• [WRITTEN BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 10 September, 2019 08:49 AM | Total Read Count 229
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जेठमलानी हमेशा खबरों में रहे

राम जेठमलानी और हरिशंकर व्यास जी से मेरी मुलाकात वकील रवींद्र कुमार ने करवाई थी। संयोग से जेठमलानी इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के दोस्त थे और उन्होंने बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित एक्सप्रेस भवन में उनका दफ्तर बनवा रखा था। जब वीपी सिंह ने जनमोर्चा बनाया तो उसी दिन रवींद्र कुमार ने राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा बनाकर राम जेठमलानी को उसका अध्यक्ष बना दिया। 

इसके पीछे जेठमलानी का ही दिमाग व पैसा लग रहा था। रवींद्र कुमार उनके साथ लंबे अरसे तक रहे और उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्च के सांसदों को रिश्वत व अपनी सरकार बनवाने के आरोप में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के खिलाफ बहुचर्चित मुकदमा लड़ा। बाद में मेरा जेठमलानी के यहां अक्सर आना जाना होने लगा। वे हमेशा चर्चा और खबरों में रहते थे। 

कुछ साल पहले मैंने उनका लंबा इंटरव्यू लिया था तो वे लंबे अरसे तक खुलकर बोले। सच कहा जाए तो वे अजीबोगरीब शख्सियत थे। एक सिंधी वाले सौ गुण उनके अंदर मौजूद थे व जिंदगी के हर सुख का मजा लेते थे। उनकी गिनती देश के जाने-माने वकीलो में होती थी। वे मूलतः पाकिस्तान से थे व बंटवारे के बाद भारत आए थे। वे वहां के सिंध प्रदेश के सिखारपुर में 14 सितंबर 1923 जन्मे थे व बचपन से काफी मेधावी थे। 

महज 17 साल में ही कानून में स्नातक हो गए थे। तब वकालत करने के लिए 21 साल का होना जरूरी था। उनके मामले में बार काउंसिल ने उन्हें महज 18 साल में ही वकालत करने की अनुमति दे दी थी। कुछ दिनों बाद वे 96 साल के होने वाले थे। पिछले कुछ वर्षों से उनके स्वास्थ्य को लेकर तरह-तरह की खबरे उड़ती रही मगर उन्होंने बैडमिंटन खेलना व शाम को देा पैग लगाना व महिलाओं के बीच रहना नहीं छोड़ा। 

उनका कहना था कि अगर आपको बुढ़ापा आ जाए तो आपको युवा महिलाओं के बीच रहना चाहिए। यह बात उन्होंने कैमरे पर भी स्वीकार की। वे देश के बहुत जाने-माने वकील थे व अपनी पसंद से मुवक्किल व फीस लेते थे। हालांकि राज्यसभा के सदस्य रहे जेठमलानी ने अपने 2 अकबर रोड़ स्थित घर के बाहर बोर्ड लगा रखा था कि वे अब कोई नया केस नहीं ले रहे हैं। उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा था कि मैं तो अब डिपार्चर लाऊज में बैठा हुआ भगवान के यहां जाने वाली उड़ान का इंतजार कर रहा हूं। 

धारा के खिलाफ बहने व विवादों में बने रहने में उन्हें काफी मजा आता था। वे कभी डरते नहीं थे। एक बार उन्होंने चंद्रशेखर के घर के बाहर धरना दे दिया तो उनके समर्थको की पिटाई से वे जमकर घायल हो गए पर पर उन्होंने विरोध करना बंद नहीं किया। वे भाजपा के उपाध्यक्ष बने और जब उन्होंने इंदिरा गांधी हत्याकांड के अभियुक्त बलबीर सिंह का मुकदमा लड़ने का फैसला किया तो पार्टी ने उन्हें निकाल दिया। हालांकि उन्होंने बाद में बलबीर सिंह को बरी करवा दिया।

उन्होंने इस हत्याकांड के प्रमुख अभियुक्त केहरसिंह के बेटे रंजीत सिंह को अपने दफ्तर में नौकरी दी व जब केंद्र में मंत्री बने तो वह मंत्रालय में बैठकर उनका काम संभालने लगा। वकालत में उनका नाम देश के बहुचर्चित नानावती कांड के कारण हुआ था। ध्यान रहे कि 1950 में कमांडर नानावती पर अपनी पत्नी के प्रेमी प्रेम आहूजा की हत्या का मुकदमा चला उन्होंने तब प्रेम आहूजा के वकील के रूप में काम करते हुए तत्कालीन सरकारी वकील यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ की मदद की जोकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। 

उन्होंने दाउद को वकील के रूप में सलाह दी। जाने-माने तस्कर हाजी मस्तान के वकील के रूप में काम किया। संसद पर हमले के मुख्य अभियुक्त अफजल गुरू को बचाने की कोशिश की। जब राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए बोफोर्स रिश्वत कांड का खुलासा हुआ तो वे हर रोज इंडियन एक्सप्रेस में उनसे 10 सवाल पूछते थे। मजेदार बात भी है कि वे बाद में हिंदूजा बंधुओं के वकील बने। जिनका इस कांड में नाम आ रहा था व उन्हें सजा से बचा लिया। उनकी फीस बहुत ज्यादा थी। हालांकि उनकी सच्चाई थी कि वे कई मुकदमे मुफ्त में भी लड़ते। उन्होंने 1977 में तत्कालीन कानून मंत्री एचआर गोखले के खिलाफ उत्तर पूर्व मुबई लोकसभा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़कर उन्हें हराया व अनेक बार लोकसभा के व 6 बार राज्यसभा के सदस्य रहे।

 उन्होंने अदालत में लालू यादव व अमित शाह का बचाव किया। वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कानून मंत्री रहे। तब उनका मुख्य न्यायाधीश आरएस आनंद से टकराव हुआ व वाजपेयी ने उनका मंत्रालय बदल दिया। हालांकि वे इसके लिए दिवंगत अरूण जेटली को दोषी मानते थे व अंत तक यह कहते थे कि मैं उन्हें निपटा कर ही दम लूंगा। यह भी क्या संयोग है कि जेटलीजी का कुछ समय पहले ही उनके स्वर्गवास होने से पहले निधन हो गया। उन्होंने अटलबिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ा। पार्टी से पांच साल के लिए निकाले गए। उन्होंने संजय सिंह को बचाया। 

जब उन्होंने राजीव का विरोध करते हिंदुजा का मुकदमा लड़ा तो इस बारे में पूछे जाने पर राजीव गांधी ने कहा कि मैं हर कुत्ते के भौंकने का जवाब नहीं देता हूं। जब यह बात जेठमलानी को बताई गई तो उन्होंने कहा कि रखवाली करने वाला कुत्ता सिर्फ चोरों पर भौंकता है। जब एक बार अदालत में उनकी भाषा से दुखी होकर कुछ न्यायाधीशों ने उनसे कहा कि ऐसा करने से आपकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है तो उन्होंने छूटते ही कहा कि मुझे इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि मेरी कोई प्रतिष्ठा ही नहीं है।

 

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