावनाएं पैदा होती है।

कुछ साल पहले पंजाब में टैक्सी वाहक ड्राइवर माई मोनी नामक एक रिकार्ड जमकर बजाते थे जो कि एक हास्य गीत था। इसमें एक व्यक्ति चुटुकूले सुनाते हुए कहता कि हिंदी की कक्षा में पढ़ाई चल रही थी। मास्टर साहब पुलिंग व स्त्रीलिंग के बारे में बता रहे थे। जैसे कुत्ते का कुत्तिया, धोड़े का धोड़ी, शेर की शेरनी। उन्होंने पूछा कि ज्ञानी का क्या होगा एक छात्र खड़ा होकर कहने लगा संगीत वाली मास्टरनी। हमने भी बचपन में पांडे की पडाइन, शुक्ला की शुक्लाइन, तिवारी की तिवारिन, त्रिपाठी की त्रिपाठिन सरीखे शब्दों को सुना था पर गुरू की गुरूआइन नहीं सुनी थी। दरअसल हमने तमाम शब्दो को आत्मसात तो कर लिया है पर उनकी भावना को आत्मसात नहीं किया। जैसे मैं दोस्ती या मित्रता के मामले में श्रीकृष्ण से बहुत प्रभावित हूं। मेरा मानना है हर व्यक्ति के लिए मित्रता का मतलब कृष्ण- सुदामा व राधा-कृष्ण सरीखी मित्रता ही होनी चाहिए। मगर मेरी सुनता कौन है!

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