• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 06 August, 2019 06:53 AM | Total Read Count 372
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वह जम्मू-कश्मीर यादों में रहेगा!

सुबह से ही टीवी खोल रखा था। पूरे देश की तरह मैं भी यह जानने के लिए बैचेन था कि जम्मू कश्मीर में क्या होने जा रहा है? खबरिया चैनल जब अनुच्छेद 370 समाप्त करने,  गृह मंत्री अमित शाह के भाषण के साथ ही तथाकथित बुद्धिजीवी व विशेषज्ञो के विचार काढ़े की तरह पिला रहे थे तब मेरे मन में कुछ और ही घूम रहा था। मैं यह सोच रहा था कि अब अपने हरिशंकर व्यासजी मोदी सरकार के इस कदम पर क्या लिखेंगे! 

फिर मुझे याद आया कि कुछ लोगों के कारण मैं खुद को इस राज्य से बेहद जुड़ा हुआ महसूस करता था। जब दिल्ली प्रेस में रह कर पत्रकारिता कर रहा था तब एक नए युवा पत्रकार ने मुझ से यह राज्य देखने की इच्छा जताई। संयोग से संपादक परेशनाथ ने मुझे व मेरे फोटोग्राफर मित्र को वहां जाकर रिपोर्टिंग करने को कहा। तब राजीव गांधी ने फारूख अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त कर दिया था। 

हम उसे लेकर जोकि इन दिनों भाजपा के आला कमान की आंखों का तारा है सैकेंड क्लास में बैठ रवाना हुए। दोनों की खर्च राशि से हम तीन लोग जम्मू होते हुए श्रीनगर पहुंचे। वहां जब हम लोग डा फारूख अब्दुल्ला से मिलने उनकी पार्टी के दफ्तर पर पहुंचे तो उन्होंने हमारे लिए चाय मंगवाई और पारले जी बिस्कुट का छोटा सा पैकेट हमारे आगे बढ़ाते हुए कहा कि बिस्कुट लीजिए। हम लोगों ने इंडिया से इंपोर्ट किए हैं। 

उनकी बात हम तीनो को बुरी लगी। सुभाष ने कहा कि यह लोग तो हिंदुस्तान को अपना मानते ही नहीं। वही व्यवहार कमोबेश हर नागरिक का था। वहां हालात खराब हो रहे थे। फिर अनेक बार श्रीनगर गया। व्यासजी की बनवाई डाक्युमेंटरी के लिए कई फिल्मों की शूटिंग की। सुरक्षाबलों की मदद से आतंकवादियों के गढ़ में 'सारे जहां से अच्छा' गीत बच्चों से गाते हुए सूट किया। डा फारूक अब्दुल्ला से अक्सर मिला करता था। 

जब भारत सरकार ने अलगाववादी नेताओं से बातचीत करनी शुरू की तो उन्होंने दिल्ली में एक समारोह में कहा था कि भारत सरकार को इन लागों से बातचीत करने की कोई जरूरत नहीं। यह तो ऐसे काले कौव्वे हैं, जिन्हें चाहे किसी भी कंपनी के डिटरनेंट से क्यों न धोओ इनका काला रंग कभी नहीं उतरेगा। सरकार बर्खास्त होने पर उन्होंने मुझसे रिकार्डेड इंटरव्यू में कहा था कि अब मैं जिदंगी में कभी इस पार्टी पर विश्वास नहीं करूंगा। मगर उन्होंने उसकी मदद से सरकार बनाई। भाजपा की वाहवाही की। 

मुझे लगता है कि वे तो शहर के मेले में अपना खोंमचा लगाने वाले ऐसे व्यापारी थे जोकि दरोगा की तरह लगने वाली केंद्रीय सरकार की मदद के बिना धंधा कर ही नहीं सकता था। उनका बेटा अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में मंत्री रहा। उनकी तत्कालीन गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट से बहुत गहरी दोस्ती थी। संयोग से वह मेरे भी दोस्त थे। उनके बेटे ने फारूक अब्दुल्ला की बेटी से प्रेम विवाह किया था। 

एक बार हम तीनों एक साथ श्रीनगर के दौरे पर गए। वहां के वन-विभाग के अफसरों की बैठक में डा अब्दुल्ला ने लाल पीले होते हुए एक अफसर से पूछा कि पहले तो श्रीनगर बहुत हरा-भरा था। उसके तमाम पेड़ कहां गायब हो गए? इस पर अधिकारी ने कहा कि आपको यह सवाल हमसे न पूछते हुए आपको खुद इसका जवाब देना चाहिए। वे चुप रह गए तो फिर बोले- आप खुद तो सपरिवार आतंकवादियों से बचने के लिए दिल्ली व विदेश में दौरा डाले रहे व मुझसे पूछते हैं कि पेड़ कहा चले गए? आतंकवादियों समेत आपकी पार्टी के लोग भी काट ले गए। मैं इन लोगों से पेड़ की रक्षा करता या अपनी व अपने बच्चो की। 

इस पर मुझे कुछ न छापने का इशारा करते हुए दिवंगत राजेश पायलट ने उससे कहा कि तुम तो नेताओं की तरह बर्ताव करते हो। चुनाव लड़ना चाहते हो। उसने पटाक से जवाब दिया- जी हां जरूर। अगली बार अपनी पार्टी का टिकट मुझे दिलवा दीजिए और हम सब चुप हो गए। 

फिर राजेश पायलट से कह कर मैंने मीर नामक एक व्यक्ति की सरकार से मदद करवाई जोकि तमाम अहम आतंकवादियेां को मरवाने में सुरक्षा बलों की मदद कर चुका था व उसके परिवार के कई सदस्यों की आतंकवादयिों ने हत्या भी कर दी थी। 

फिर मुफ्ती मोहम्मद सईद भारत के गृहमंत्री बने। वे मेरे बहुत करीब थे और हम दोनों उनके बुरे दिनों में दिन में बियर व रात को व्हिस्की पिया करते थे। व्यासजी के हड़काने के बाद मैंने उनकी बेटी रूबैय्या सईद का अपहरण हो जाने के बाद उनका इंटरव्यू किया जोकि पूरी दुनिया में बहुत चर्चित हुआ। हालांकि मैं ऐसा करने से कतरा रहा था। वे मेरे पारिवारिक समारोहों में आते रहते थे। मेरे कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी से भी संबंध बहुत अच्छे थे। मैंने उन्हें समझाया कि आप पीडीपी को कांग्रेस में मिलवा दे। मगर उन्होंने कहा कि वह कभी ऐसा नहीं करेगें। वो तो आजकल पूरी तरह से गुलाम नबी आजाद का मैन है। 

जब मुफ्ती साहब पूर्वी दिल्ली के ईस्टएंड अपार्टमेंट में रहते थे तो उन्होंने मुझे फोन करके कहा कि कल सुबह तमाम अखबारों के वरिष्ठ पत्रकारो को लेकर मेरे घर पर सुबह 10 बजे चले आओ। मुझे महबूबा की प्रेस कांफ्रेंस करवानी है। संयोग से जम्मू कश्मीर व गृह मंत्रालय कवर करने वाले हम पत्रकार आपस में अच्छे मित्र थे। अतः उन सबको आमंत्रित करने के बाद जब मैं उनके घर पहुंचा तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक कैमरामैन ने मुझसे कहा कि यह बाप-बेटा कहा बैठेंगे। उनकी कुर्सी जहां लगी थी उसके पीछे एक बड़ी सी कांच की खिड़की थी। वह बोला इससे तो रोशनी आ रही है। इसे ढकना होगा। जब मैंने परदे से ढकने की कोशिश की तो वह काफी छोटा था। उसे पूरा कवर नहीं कर पा रहा था। 

अगली बार मैं उस खिड़की के लिए अलग परदा बनवा कर ले गया। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में सुबह 10 बजे टिक्के खिलाएं। बाद में मैंने उन्हें समझाया कि हम लोग इतनी सुबह मांस नहीं खाते हैं। अगली बार इसकी जगह समोसे मंगवा लीजिएगा। हालांकि जब बाद में मैं एक पत्रकार मित्र से महबूबा का इंटरव्यू करवाने ले गया तो उसके फोटोग्राफर द्वारा तस्वीरे खीचे जाने पर वे नाराज हो गए क्योंकि उन्होंने अपना सिर ढका नहीं था। उन्होंने जावेद नामक अपने पति को छोड़ दिया था जोकि अक्सर मुझसे मिलने आते थे।

जब सतपाल मलिक को मोदी ने जम्मू कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया तो मुझे वैसी ही व उतनी ही खुशी हुई जोकि वीपी सिंह द्वारा मुफ्ती मोहम्मद सईद को गृहमंत्री बनाते समय हुई थी। जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी तब दिल्ली में मेरे मित्र बनने वाले वे पहले व एकमात्र नेता थे। उनकी पत्नी इकबाल मलिक हम पति-पत्नी को बेहद प्यार करती थी। वे दिल्ली विश्व विद्यालय में बंदरों पर शोध कर रही थी। एक बार मैंने सतपाल मलिक से पूछा कि आप दोनों में इतना अंतर होने के बावजूद प्रेम विवाह कैसे हो गया तो वे हंस कर कहने लगे कि इकबाल पढ़ाई में बहुत आगे थी व मैं फसाद में आगे था। हम दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में बहुत आगे थे। बाद में उन्होंने जम्मू कश्मीर को संभाला। और अब वह राज्य दो केंद्र शासित राज्यों में बदलने वाला है। 

 

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