• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 08 August, 2019 06:49 AM | Total Read Count 236
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ओजस्वीता का पर्याय थीं सुषमा स्वराज

इन दिनों लगता है कि जिनके बीच जीवन जीया, उनके हमारे बीच से जाने का जब सिलसिला शुरू होता है तो वह चलता ही रहता है। पहले एस जयपाल रेड्डी दुनिया से गए फिर अचानक शीला दीक्षित को दिल का दौरा पड़ा और कल अचानक सुषमा स्वराज का दिल की गतिविधि रूकने से देहांत हो गया। हालांकि वे लंबे अरसे से बीमार चल रही थीं। वे मधुमेह से पीडित थी और कुछ साल पहले इसके कारण खराब होने वाली उनकी एक किडनी को भी बदल दिया गया था। 

हिंदी में जो शब्द ओजस्वी है उसका मानवी स्वरूप थी सुषमा स्वराज। उनका हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू पर समान अधिकार था। इसके आलावा वे धर्म की जानकारी भी रखती थी। वे मूलतः बटवारे के पहले पाकिस्तान से आए परिवार में पैदा हुई थी। बंटवारे के बाद उनके पिता हरियाणा में बस गए थे। वे भाजपा का मध्यवर्गीय महिला चेहरा थी। 

वे 1977 में पहली बार हरियाणा के अंबाला छावनी से चुनाव लड़कर जीती और देवीलाल सरकार में शिक्षा मंत्री बनी तो उस समय वे देश में सबसे कम उम्र की मंत्री थी। दोबारा वे इसी सरकार में श्रम मंत्री बनी। उन्होंने बाद में ब्राह्मणबहुल्य करनाल सीट से कांग्रेसी चिरंजी लाल शर्मा के खिलाफ दो बार चुनाव लड़ा व दोनों बार हार गई। 

उन्होने 1989-90 में दिल्ली का दामन थामा। जब दिल्ली में विधानसभा बनी और मुख्यमंत्री पद को लेकर मदनलाल खुराना व साहिब सिंह वर्मा के झगड़े सड़क पर आने लगे तो भाजपा हाईकमान ने सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। वैसे भी वे पार्टी के वरिष्ठ ब्राह्मण नेता कृष्णलाल शर्मा के काफी करीब थी जोकि दिल्ली की राजनीति में बहुत दखल रखते थे। उनके नेतृत्व में जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा को महज 20 सीटे मिली व शीला दीक्षित सत्ता में आई जिन्होंने लगातार तीन बार मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल किया।

कहने को तो उनकी गिनती भाजपा के ऐसे वरिष्ठ नेताओं में की जाती थी जोकि बेहद सौम्य माने जाते थे मगर समाजवादी मूल का होने के बावजूद सुषमा स्वराज में भाजपा नेताओं में पाए जाने वाले तुनुक मिजाजी के गुण भरे हुए थे। वे अपने पति स्वराज कौशल के जरिए ही समाजवादी पार्टी में आई थी व वहां जार्ज फर्नाडीस, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव व चंद्रशेखर के काफी करीबी रही। 

जब वे 7- जंतर-मंतर रोड स्थित जनता पार्टी के आफिस में उसके तत्कालीन अध्यक्ष चंदशेखर से ज्ञान लेने जाती थी तो उनका परिवार याकि उनके पति का पूरा समर्थन हुआ करता था। चंद्रशेखर ने अटलबिहारी वाजपेयी से उन्हें भाजपा में लेने का अनुरोध किया था और उन्होंने इसकी जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौँपी और फिर वे उनके काफी करीब मानी जाने लगी। हालांकि जब जिन्ना की मजार पर जाने के अपराध में संघ ने उनका इस्तीफा लिया तो वे अरुण जेटली की तरह ही उनके समर्थन में सामने नहीं आई और इस कदम के विरोध में एक बयान तक नहीं दिया। 

सुषमा स्वराज हालात और नेताओं को पहचानने में माहिर थी और बहुत जल्दी ही संघ प्रमुख सुदर्शन से उन्होंने अच्छे संबंध बना लिए थे। वे उन्हें पिताजी कहती थी। जब वे भाजपा की प्रवक्ता थीं तो उनकी अक्सर कुछ संवाददाताओं से इस बात पर लड़ाई हो जाती थी कि उन्होंने अपने अखबार में उनके विरोध में लिखा होता था। वे उनके संपादको से उनकी शिकायत करने की धमकी देती थी। इसके बावजूद वे भाजपा की सबसे बुद्धिमान, ओजस्वी व तेजस्वी नेताओं में गिनी जाती थी। 

कहते थे कि उनकी जीभ पर सरस्वती विराजती है। इसका प्रमाण उन्होंने कर्नाटक के बेल्लारी लोकसभा उपचुनाव लड़ते समय दिया था। वे कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के खिलाफ लड़ी व चुनाव लड़ते समय उन्होंने चंद दिनों में ही धारा प्रवाह कन्नड़ भाषा बोलना व कन्नड़ में भाषण देना सीख लिया था। सोनिया गांधी जीत गई मगर उन्होंने सुषमा स्वराज को महज 45000 वोटो से हराया। 

जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात चली थी तो उन्होंने कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगी। बाद मे कर्नाटक के भ्रष्ट धनपशुओं बेल्लारी बंधुओ के कंधे पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती भी दिखी। उसकी तस्वीर अखबारों में छपी तो उनके साथ अपने संबंधों पर वे चुप्पी साध गई। जब क्रिकेट के धंधे में ललित के घपले और भगौड़ेपन का विवाद फूटा और उनकी बेटी बांसुरी के वकील होने का हल्ला हुआ तो वे पत्रकारों से चिढ़ गई और उन्होंने उनसे दूरी बना ली। मिलना-जुलना ही बंद कर दिया था। तब उन्होंने अपने मंत्रालय में पत्रकारों के प्रवेश पर ही रोक लगा दी थी। 

सुषमा स्वराज को ओमप्रकाश चौटाला बेहद नापसंद करते थे। वे हरियाणा की राजनीति में बंसीलाल की मुरीद थी और बंशीलाल ने उनके पति को मिजोरम का उपराज्यपाल बनवाया क्योंकि तब हरियाणा विकास पार्टी देवीलाल के लोकदल की तरह ही एनडीए सरकार को समर्थन दे रही थी। हालांकि जनश्रुति है कि अपने पति की वहां के समाज में अतिसक्रियता को देखते हुए उन्होंने उनसे नाखुशी जाहिर की। लाहौर के धर्मपुरा इलाके के परिवार और अंबाला के बचपन वाली में 67 वर्षीय महिला नेता सुषमा स्वराज की राजनैतिक रफ्तार, कुशलता और महत्वकांक्षाओं की प्राप्ति में उनका रिकार्ड भाजपा की तमाम महिला नैत्रियों से बहुत अधिक रहा।  उन्होंने चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए युवा समाजवादी नेता स्वराज कौशल से शादी की। 

उन्हें अटलबिहारी वाजपेयी के बराबर का वक्ता माना जाता था। वे 2009 में भाजपा की सबसे सुरक्षित सीट विदिशा से चुनाव लड़ी। हालांकि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से 2019 का चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। वे केंद्र में कई बार मंत्री रही और उन्होंने पार्टी, सत्ता व भारत की राजनीति के पुरूष नेताओं को देखते-समझते  हुए अपने आपको जिस शिद्दत से उभारा, अरूण जेतली जैसो से जैसा मुकाबला किया उसकी दास्तां मामूली नहीं है।  जो हो नियति का संयोग कि दिल्ली की दो महिला मुख्यमंत्री महज एक पखवाड़े के अंदर दुनिया छोड़कर चली गई।

 

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