• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 02 August, 2019 05:38 AM | Total Read Count 323
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लंबी छुट्टी और मुंबई का सफर

मैंने लिखने से काफी लंबी छुट्टी मार ली। हुआ यह कि पिछले महीने मुंबई से फोन आया कि मेरी सबसे बड़ी बहन अस्पताल में भर्ती है। वे हम पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी है। डाक्टर ने उनको पेट का आपरेशन करने की सलाह दी थी जो कि तुरंत होना था। अतः चिंतित हो जाना स्वाभाविक था। तुरंत दूसरी बहन के बच्चों के जरिए अपना टिकट करवाया और मैं, पत्नी व बहन मुंबई के लिए रवाना हो गए। हवाई यात्रा करने का एकमात्र लाभ यह होता है कि आपको टिकट तुरंत मिल जाता है मगर हवाई कंपनी की शर्तों पर। 

यह तय किया कि हवाई अड्डे पर कम-से-कम औपचारिकता का पालन करना पड़े। इस तरह बच्चों के जरिए जाने के पहले ही आनलाइन चैक-इन करवा लिया था। पता चला कि घर बैठे चैक इन करवाने के लिए वे अतिरिक्त शुल्क लेते हैं जोकि 150 रुपए प्रति टिकट होता है व खिड़की वाली सीट सबसे महंगी होती है। यह देखकर एक पुरानी घटना याद आ गई। एक दफा जब मैं अपने बेटे के कपड़े खरीदने दुकान पर गया तो परिचित दुकानदार से पूछा कि बच्चों के कपड़े इतने महंगे क्यों होते हैं तो उसने कहा कि मां-बाप की मजबूरी के कारण कपड़े बेचने वाले को पता होता है कि बच्चे द्वारा कपड़ा पसंद आ जाने पर उसे आप जरूर खरीदेंगे। इसलिए वे लोग मां-बाप की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। 

यही बात मुझे हवाई यात्रा के दौरान नजर आई कि किस तरह से कंपनी यात्री की मजबूरी का लाभ उठाती है। वह हर सुविधा की कीमत वसूलती है। हालांकि समय से काफी पहले ही हवाई अड्डे पर पहुंच गया और सामान देने के लिए पुनः उसी लाइन में लगना पड़ा जिसमें न लगने के लिए पैसे चुकाए थे। खैर बकरे की मां कहा तक व कब तक खैर मनाती अतः सिक्योरिटी की जांच करवाने के लिए लाइन में लग गए। 

उन दिनों मुंबई में जबरदस्त बारिश हो रही थी। अतः अपने विमान के इंतजार में लगातार मन में यही प्रार्थना करता रहा कि फ्लाइट रद्द या लेट न हो जाए। खैर विमान समय से रवाना हुआ और जब ट्राली लेकर एयर होस्टेज चाय व खाने-पीने का सामान बेचने आई तो पुरानी यादें ताजी हो गई। बचपन में हम लोग रेल से यात्रा किया करते थे। तब रेल यात्रा बहुत बड़ी चीज व उत्सव की तरह मानी जाती थी। हम लोग घर से खाने में पूडि़या, आलू की सब्जी व आचार बना कर ले जाते थे। खाना खोलते ही पूरे डिब्बे में सब्जी व आचार की खुशबू फैल जाती थी जोकि मुझे आज तक याद आती है। 

यात्रा के दौरान उस खाने का मजा ही अलग होता था। अब लोग घर का खाना साथ लेकर बहुत कम यात्रा करते हैं व ज्यादातर इकोनॉमी किराए वाली हवाई कंपनियों ने टिकट सस्ते रखने के कारण यात्रियों का खाना-पीना देना बंद कर दिया है। उसकी जगह एयर होस्टेस ट्राली में सामान बेचने के लिए आती है। इनमें ज्यादातर सैंडविच, नूडल्स आदि खाने को मिलते हैं। मेरा अनुभव रहा है कि सैंडविच मजबूरी में ही खाए जा सकते हैं क्योंकि करीब 24 घंटे तैयार किए गए इन सैंडविच की ब्रेड सुखकर भुरभुरी हो चुकी होती है। उन्हें खाकर पेट तो भरा जा सकता है मगर खाने का आनंद नहीं लिया जा सकता है। ले-देकर चाय ही थोड़ी ठीक होती है। 

और विमान में चाय पीते समय बचपन में की जाने वाली यात्राओं की याद हो आई। तब हम लोग स्वच्छता व आर्थिक कारणों से प्लेटफॉर्म पर बिकने वाला खाने पीने का सामान नहीं खरीदते थे। तभी लगा कि हमारी जीवन शैली में कितना अंतर आ चुका है। अब जब आप को अचानक कहीं भी बड़ी जल्दी पहुंचना हो तो और क्या विकल्प रह जाता है। 

खैर मुंबई पहुंचे व बहन के घर पहुंचे। जहां वे अपनी बड़ी बेटी के साथ रहती है। शाम को देखने के लिए उसे अस्पताल जाना था। वे कोकिलाबेन धीरू भाई अंबानी अस्पताल में भर्ती थी। इस अस्पताल को लेकर मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे कि पता नहीं यह कितना भव्य होगा। वहां जाकर देखा तो पाया कि वह दिल्ली के मैक्स सरीखे अस्पतालों की तुलना में उन्नीस ही था। हां ओपीडी तक जाने के लिए हमें लाइन में खड़े होकर करीब 10 मिनट का इंतजार करना पड़ा। यह सब शायद हमारे देश की बढ़ती आबादी का असर है। मेरा अपना अनुमान यह है कि देश में बड़ी तादाद में चिकित्सा के क्षेत्र में निजी लोगों (धन पशुओं) के आ जाने के कारण आप समय रहते अपना ईलाज तो करवा सकते हैँ मगर मोटी फीस अदा करने के बावजूद आपको सरकारी अस्पतालों की तरह डाक्टर को दिखाने के लिए इंतजार करना पड़ता है। हालांकि सफाई, रेस्तरां, टीवी व पत्र-पत्रिकाओं के कारण इंतजार करना जरूर खलता नहीं है। बहन से मिलकर वापस घर लौटा। 

डाक्टर ने कुछ दिनों बाद अगले आपरेशन के लिए फैसला करने की बात कही थी क्योंकि उनकी उम्र करीब 75 साल थी। 2-3 दिनों में डाक्टर ने उनकी छुट्टी करते हुए अगले कुछ समय तक घर पर ही आराम करने की सलाह देते हुए छुट्टी कर दी। और हम लोग डाक्टर व हनुमानजी के सहारे उन्हें छोड़कर दिल्ली वापस आ गए। आने पर फोन पर पता चला कि बेंगलुरू में रहने वाली बेटी ने हम लोगों के टिकट वहां आने के लिए बुक करवा दिए है और तुरंत रवाना होना है।  

 

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