• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 05 August, 2019 06:40 AM | Total Read Count 260
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रिटायरी के कुछ दिन नाती के संग

मुझे दिल्ली वापस लौटते ही फौरन बेंगलुरू जाने का फैसला लेना पडा। वैसे असल बात थी कि विधि व दामाद की तुलना मे वहां जाने की इच्छा के पीछे नाती कैवी की याद सता रही थी जोकि हम लोगों से फोन पर लगातार यहां आने के लिए यह तक कह चुका था कि अगर अब भी आप लोग नहीं आए तो मैं कभी दिल्ली नहीं आऊंगा। सच कहूं तो किसी ने सच ही कहा है कि मूल की तुलना में सूद ज्यादा प्यारा होता है। बेटी की तुलना में नाती के प्रति कहीं ज्यादा प्यार आ रहा था। 

अतः दिल्ली से बेंगलुरू आते समय खाने के लिए कुछ नमकीन व मक्खन स्लाइस भी रख लिए। विमान में मिलने वाली मसाला चाय काफी अच्छी लगती है। सच कहूं तो चाय की तुलना में उसका कागज का ग्लास कहीं ज्यादा सुंदर होता है। मगर 100 रुपए में चाय बुरी नहीं है क्योंकि मैं चाय के बिना रह नहीं सकता व उसे हासिल करने का कोई और विकल्प भी नहीं होता है। 

खैर देर रात हम लोग बेंगलुरू पहुंच गए वहां बेटी परिवार सहित हमें लेने आई थी। जितना समय दिल्ली से बेंगलुरू जाने में लगता है लगभग उतना ही समय हवाई अड्डे से उसके घर तक जाने में लगता है जोकि वहां कि नई विकसित इलेक्ट्रानिक सिटी में है। 

यह इलाका हरियाणा के गुड़गांव जैसा है जिसे कि भारत की सिलिकॉन वैली के नाम से भी जाना जाता है। एक तरफ बहुमंजली इमारते हैं तो उनके सामने छोटे मकान है जिनमें दुकाने आदि चल रही है। कुल मिलाकर यह गुड़गांव का ही विस्तार लगता है मगर वहां के मुकाबले यहां गदंगी कम हैं। घर जाते ही नाती ने मांग रख दी अब हम दोनों लोगों को उसे बस तक छोड़ने व स्कूल के वापस आते समय बस तक लेने जाना पड़ेगा। 

सच कहूं तो इसमें जो सुख मिलता है उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है। जब उसे स्कूल छोड़ने के लिए बस तक गया तो वहां बड़ी तादाद में बच्चों के मां-बाप, दादा-दादी आदि आए हुए थे। तब लगा कि मैं भी काफी बुजुर्ग हो गया हूं। अपने बच्चों को खुद स्कूल छोड़ने जाता था। अतः उन्हें बसों में भेजने का कोई अनुभव नहीं था। असल में हुआ यह था जब पहली बार बेटा बस स्कूल गया और उसे छोड़ने वाली बस समय से पहले आने के कारण मेरे वहां न होने के कारण उसे लेकर वापस चली गई तो मैं बहुत परेशान हुआ व दोबारा उसे लेने के लिए स्कूल गया। 

तब तो सेलफोन भी नहीं होते थे। बेटी को तो पहले से ही स्कूल छोड़ने जाता था। घर आकर बेटे व पड़ोस में रहने वाली उसकी दोस्त की मां ने उसके लिए प्रोजेक्ट बनाने को कहा। जब बच्चे छोटे थे तभी से उनको स्कूल द्वारा दिए जाने वाले प्रोजेक्ट मैं बनाता आया हूं। मुझे ऐसा करना अच्छा लगता है मगर मेरी समझ में यह नहीं आया कि यह होमवर्क देने वाली अध्यापिकाएं यह जानते हुए भी कि अंततः यह कर पाना उनके बस का काम नहीं है, उनके मां-बाप के लिए होमवर्क क्यों देते हैं? पता चला कि अब तो प्रोजेकट तैयार करने वाली दुकाने तक खुल गई हे।

वैसे बेंगलुरू का मौसम काफी अच्छा है। सुबह शाम पार्क के चारो और चक्कर लगाता हूं। कहां दिल्ली की उमस भरी गर्मी का सामना करना पड़ता है जबकि यहां नवंबर-दिसंबर सरीखा मौसम है। हवा इतनी तेज चलती है कि बता ही नहीं सकता। उसका प्रोजेक्ट बनाने के लिए पड़ोस की दुकान में तीन बार थर्मोकोल शीट खरीद कर लाया व तमाम कोशिशों के बावजूद तेज हवा के कारण वह तीनों बार टूट गई। खैर किसी तरह प्रोजेकट तैयार किया। 

इस बहुमंजली इमारत में देश के विभिन्न हिस्सो से आए लोग रहते हैं जोकि छोटे भारत जैसी लगती है। वैसे दिल्ली की तुलना में यहां बिल्डरो द्वारा तैयार की गई इमारते काफी अच्छी व तुलनात्मक सस्ती है व उनके रख-रखाव की भी अच्छी व्यवस्था है। बिजली की कटौती नहीं होती है। यहां यह बता दूं कि बेंगलुरू देश का पहला ऐसा शहर था जहां कि सबसे पहले बिजली आई थी। दिल्ली की तुलना में यहां दूध सस्ता है। कन्नड़ भाषा न आने के बावजूद केवल गाडि़यो की नंबर प्लेटों से पता चलता है कि मैं दक्षिण भारत में हूं। 

वैसे भाषा की कोई समस्या नहीं है क्योंकि आमतौर पर कन्नड़ भाषी होने के बावजूद लोग हिंदी समझते है व काम करने वाली उड़ीसा आदि की है। बेंगलुरू का न सिर्फ मौसम बहुत अच्छा है बल्कि यहां उत्तर भारतीय खाना भी बहुत अच्छा मिलता है। यहां की जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यो से आने वाले युवा इंनफर्मेशन टेक्नॉलाजी के इंजीनियर है। अहम बात यह है कि देश के पांचवें सबसे बड़े शहर में स्कूलों में बच्चो का दाखिला काफी आसानी से हो जाता है। यहां डीपीएस, एसएम गदर सरीखे निजी क्षेत्र के अच्छे स्कूलों में जुलाई माह में सोसायटी में शिविर लगाकर बच्चों के दाखिले किए जाते हैं। वे सारा भुगतान चैक से लेते हैं व दिल्ली की तरह दाखिले के लिए बड़ी मात्रा में दान राशि देने या दो नंबर में भुगतान करने के साथ-साथ किसी से फोन नहीं करवाना पड़ता है। 

यही हालात यहां बनने वाले बहुमंजिले मकानों के भी है। नाती का प्रोजेक्ट बनाने के लिए मकान की कुछ तस्वीरो की जरूरत थी। अतः ब्रोशर लेने के लिए पड़ोस के एक बिल्डर के दफ्तर गया। बातचीत के दौरान वहां की एक कर्मचारी ने बताया कि यहां सारा भुगतान एक नंबर में चैक से करना पड़ता है व रजिस्ट्रेशन आदि करवाने के लिए किसी तरह की रिश्वत नहीं देनी पड़ती है। यहां बिल्डरो द्वारा लोगों को परेशान किए जाने के मामले भी न के बराबर है। यहां आकर लगा कि अब मैं रिटायर हो चुका हूं। बच्चे को स्कूल जाने के लिए छोड़ना व लेने जाना व सारे दिन खाली होने पर प्रोजेक्ट बनाकर समय बिताना व दिन में सोना इसकी पुष्टि करते हैं। वैसे भी जब हम बुजुर्ग हो जाते हैँ तो हम अपना समय कब व कैसे बिताएंगे यह बच्चे तय करते हैं। हमारा समय उनके लिए खाली होता है।

 

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