• [WRITTEN BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 15 August, 2019 08:33 AM | Total Read Count 332
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यरकौड लाजवाब पर्वतीय इलाका

बिटिया ने बताया कि इस शनिवार को हम लोग बेंगलुरू के निकट स्थित एक पर्वतीय पर्यटक इलाके यरकौड जाएंगे। यह इलाका तमिलनाडु के जाने माने सेलम शहर के पास है जोकि बेंगलुरू से 237 किलोमीटर दूर है। सेलम का नाम तो बचपन में ही सुना था जबकि स्टील अथॉरटी ऑफ इंडिया ने प्रगति मैदान में लगने वाले अपने सालाना मेले में अपने सेलम कारखाने में रंगीन स्टील बनाने का प्रदर्शन किया था। 

यरकौड सेलम शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित एक पर्वतीय पर्यटन क्षेत्र हैं। हम लोग बेंगलुरू से वहां के लिए रवाना हुए जोकि पड़ोसी राज्य तमिलनाडु का हिस्सा है। सड़के काफी अच्छी थी। हालांकि ट्रैफिक सिग्नल की बत्तियो के रंग कुछ अलग थे। हमारे यहां के लाल, पीले व हरे रंग की जगह उनके रंग लाल, सफेद (रंगहीन) व नीले थे। 

जहां कर्नाटक के हिस्से में आने वाले महत्वो के नाम के आगे हल्ली, पल्ली दल्ली आदि शब्द जुड़े हुए थे। वहीं तमिलनाडु में मकानों का रंग पीला, नीला बैगनी, गुलाबी, हरा था। रास्ते में बड़ी तादाद में गन्ने का रस व हरे नारियल बेचने वालो की दुकाने थी। हरा नारियल यहां बहुतायत में पैदा होने के बावजूद दिल्ली की तुलना में सस्ता नहीं है व 40 रुपए का आता है जबकि यहां 50 रुपए का पीला नारियल भी बिकता है जिसका पानी काफी मीठा बनाया जाता है। 

लोग कच्चे आम की नमक लगी फांके भी खाते हुए दिखाई पड़े। हमारा होटल सेलम में था क्योंकि यरकौड स्थित रिसाई के सारे कमरे छुट्टी के कारण बुक हो चुके थे। करीब 3 घंटे में सेलम पहुंचने के बाद हम लोगों ने वहां आराम किया व अगले दिन चाय नाश्ता करके यरकौड के लिए निकल पड़े। करीब 35-40 मीटर का पहाड़ी रास्ता था। व करीब समुद्र तल से दो किलोमीटर की ऊंचाई पर यह दर्शनीय स्थल था। 

चक्का पार रास्तों से होते हुए हम लोग यरकौड पहुंचे जहां एक बहुत बड़ी प्राकृतिक झील है। पानी से डरने के बावजूद हमने तमिलनाडु पर्यटन विभाग द्वारा संचालित नाव किराए पर ली। अभी झील का आधा सफर ही पूरा किया था कि वह कहने लगा कि आपका 10 मिनट का तय सफर पूरा हो गया है। अगर पूरी झील घूमना चाहते हो तो कुछ और देना होना। उसने 100 रुपए की मांग की और मैं सहर्ष तैयार हो गया क्योंकि छोटे नाती को नाव की यात्रा करने में विशेष आनंद आ रहा था। 

तब बचपन में पढ़ाए जाने वाले निबंध, चांदनी रात में नौका विहार की याद आ गई। खास बात यह रही कि हर नाव में यात्रियों की संख्या के अनुसार थर्मोकोल से बनी लाइफ जैकेट तो रखी थीं। मगर एक भी जैकेट के क्लिप या बटन काम नहीं कर रहे थे। अगर दुर्भाग्य से कुछ हो जाता तो जीवन रक्षक लाइफ बेल्ट नाकाम रहती। किसी तरह भगवान का नाम लेते हुए नाव की यात्रा पूरी की। बाहर निकलकर आइसक्रीम व भुट्टा खाया। 

पैसा ऐसी भाषा है जोकि किसी भी नए अहिंदी प्रदेश में बातचीत की समस्या पैदा नहीं होने देती। आप सामान पर हाथ रखिए व विक्रेता आपको व अंग्रेजी भाषा में उसका दाम बता देता है। यरकौड प्राकृतिक संपदा से संपन्न एक पर्वतीय इलाका है। यहां बड़ी तादाद में कॉफी, चाय, सेब, इलायची, काली मिर्च की खेती होती है। यहां शेवरायन भगवान का एक काफी पुराना मंदिर व एक पत्थर की कुर्सी भी है जिसे रानी की कुर्सी कहा जाता है। यह झील 1515 से यहां स्थित है व उसे संवारने वहां के तत्कालीन अंग्रेज कलक्टर डेविड काकबार्ड की अहम भूमिका रही थी। जहां हमें आज के दिन बढि़या सड़कों वाले रास्ते से पहुंचने में दो घंटे लग गए। वहां इस बात की आसानी से कल्पना की जा सकती है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले वहां अंग्रेज व दूसरे यूरोपीय जंगलो से होते हुए कैसे पहुंचे होंगे? 

यहां जर्मन और दूसरे देशों के लोग भी आए। डेविड ने तो यहां कॉफी, संतरो, सेबो की खेती तक शुरू करवाई थी। वे उनके पौधे सुदूर अफ्रीका तक से लाए थे। जब 1857 में गदर हुआ तो अंग्रेजो ने अपने बचाव के लिए ठिकाने बनवा कर वहां तोंपे व बंदूके स्थापित की थी, मगर संयोग से कोई दुर्घटना नहीं हुई। बताते है कि प्राचीन काल में सेलम बहुत समृद्ध था व उसका रोम तक से व्यापार होता था। आज यहां स्टील के अलावा देश का सबसे ज्यादा स्टार्च बनाया जाता है। हमारे रास्ते में स्टार्च बनाने वाले कासावा के पौधों की जड़े भी बिकती देखी। जिन्हें लोग शकरकदी की तरह से छील कर खाते हैं। 

ठंडा होने के कारण ईसाई मिशनरी यरकौड आई और यहां चर्च आदि बनवाए। तमिलनाडु जैसे गरम राज्य में यरकौड जैसा ठंडा व मनोहर हरा भरा पर्वतीय इलाका देखकर मन को सुख मिलता है। हालांकि यहां बने रिसाई से नीचे काफी दूर स्थित मोहूर बांध की सूखी हुई जमीन को देखकर दुख होता है।

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