• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 27 June, 2019 06:24 AM | Total Read Count 408
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बौद्ध धर्म का सोका गक्काई

हमारे देश के कुछ मजहब की दास्तां अजब है। जैसे बौद्ध धर्म की स्थापना इसी देश में हुई खूब बढ़ा और फिर समय के साथ यह यहां बिदा हो विदेश में फैला और आज यह दलितो के बीच अपनाया जाने वाला धर्म बनकर रह गया है। मगर पिछले कुछ वर्षों से इसकी मिलती -जुलती शाखा को मेरे कुछ परिचित बहुत गंभीरता से अपना रहे हैं। इस धर्म का शाखा का स्त्रोत तेरहवीं सदी के जापानी पुजारी निचिरेन द्वारा इसे आगे बढ़ाने के लिए हुई पहल से है।

फिर बाद में इसे जापान में त्सुनेसबुरो माकीगुची सोका गक्काई की स्थापना करके इसे आगे बढ़ाया। डाईसाकू इगेडा इस धर्म के मौजूदा अध्यक्ष है। पुजारी निचीरेन का कहना था भारत का दूसरा नाम चंद्रमा की भूमि है जबकि जापान का दूसरा नाम सूरज की जमीन है। बुद्ध भारत में ही पैदा हुए थे अतः कोई कारण नहीं है कि वे वहां दोबारा पैदा न हो। बौद्ध के प्रचार का काम उनका सोका गक्काई नामक संगठन कर रहा है। 

सोका गक्काई को मूलतः उत्पन्न करने वाला समाज कहते हैं जो कि जापान में 13वीं शताब्दी के बौद्ध पुजारी निचिरेन की शिक्षा पर आधारित है। यह जापान का नया धर्म हैं व निचिरेन बौद्ध समाज के अनुयायियों की संख्या बहुत जल्दी बढ़ती जा रही है। निचिरेन ने बौद्ध के कमल सूत्र की विवेचना की थी। उसके अनुयायी नाम म्होयोयो रेंगे क्यो कर जप करते हैं। उनका उद्देश्य शांति, सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देना है। 

इसकी शुरुआत 18 नवंबर 1930 को तो शिक्षाविदो माकीगुची व तोडा ने की थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस संगठन की गतिविधियां काफी ढीली हो गई क्योंकि तत्कालीन जापानी सरकार ने बड़ी तादाद में इसके नेताओं को जेल में बंद करना शुरु कर दिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद इसके सदस्यों की संख्या में काफी तेजी आई व माना जाता है कि उनकी संख्या बढ़कर 7.5 लाख हो गई। 

यह देखकर जापानी सरकार व मीडिया स्तब्ध रह गया। इसके तीसरे अध्यक्ष दाईसाकू इकेडिया ने इसको लोकप्रिय बनाने का अभियान शुरु किया। देखते ही देखते पूरी दुनिया के 192 देशों में उनके मानने वाले अनुयायियों की संख्या 1.20 करोड़ हो गई। हालांकि 1952 से 1991 के दौरान जापान में ही तमाम लोग इसे शक की नजरों से देखते है। हालांकि इस संगठन का मानना है कि हर इंसान के अंदर बौद्ध भाईचारा होता है व उसकी असीम क्षमता व सम्मान के कारण वह निचीरेन द्वारा बचाई गई बौद्ध के तमाम व्यवहारों को जीवन में लागू कर सकते हैं। किसी भी व्यक्ति का कोई भी काम समाज के लिए बहुउपयोगी साबित हो सकता है। इस मानवीय क्रांति के जरिए हम लोग समाज में परिवर्तन ला सकते हैं। सोका गक्काई के निचिरेन की बातों को गोशो कहा जाता है। 

पहली बार 1952 में इसका जापानी से अंग्रेजी भाषा में किया गया अनुवाद प्रकाशित हुआ। उनका मानना है कि बौद्ध या जीवन शक्ति हमें अपना स्व नियंत्रण करना सिखाता है। वह समाज में बदलाव लाता है। विश्वास इस दुनिया व जीवन शक्ति की सबसे बड़ी चीज हैं। दृढ़ विश्वास रखने वाला व्यक्ति ही अच्छी व जटिल जिंदगी जी सकता है। इसके जरिए हर इंसान मानवीय स्वतंत्रता हासिल कर सकता है। इससे शांति व खुशी हासिल होती है। आदमी रोजमर्रा की जिंदगी को जीते हुए ही बौद्धावस्था हासिल कर सकता है। वह न केवल खुद के लिए खुशी हासिल कर सकता है बल्कि दूसरों तक भी उस खुशी को पहुंचा सकता है। इस धर्म के पहले तीन अध्यक्षों के बारे में कहा जाता है कि वे इसके अनुयायियों के साथ संबंध स्थापित कर उनकी देखभाल करते हैं। 

उनका हर अनुयायी से सीधा संबंध रहता है। जब कोई इंसान मानवीय इज्जत, जीवन व बातचीत का सम्मान करता है तो पृथ्वी पर शांति हासिल होती है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र का जाप व धर्म का अनुपालन रोजमर्रा के जीवन में वास्तव में बदलाव लाता है। इस धर्म के मानने वालों की आस्था साबित होने पर एक छोटा सा मंदिर दिया जाता है जिसमें एक रेशमी कपड़े के टुकड़े पर कुछ बौद्ध तस्वीर बनी होती है व प्रेम म्होयोयो रेंगे क्यो व निचिरेन लिखा हुआ होता है। इस कपड़े के चारों कोनों पर बौद्ध पुरान के अनुरुण संरक्षण करने वाली देवियां बनी होती है व अन्य चरित्र जीवन की तमाम अवस्थाओं के प्रतीक होते हैं। वे किसी व्यकित की नहीं बल्कि सिद्धांत की पूजा करते हैं जो लोग नैम (NAM) (MYOHO) म्होयोयो (RENGE) रेंगे (KYO) क्यो का जाप करते हैं उनके जीवन को यह मंत्र प्रकाशित कर देता है। इससे जीवन में असली शक्ति आती है व हमारी बुद्धि प्रकाशमय हो जाती है। 

लोग यह प्रार्थना करते है कि हम लोग दूसरों की भलाई कैसे करें? इसके अनुयायी नियमित रुप से बैठके करके मंत्र का जाप करते है। इसका संगठन अपना अखबार सीक्योशिमबुम भी छापता है जिसके पाठकों की संख्या 55 लाख है। संगठन की सालाना आय डेढ़ अरब डालर है। उसकी कुल संपत्ति खरबों की है। इस संगठन ने जापान में आने वाले भूकंपों व सुनामी के दौरान पीड़ितों को राहत पहुंचाने का भी काम किया था। भारत में भी बौद्ध धर्म के मानने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हालांकि अब इसके अनुयायियों में ज्यादातर पढ़े लिखे लोग ही शामिल है। इस धर्म की तमाम शिक्षाएं अंग्रेजी में ही दी जाती है। अगर आप किसी परिचित के यहां छुट्टी वाले दिन जाना चाहते तो आपको वहां इसके मंत्र का जाप करने वालों की भीड़ मिल जाएगी व इसके चलते इसके मानने वालों ने छुट्टी वाले दिन कही आने जाने का कार्यक्रम बनाना ही बंद कर दिया है व इस धर्म के आस्थावानों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है।

 

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