• [WRITTEN BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 11 September, 2019 06:43 AM | Total Read Count 420
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हलवाई और विश्वविद्यालय चांसलर

बचपन में किस्सा सुना था कि एक व्यापारी बनिए का निधन हो गया व उसकी आत्मा को लेकर यमराज चित्रगुप्त के पास पहुंचे। उन्होंने उसके कर्मों का बहीखाता देखकर कहा कि तुम्हारे पाप व पुण्य बराबर है अतः तुम्हें दोनों जगहों पर भेजा जाएगा। बताओं तुम पहले कहां जाना चाहते हो। इस पर वह हाथ जोड़कर कहने लगा कि हुजूर जहां दो पैसे की कमाई हो सके वहीं भेज दीजिए। 

हाल ही में जब एलपीयू या लवली प्रोफेशनल यूनीवर्सिटी के बारे में पढ़ा तो वह बात याद हो आई। अपना तो शुरू से मानना रहा है कि इस देश में बनिए ही ऐसे है जो कि हर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंड़े गाड़ रहे हैं। व्यापार से लेकर प्रशासनिक सेवा, इंजीनियरिंग, पत्रकारिता, डाक्टरी तक हर क्षेत्र में उन लोगों का वर्चस्व है। कुछ ऐसी ही कहानी इस यूनिवर्सिटी की भी है। 

इसके चांसलर अशोक मित्तल भी एक बनिए है। उनके पिता की विभाजन से पहले सियालकोट इलाके में एक छोटी सी नौकरी थी। वे वहां सेना की एक पलटन का खाना बनावा कर देने वाली रसोई में सहायक का काम करते थे। जब देश का विभाजन हुआ तो वे उस टुकड़ी के साथ ही फिरोजपुर आ गए और यहां उसके लिए खाना बनाने का काम करने लगे। उन्होंने सेना की बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर से अपना धंधा शुरू करने के लिए 500 रुपए उधार लिए जोकि उस समय बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। उस राशि से उसने जालंधर में एक हलवाई की दुकान खोली व वहां लड्डू व दूसरी मिठाइयां बेचने लगे। वे काफी स्वादिष्ट होने के साथ-साथ ज्यादा महंगी भी नहीं थी।

सो जालंधर कैंट के सदर बाजार में लवली स्वीट हाउस के नाम से खोली गई उनकी दुकान चल निकली। काम इतना ज्यादा बढ़ गया कि उनके बच्चे भी दुकान पर ही काम करने लगे। बड़े बेटे रमेश ने 11वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी व दुकान पर काम करने लगा व दूसरा बेटा नरेश अपना कॉलेज भी पूरा नहीं कर पाया। बड़े विरोधों के बावजूद उनके सबसे छोटे बेटे अशोक ने ग्रेजुएशन किया व फिर वकालत की शिक्षा ली। वह दिन में दुकान पर काम करता व रात को घर पर पढ़ाई करता। 

दुकान तरक्की करने लगी व 1980 तक लवली स्वीट्स सिर्फ जालंधर में ही नहीं बल्कि पूरे पंजाब में मशहूर हो गया। इसे संयोग ही कहेंगे कि देश के सारे नामी मिठाई के व्यापारी व उत्पादक राजस्थान से ही है। इनमें बीकानेर वाला, कलेवा से लेकर लवली स्वीट्स तक शामिल है। मित्तल जयपुर के निकट सुजानगढ़ से पंजाब आए थे। बच्चो ने बड़े होने पर दूसरे क्षेत्रों में अपना हाथ व किस्मत आजमाने की कोशिश की। 

सबसे पहले उन्होंने बजाज मोटर साईकिल की एजेंसी लेने का प्रयास किया। जब रमेश इस सिलसिले में पुणे जाकर इस कंपनी के एक मैनेजर से मिला तो उसने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि अच्छा तो अब हमारे इतने बुरे दिन आ गए है कि हलवाई मोटर साईकिल बेचेंगे। उन्होंने इस जवाब से हार नहीं मानी और कंपनी के मालिक राहुल बजाज से मिलने की कोशिश की। जब वे मिले तो उन्होंने बताया कि वे जालंधर की एजेंसी दिल्ली के एक उद्योगपति को देने का वादा कर चुके हैं। 

इस पर अशोक मित्तल ने उनसे कहा कि मैं व्यापारी बनिया हूं व ग्राहक की जेब व मानसिकता को बहुत अच्छी तरह से पहचानता हूं। इससे खुश होकर राहुल बजाज ने उन्हें शहर में अपने दुपाहिया वाहनों की एजेंसी दे दी। शुरू में तो उन्हें इस धंधे में नुकसान हुआ मगर देखते ही देखते पंजाब के राहुल बजाज के सबसे बड़े वितरक बन गए। फिर उन्होंने मारूति कार की एजेंसी ली। अगर आप कार से अमृतसर जाए तो जालंधर में मुख्य सड़क पर उनके शोरूम के बाहर तमाम मारूति कारें एक दूसरे से लटकती हुई दिख जाएंगी। 

जब सरकार ने शिक्षा नीति में बदलाव किया तो पहले उन्हें 2001 में फगवाड़ा में 3.5 एकड़ में अपना पहला कॉलेज खोला। वे इस क्षेत्र में बहुत कुछ करना चाहते थे मगर यह काम सिर्फ एक विश्वविद्यालय ही कर सकता था। सरकारी नीति में बदलाव होने पर उन्होंने 2005 में लवली प्रोफेशनल यूनीवर्सिटी की स्थापना की जोकि पूरे पंजाब में निजी क्षेत्र में स्थापित होने वाला पहला विश्वविद्यालय था। देखते ही देखते उन्होंने उसे बढ़ाना शुरू कर दिया और आज वह देश के निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी बन गई है। 

इसका क्षेत्रफल 600 एकड़ का है। जहां 20000 छात्र पढ़ते हैं। उनका लक्ष्य इसे 2025 तक दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी बनाने का है। देश में सबसे ज्यादा विदेशी छात्र (2000) लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में ही पढ़ते हैं। पास होने पर मिठाई बांटे जाने का किस्सा तो सुना होगा, मगर मुंह मीठा करवाने वाला हलवाई एक दिन डिग्रीयां बांटेगा, यह पहली बार सुना है। आज मित्तल परिवार 800 करोड़ की संपत्ति का मालिक है व 17 सदस्यो का उनका परिवार भारत का लक्ष्मी मित्तल बन चुका है जो मर्सिडीज गाडि़यों में अपनी दुकान व विश्वविद्यालय आते- जाते हैं।

 

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