• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 07 August, 2019 06:00 AM | Total Read Count 273
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मीडिया के चहेते थे जयपाल रेड्डी

बेंगलुरू आने पर घर में टीवी खोला ही था कि कांग्रेसी नेता एस जयपाल रेड्डी के निधन की खबर मिली। उनसे अपनी कोई प्रगाढ़ता नहीं थी। मगर पत्रकारिता करते हुए उनसे अक्सर मुलाकाते हो जाती थी। उनकी अंग्रेजी गजब की थी और वे अक्सर ऐसे शब्दो का इस्तेमाल करते थे कि हमें या तो उनके बारे में दूसरो से पूछना पड़ता था अथवा डिक्शनरी देखनी पड़ती थी। वे सचमुच सबसे अलग थे। 

उन्होंने अपनी शुरुआत कांग्रेस से की थी। मगर सिद्धांतों पर चलने वाला यह नेता अपने युवाकाल में आपातकाल लगाए जाने के कारण इंदिरा गांधी से नाराज होकर आपातकाल व उनका विरोध करने लगा। परिणाम यह हुआ कि उन्हें इंदिरा गांधी ने कांग्रेस से निकाल दिया और वह 1977 में पहले जनता पार्टी व फिर जनता दल में शामिल हुए। वे काफी पढ़ते लिखते थे और गलत बात को स्वीकार नहीं करते थे। मूलतः तेलगांना के जयपाल रेड्डी चार बार विधायक पांच बार लोकसभा व दो बार राज्य सभा के सांसद बने। वे संयुक्त मोर्चा सरकार में गुजराल मंत्रिमंडल में शामिल हुए और बाद में कांग्रेस में शामिल होकर यूपीए सरकारों में मंत्री रहे। 

तब उन्होंने कहा था कि मेरे पास राजनीति करने के लिए ऐसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। उन्हें बचपन में ही पोलिया का शिकार हो जाना पड़ा था। वे एक छड़ी बैसाखी के सहारे लंगड़ा कर चलते थे। जब वे कांगेस में नहीं थे तब एक कांग्रेसी नेता ने कहा था कि उन्होंने बचपन में उनके साथ लड़ाई की जाने पर उनकी पिटाई कर उन्हें सीवर में फेंक दिया था। अतः उनकी टांग टूट गई थी। 

इस पर खुद श्री रेड्डी ने यह खुलासा किया था कि वे तो बचपन में पोलियो का शिकार हुए थे। हालांकि वे बेहद स्वाभिमानी थे। जब कॉलेज में पढ़ते समय स्कूल ने उनकी एक शारीरिक कमी के कारण उनकी फीस माफ करने का फैसला किया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा था कि न तो मैं किसी ऐसी जाति से आता हूं कि इसका हकदार बनूं और न ही मेरी पारिवारिक आर्थिक स्थिति ऐसी है कि मुझे फीस कम करवाने की जरूरत पड़े।

उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से एमए किया था। जब वे जनता दल में थे तो पार्टी प्रवक्ता के रूप में उन्हें काफी पसंद किया जाता था व बोफोर्स सरीखे मुद्दे पर वे राजीव गांधी व उनकी कांग्रेस को जमकर घेरते थे। बाद में कांग्रेस में शामिल होने पर उनकी भूमिका ही बदल गई। तब वे कांग्रेसी प्रवक्ता के रूप में जमकर पार्टी का बचाव करते थे मगर यहां भी उन्होंने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। वे यूपीए-1 और यूपीए-दो की सरकारों में मंत्री थे। उन्होंने पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस सरीखे अहम मंत्रालय का काम संभाला। जब रिलाएंस के मुकेश अंबानी ने अपनी गैस के दामों में दोगुनी बढ़ोतरी कर दी तो उन्होंने न केवल जमकर इसका विरोध किया बल्कि कंपनी पर 7000 करोड़ का जुर्माना लगाते हुए कहा था कि हम इस उद्योगपति को यह बता देना चाहते हैं कि यह देश व प्राकृतिक संसाधन उसके नहीं बल्कि हम नागरिको के हैं। 

मगर रिलाएंस ने अपनी ताकत का परिचय देते हुए न केवल उनका मंत्रालय बदलवाया व अपना जुर्माना अदा नहीं किया। रिलाएंस के विरोध के कारण उन्हें विज्ञान व तकनीक सरीखे मंत्रालय का कामकाज संभालना पड़ा। उन्होंने उस बात का खुलकर विरोध नहीं किया। हालांकि बाद में नियंत्रक व महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में उनकी चिंताओं को सहीं बताया। जब वे सूचना व प्रसारण मंत्री थे तब एक बार सिखों का जत्था उनसे मिलने आया तो  वहां मौजूद दूरदर्शन के कैमरामैन ने उनकी तस्वीरे खींच लीं। 

उन्होंने उससे इसकी वजह पूछी तो उसने कहा कि अब तक अपने मंत्री के दैनिक क्रिया-कलापो की तस्वीरे खींच कर उन्हें दिखाना उनके विभाग की परंपरा रही है। इस पर उन्होंने कहा कि आज से ऐसा नहीं होगा। उनका तो यहां तक कहना था कि मेरी समझ में यह नहीं आता है कि दूरदर्शन को सरकार के अधीन रहने की जरूरत ही क्यों? इसे तो स्वतंत्र सूचना का माध्यम होना चाहिए। वे हमेशा बातचीत के लिए उपलब्ध रहते थे व जब जनता दल की सरकार गिरने वाली थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री ने 7 रेसकोर्स रोड स्थित आवास में देर रात तक चलने वाली बैठको के बाद टांग में तकलीफ होने के बावजूद वे रात दो-दो बजे तक पत्रकारो के पास आकर उनके सवालो का जवाब देते थे। 

वे संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रवक्ता भी थे। जब वे पत्रकार के किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहते जोकि सरकार के बारे में होता था तो कहते कि मैं तो जनता दल का प्रवक्ता हूं। व जनता दल के बारे में न बोलने का मन होने पर खुद को संयुक्त मोर्चा सरकार का प्रवक्ता बता देते थे। वे ऐस बुद्धिजीवी नेता थे जिनके शब्दो का चयन व विनम्रता गजब की थी। महज 77 साल की आयु में वे इस दुनिया से चले गए। अब सिर्फ उनकी यादें ही बाकी रह गई है।

 

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