• [WRITTEN BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 12 September, 2019 06:51 AM | Total Read Count 221
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प्लास्टिक से पानी होगी मुक्त

बचपन में जब मैंने पहली बार कप वाली आइसक्रीम प्लास्टिक के छोटे चम्मच के साथ खाई तो मुझे अच्छा लगा। गुलाबी रंग की चमच्चे इतनी अच्छी लगी कि मैं चुपके से उन्हें रूमाल से साफ करके अपनी जेब में रख लेता और घर आने पर उन्हें धोकर अपनी मां को देते हुए कहता कि इन्हें मसालेदानी में डाल दीजिए। इनसे नमक, मिर्च आदि निकालने में सहूलियत होगी। यह वह समय था जबकि हमारे जीवन में प्लास्टिक का उपयोग शुरू ही हुआ था और वह एक बेहद अहम चीज मानी जाती थी। 

प्लास्टिक का तमाम सामान जिनमें बाल्टी, चाय छानने वाली छननी आदि होती थी, मुंबई से आती थी। प्लास्टिक को बहुत उपयोगी वस्तु माना जाता था। देखते-ही-देखते प्लास्टिक के बर्तन, रस्सी व चप्पले आदि बनने लगी। प्लास्टिक ने 45 डिग्री गर्मी तक की गर्मी में गरीब लोगों के झुलसे पैरो को चप्पले पहना दी। फिर इसका उपयोग सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवाओं की बोतले तक तैयार करने में किया जाने लगा। 

फिर प्लास्टिक का उपयोग उसके बने थैलो में सामान लाने, ले जाने व खाद्य पदार्थ व दूसरा सामान पैक करने के लिए किया जाने लगा। देखते ही देखते प्लास्टिक की कुर्सी, स्टूल, पटे तक इस्तेमाल में आ गए व कैलकुलेटर से लेकर एसी व कंप्यूटर तक का निर्माण इसकी मदद से किया जाने लगा। मुझे याद है कि जब में बच्चा था तब प्लास्टिक एक दम नई चीज थी और उसकी जगह प्लास्टिक सरीखी नरम 'गटापारचा के खिलौने बनते थे जोकि बहुत कुछ रबड़ सरीखे हुआ करते थे।

मैंने तब कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन प्लास्टिक का इतना ज्यादा उपयोग होने लगेगा कि वह इसी दुनिया के लिए कई तरह समस्याएं पैदा कर देगा। आज भारत समेत पूरी दुनिया इसके बढ़ते इस्तेमाल के कारण परेशान है। इसके कारण बहुत बड़े पैमाने पर प्रदूषण भी फैल रहा है। हाल ही में कनाड़ा जाने पर वहां के मछलीघर में एक विशाल हाल में यह दिखाया गया था कि प्लास्टिक के कारण किस तरह से हमारा समुद्री जीवन नष्ट हो रहा है। उसमें हजारो टन प्लास्टिक की खाली बोतलें, जाल रस्सियां आदि को भी जा रही है। 

कपड़ों की धुलाई के कारण उनका पालीमर के साथ धुलकर पानी में जा रहा है जोकि समुद्री प्राणी के पेट में पहुंच कर उनका जीवन बर्बाद कर रहा हैं। हालात कितने खराब हो सकते है, इसका अंदाजा हाल में नोएडा में आयोजित कॉप-14 सम्मेलन में जताई गई चिंता से लगाया जा सकता है। मरूस्थलीकरण की समस्या से निपटने के लिए भारत में इसका आयोजन सयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किया गया था जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहते पाया गया कि अगर महज एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक का प्रयोग नहीं रोका गया तो भूमि का शरण तेजी से होगा व जमीन की उत्पादकता को पुनः हासिल कर पाना मुश्किल हो जाएगा।

बचपन में हम लोग प्लास्टिक के कैरी बैग या पैकेट में नही बल्कि पुराने वस्त्रों से तैयार किए गए झोलों से सब्जी व घर का दूसरा सामान लेकर आते थे। मगर धीरे-धीर हम पालीपैक से सामान लाने लगे। पान-पराग से लेकर सब्जियां, दूध आदि सब कुछ उनमें पैक करके बेचा जाने लगा। आज यह दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहा है। आज समुद्र में 269000 टन प्लास्टिक कूड़ा है। 

प्लास्टिक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह लाखों साल तक नष्ट नहीं होता है। एक और हम पर्यावरण को बचाने के लिए पौधे लगा रहे हैं तो दूसरी और उनकी पौध प्लास्टिक के थैलो में ही तैयार कर रहे हैं। पिछले साल मैंने अपनी सोसायटी के तमाम सारे बड़े पौधे लगवाये थे। इस साल जब उनमें से कुछ के न बढ़ने पर माली से उन्हें खोदकर निकालने को कहा तो पाया कि माली ने उन पौधों की उनकी प्लास्टिक का खोल फाडे बिना ही लगा दिया था जिस कारण उनकी जड़े जमीन तक नहीं पहुंच पाई थी। पता चला कि किस तरह से प्लास्टिक पर्यावरण को बर्बाद कर रहा था। 

हाल ही में एक सांड के पेट से 20 किलो प्लास्टिक की थैली निकाले जाने की खबर आई। हमारी मां कहीं जाने वाली गाय गदंगी में मुंह मारते हुए प्लास्टिक के थैलो को खाती रहती है जोकि उनके पेट में जमा होकर जान लेवा बन जाता है। कभी नष्ट न होने वाले प्लास्टिक के इस्तेमाल के कारण पूरी दुनिया परेशान है। यह सीवर लाइन तक को जाम कर देता है। जरा नजर डाले तो पता चलेगा कि दूध के पैकेट से लेकर पानी की बोतल व शीतल पेय तक इन्हीं प्लास्टिक की बोतलों में मिल रहा है। जिन्हें हम इस्तेमाल के बाद यूं ही फेंक देते हैं। 

सरकार दोबारा इस्तेमाल न किए जा सकने वाले प्लास्टिक के कारण काफी परेशान है। वह तो भलॉ हो हमारे देश में गरीबी का जिसके कारण बड़ी संख्या में गरीब लोग कूड़े से पुराने प्लास्टिक को बटोर कर उसे पुनः इस्तेमाल किए जाने के लिए बेच देते हैं ताकि अपना पेट भर सके। जरा कल्पना कीजिए कि अगर यह गरीबी न होती तो प्लास्टिक द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण का क्या हाल होता।

 

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