• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 24 June, 2019 07:05 AM | Total Read Count 279
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साईकिल और कुत्तावाद!

अक्सर पुरानी यादें जब ताजी हो जाती हैं तो अपने बचपन के अभिन्न मित्रों को फोन करके मन बहला लेता हूं। मैंने कक्षा में विज्ञान के चमत्कार का जो निबंध पढ़ा था उसका सबसे बड़ा उदाहरण मुझे सेलफोन लगता है जिसके जरिए हम लोग कहीं भी दूर-दराज बैठे हुए उस पर व्हाट्स-एप, फेसटाइम के जरिए शक्ले देखते हुए एक दूसरे से बात कर सकते हैं। जब कनाडा गया तो वहां फोन इंटरनेट पर चलता था जोकि एकदम मुफ्त था मगर कमरे के बाहर फोन काम नहीं करता था। 

आज जब फोन पर नजर डाली तो बचपन के एक दोस्त ने साईकिल समेत कुछ मजेदार चीजे लिखी थी। मेरे इस दोस्त का घर का नाम छोटे है जबकि पापाजी ने उसका नाम राघवेंद्र कौशलेंड प्रकता वाजपेयी रखा था। मैंने पापाजी पर एक कॉलम भी लिखा था व अब मुझे अक्सर लगता है कि भले ही तब हम लोग उन्हें गंभीरता से न लेते हों मगर उनकी बात में दम था और वह अंततः सही साबित होते थे। 

एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि उत्तर प्रदेश के कानपुर सरीखे शहर का ब्राह्मण होने के बावजूद पापाजी ने जो कि वकालत कर चुके थे अपने चारों बेटो के इतने बड़े नाम क्यों रखे? ब्राह्मणों में आज भी बेटो की बहुत अहमियत होती है। पापाजी के तो उस समय में चार बेटे बड़े, छोटे, पप्पू व गप्पू थे। छोटे अब आरकेपी वाजपेयी से शायद केपी राघवेंद्र हो गया है। वह अब भारत सरकार के मंत्रालय में आला अधिकारी है।

हाल ही में जब भारत में दुनिया फादर्स डे मना रही थी तो उसने मुझे लिख भेजा कि लोग 35 डिग्री सेंटीग्रेड में ही घबरा रहे है और अपने कानपुर के लोग 45-45 डिग्री में भी बोल रहे हैं साला समोसा गर्म है। इससे पहले उसने लिखा था कि हमारे जमाने में पिताजी किसी फादर डे के मोहताज नहीं थे, जब भी उनका दिल करता था, जूता उठाकर याद दिला देते थे कि मैं बाप हूं। 

वे कभी तमाम रोगों के घरेलू ईलाज के बारे में पोस्ट भेजते हैं तो कभी सेहत तंदरूस्त रखने से लेकर बिजली बचाने तक के तरीके लिखते हैं। वैसे वे इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है। कभी खाने-पीने को लेकर कहावते भेजते हैं। कुछ दिल पहले आयुर्वेद का दोहा भेजा था कि 'पानी गुड़ में डालिए, बीत जाए जब रात, सुबह छान कर पीजिए, अच्छे हों हालात। प्रातः काल पानी पिए, घूंट-घूंट कर आप, बस दो गिलास है, हर औषघि का बाप। 

कभी-कभार उनके द्वारा भेजे गए चुटकूले बहुत मजेदार होते हैं जैसे कि एक बार उन्होंने लिखा कि जब अमेरिका में बत्ती चली जाती है तो लोग पावर हाऊस को फोन करते हैं और भारत में लोग पड़ोसी से पूछते है कि क्या तुम्हारे यहां बत्ती आ रही है।

आज उन्होंने साईकिल चलाने के दिनों की याद करते हुए लिखा कि हमारे जमाने में साईकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी। पहला चरण कैंची, दूसरा डंडा व तीसरा चरण गद्दी होती थी। तब साईकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साईकिल बस पिताजी या चाचा चलाया करते थे तब साईकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी। जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी। 

ऐसी साईकिल से गद्दी चढना संभव नहीं होता था। कैंची तो कला होती थी जहां हम साईकिल के प्रेम के बने त्रिकोण के बीच घुसकर दोनों पैरो को दोनों पैडल पर रखकर चलाते थे। आज की पीढ़ी इस एडवेंचर से नहीं भरी हुई है। उन्हें नहीं पता कि आठ-दस साल की उम्र में भी 24 इंच की साईकिल चलाना मानों जहाज उड़ाने जैसा होता था। हमने ना जाने कितनी दफा अपने घुटने और मुंह तुड़वाए है और गजब की बात ये है कि तब दर्द भी नहीं होता था। 

गिरने के बाद चारों तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे और अपने कच्छे या हॉफ पेंट को साफ करने लगते थे। अब बहुत विकास हो गया है। दो-दो फुट की छोटी साईकिले बाजार में आ गई है। मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी उम्र में बड़ी साईकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी। जिम्मेदारियों की पहेली होती थी। जहां आपको यह जिम्मेदारी दी जाती थी कि अब आप गेंहू पिसने या राशन की दुकान पर जाने लायक हो गए हैं। 

इधर से चक्की तक साईकिल लुढ़काते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए। इस जिम्मेदारी को निभाने में गजब की खुशी होती थी। यह भी सच है कि हमारे बाद कैंची प्रथा विलप्त हो गई। हम लोग तो दुनिया कि वह आखिरी पीढ़ी है जिसने तीन चरणों में साईकिल चलाना सीखा था।

छोटे ने बताया कि निर्मलजी नहीं रहे। न तो वे शाखा में थे और न ही हम लोगों का शाखा से कुछ लेना-देना था फिर भी उनके बड़े होने के कारण हम दोस्त लोग उन्हें आप से संबोधित करते थे। वे काफी लंबे थे व सारा जीवन अभाव से गुजरे इसके बावजूद जब हम लोग पढ़ते थे तो वे उस समय कमाते थे व शाम को अक्सर हम लोगों को समोसे व जलेबी खिलाने ले जाते थे। उनका दुर्भाग्य था कि वे कानपुर सरीखे छोटे से शहर में पैदा हुए थे। वे गजब के कवि थे व उन्होंने हिंदी साहित्य में कुत्तावाद चलाया था जोकि उनके निजी अनुभव पर आधारित था। उनकी कुछ लघु कविताएं इस प्रकार हैं- एक दिन, एक ने, एक की रोटी छीन ली, इस घटना से कुत्तो का कोई संबंध नहीं था।सोचता तो हूं कि कुत्तो से बचकर रहूं पर क्या करूं जब काट लेता है जब पहचान पाता हूं। 

एक बार कवि सम्मेलन में उन्होंने मंच से कविता सुनाई कि मेरी बात मानिए कुत्ते मत पालिए, दो टुकड़े मेरी तरफ फेंक कर मुझे भी आजमाइए। इसके बाद वे हंसते हुए श्रोताओं की ओर इशारा करते हुए कहने लगे कि 'इन्हें भी आजमाइए।' आज जब पूरा देश कुत्तावाद की लहर की चपेट में है तो निर्मलजी दुनिया छोड़कर जा चुके हैं।

 

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