• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 21 June, 2019 06:52 AM | Total Read Count 274
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आयकर अफसरों में बरखास्तगी

किसी पत्रकार की सफलता उसकी खबरों पर निर्भर करती है जोकि उसके आला जगहों पर बैठे सूत्रो से आती है। यह सूत्र सरकारी अफसरो से लेकर राजनीतिज्ञ तक होते हैं। इसलिए जब दिल्ली आने के बाद मेरी जान-पहचान आयकर व आबकारी विभाग के दो आला अफसरो से हुई तो मुझे बहुत खुशी हुई। मगर पिछले कुछ दिनों से इन दोनों के नाम अखबार में छपने के कारण स्तब्ध रह गया। 

हुआ यह कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले कुछ दिनों में भ्रष्ट अफसरशाही पर कार्रवाई करते हुए जिन वरिष्ठ अफसरो को धारा 56जेके लिप्त तीन महीनो का नोटिस देकर जबरन रिटायर किया उनमें उन दोनों के नाम भी शामिल है। इनमें से एक दिल्ली में तैनात प्रिंसिपल कमिश्नर अनूप कुमार श्रीवास्तव भी है। उन्होंने तो इस कार्रवाई के लिए राजस्व सचिव पर निजी दुश्मनी के कारण कार्रवाई करने का आरोप लगाया है।

अनूप कुमार श्रीवास्तव से मेरी जान-पहचान एक प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार के जरिए हुई थी। वे काफी मिलनसार थे व खबरों की दृष्टि से मेरे लिए एक उपयोगी स्त्रोत हो सकते थे। लंबा चौड़ा शरीर उस पर शैवीली मूंछों के कारण उनका व्यक्तित्व काफी जमता था। उन्होंने मुझे बताया था कि वे अवध के किसी राजसी परिवार के सदस्य थे। वे सार्वजनिक जीवन में काफी सक्रिय थे। व तमाम संगठन चलाते थे जिनमें ज्यादातर उनकी पत्नी के नाम पर चलते थे। बाद में वे पंडारा रोड़ स्थित मेरे घर के निकट काका नगर में आकर रहने लगे। 

मैं अनेक बार उनके यहां खाने पर भी गया। उन्होंने घर को बहुत सुंदर तरीके से सजाया था। बाद में खबर छपी कि सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। वे बेहद दुस्साहसी थे। सरकारी कर्मचारी होते हुए भी उन्होंने फिक्की सभागार में सम्मेलन करके तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों को सम्मानित किया था। वे तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय के काफी करीब थे व उनके घर पर अक्सर पार्टियां आयोजित करते थे। जिनमें देश के बड़े-बड़े पदों पर तैनात आला अफसर आया करते थे। 

जब वे गिरफ्तार हुए तो बहुत बुरा लगा। पता चला कि उनकी मेज से 39 सिमकार्ड बरामद हुए थे जोकि उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अलग-अलग सिमकार्डों के थे। जेल में रहते हुए उनको दिल के आपरेशन से गुजरना पड़ा। किस्मत का खेल तो देखिए कि महज एक साल के अंदर दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया और वे सेवा में वापस आ गए व उत्तर पूर्व में तैनात कर दिए गए। 

सीबीआई ने 1996 में उन पर मैसर्स जगजीवन को आपरेटिव हाऊस बिल्डिंग को सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने में मदद करने का आरोप लगाया था। उन पर कर चोरी के एक मामले में रिश्वत लेने का मामला भी 2012 में दर्ज किया गया। 12 जनवरी को उन्हें सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया व उन पर उत्तर प्रदेश के कपूर निर्माताओं से भी पैसे वसूलने के आरोप लगे। उनकी पत्नी द्वारा 3.5 करोड़ रुपए के शेयरो की खरीद बिक्री के आरोप लगे। छूटने के बाद वे दोबारा नौकरी पर आ गए व उन पर हर साल नए-नए आरोप लगते रहे। 

सीबीआई ने उनके खिलाफ गैर कानूनी तरीके से लोगों को करोड़ो कीराशि का भुगतान करने से लेकर लाल चंदन की तस्करी तक में हाथ होने के आरोप लगाए। विभाग के एक आला अफसर के मुताबिक दिल्ली का राज संभालने के बाद उन्होंने विभाग में लेन-देन का तरीका ही बदल दिया। आरोप है कि पहले सुप्रिटेंडेट सहायक के जरिए व वह डिप्टी के जरिए व वह इंस्पेक्टर के जरिए पैसे लेते थे। जबकि दिल्ली आने के बाद श्रीवास्तव ने सीधे लोगों से संपर्क साधा जिससे उनकी अहमियत समाप्त हो गई व रिश्वत की राशि बढ़ गई। उससे जान-पहचान होने के बाद व्यापारियों ने नीचे के अफसरो को पूछना बंद कर दिया था। दावा किया जाता है सीधा रिश्ता कायम हो गया था।

वहीं कुछ दिन पहले सरकार ने जिन 14 अफसरो को नौकरी से हटाया था उनमें आईआरएस अफसर अशोक अग्रवाल भी थे जो तब मेरे बाबा खड़क सिंह मार्ग स्थित घर के निकट अशोका मार्ग पर रहते थे। मेरी उनसे जान-पहचान सोनिया गांधी के तत्कालीन निजी सचिव वी जार्ज व उनके एक करीबी मित्र के जरिए हुई। वे मुझे खबरे देते थे। जैसे कि ताज पैलेस होटल में एक व्यापारी, सुभाष बड़जात्या के यहां फेरा उल्लंघन के कारण छापा मारने की खबर उन्होंने ही दी थी। बाद में पता चला कि पहले वे अपने लोगों की मदद से उसके कैम्पस पर आपत्तिजनक कागज ले जाते व बाद में वहां छापा मारकर उसे पकड़ लेते थे। उन्हें 28 दिसंबर 1999 को गिरफ्तार किया गया। उन पर आय से ज्यादा संपत्ति रखने और करोड़ो रुपए गलत तरीको से कमा कर अपने पिता को धंधा करने के लिए विदेश भेज दिया। 

संयोग तो देखिए कि 15 साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें हर मामले से बरी करते हुए सरकार को उन्हें पुनः नौकरी पर लेने के लिए बाध्य किया। उन्होंने तो टाइम्स समूह के अशोक जैन तक को गिरफ्तार किया था। अब सरकार ने उन्हें पुनः नौकरी से हटा दिया है। एक समय था जबकि वे बहुत ताकतवर हस्ती हुआ करते थे। व्यापारी उनके नाम से कांपते थे मगर समय का फेर तो देखिए कि वे अधिकारी जिन्हें उनके सहयोगी 'डाकू' कह कर बुलाते थे उनका एक फटके में सफाया हो गया।

 

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