• [WRITTEN BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 07 September, 2019 07:11 AM | Total Read Count 320
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कश्मीर और हांगकांगः मसला एक सा नहीं!
दुनिया फिलहाल हांगकांग और कश्मीर पर फोकस बनाए हुए है। इन दोनों के विवाद में जकड़ी हुई है। दोनों ही मुद्दों का अपनी-अपनी जगह अलग-सा परिदृश्य है। लेकिन दुनिया की नजर में इन्हें एक सी नजर से देख रही है। एक-सा माना जा रहा है जबकि ऐसा है नहीं। कश्मीर अलग प्रकृति का विवाद है तो हांगकांग में चल रहा लोकतांत्रिक आंदोलन अलग तरह का। मगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया दोनों को एक-दूसरे से जोड़ कर देख रहा है क्योंकि इन दोनों जगहों पर ‘अधिनायकवाद’ अल्पसंख्यकों को कुचलता लग रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ऐसी हवा बना दी है (ध्यान रहे कि इसमें जम्मू का कहीं जिक्र नहीं आता।) जिससे दुनियाभर में लोगों को लग रहा है कि कश्मीर और हांगकांग में लोग अपने अधिकारों के लिए दमनकारी केंद्रीय सरकारों के खिलाफ लड़ रहे हैं। जैसा कि पीटर ऑसबोर्न ने लिख डाला कि चीन और भारत एक जैसे डरवाने घटनाक्रम के रास्ते, घटनाओं को अंजाम देते लगते है। (स्पेक्टेटर पत्रिका 17 अगस्त 2019) मतलब इतिहास को तोड़ मरोड़ कर, उलझाने वाले नैरेटिव में असली मुद्दों को अनदेखा करते हुए कश्मीर और हांगकांग दोनों को एक साथ एक वाक्य में बांध देना। 
 
इस तरह बहुत ही बेतुका भ्रम पैदा करने वाली, हांगकांग के हालात की सीधे-सीधे कश्मीर के हालात से तुलनीय बनाया जा रहा है।        
 
भ्रम बनवाने का पहला बिंदु, शब्द है ‘स्वायत्तता’।
 
कश्मीर पर स्वायत्तता शब्द का ठप्पा द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के बाद की देन है, जिसे की हांगकांग की स्वायत्तता के आदेश के साथ रख कर भ्रम बनाया जा रहा है। हांगकांग की स्वायत्तता, इसका आदेश,  ‘एक देश दो शासन प्रणाली’ के वैधानिक-मान्य व्यवस्था से है। इसके तहत हांगकांग की अपनी स्वतंत्र विधि व्यवस्था है और अपनी क्षेत्रिय सीमाएं हैं। इसमें अभिव्यक्ति की आजादी, इकठ्ठा होने की स्वतंत्रता आदि सब मिली हुई है (जबकि अधिनायकवादी चीन में यह नहीं है।) हांगकांग के इस विशेष स्वरूप की तुलना कश्मीर के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद- 370 के प्रावधानों से हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि, ये तथ्य है कि हांगकांग ब्रिटेन से ट्रांसफर होने के साथ अपनी करेंसी, अपना पासपोर्ट, अपनी व्यापार व्यवस्था लिए हुए था जिसे चीन ने जस का तस स्वीकार किया था जबकि कश्मीर का विलय भारत के अभिन्न अंग के नाते, भारत की व्यवस्था के बतौर हिस्से में था। कश्मीर के नागरिक मतलब भारत के नागरिक, भारत का पासपोर्ट और व तमाम अधिका अवाम को जो लोकतांत्रिक भारत में एक भारतीय को प्राप्त है। अनुच्छेद-370 क्षेत्र विशेष के लिए भारत के संविधान का हिस्सा, उसकी अनुकंपा से है न कि हांगकांग की मूल प्रकृति के अधिकार की तरह। 
 
यह भी भ्रम वाली फालतू बात है जो जम्मू-कश्मीर में किसी भी बाहरी व्यक्ति को संपत्ति खरीदने से रोकने वाली धारा 35 ए को हांगकांग की पहचान के साथ रख कर बताया जा रहा है। जबकि हांगकांग की पहचान  उसकी आर्थिक खुशहाली से है और बाहरी लोगों के निवेश, नागरिकता आदि सबसे है। 
 
दूसरी बात इन दोनों में जो असल मुद्दे है उनकी घोर अनदेखी है।  
 
दोनो को एक चश्मे से देखने वाले भूल जाते हैं कि हांगकांग में विवाद की प्रकृति मूल रूप से कानूनी है, न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर है। लोकतंत्र के लिए हांगकांग की मांग लोगों के बीच से उठी हुई है। वहां के लोगों का डर है कि यदि प्रत्यर्पण कानून बन गया तो चीन की कम्युनिस्ट सत्ता उन्हें अपने अनुसार हांकेगी और कहीं का नहीं रहने देगी। जबकि कश्मीर की स्थिति ऐसी नहीं है। कश्मीर का मुद्दा धार्मिक कट्टरता से पनपा हुआ हैं। ‘मुद्दे की प्रकृति धार्मिक है इसलिए यह कहना कि कश्मीरियों की क्षेत्रीय पहचान उनके लिए अभिशाप बन गई है, बिल्कुल गलत है।‘(एमी हाकिंस, फॉरेन पॉलिसी)  जब से कश्मीर है तभी से उसकी पहचान हिंदू और मुसलमानों के साथ रहते आने की है, ठीक वैसे ही जैसे कि भारत के दूसरे हिस्सों में है। यह तो सिर्फ 1990 के दशक में फैले उग्रवाद के बाद हुआ जब कश्मीर घाटी से हिंदुओं को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। सिर्फ इस तीस साल में ही कश्मीर मुस्लिम-बहुल राज्य बना, और यह पहचान एक खौफ और आतंक के कारण बनी है जिसे पूरी तरह से पाकिस्तान ने बनवाई और प्रायोजित की।
 
यदि हांगकांग के लोग आज अपनी अलग पहचान के लिए आंदोलन कर रहे हैं तो वे इसलिए कि ब्रिटेन के डेढ़ सौ साल के गुलामी वाले शासन ने उनकी अलग पहचान बना डाली थी, ऐसी पहचान जो चीनियों से नहीं नहीं मिलती, भाषा से लेकर परंपराओं तक में। दूसरी ओर कश्मीर की जड़ें तो पूरी तरह से भारत की सभ्यता में ही हैं। यहां तक कि जब यह इलाका ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना था तब भी वहां हिंदू और बौद्ध वंशों का राज रहा, उसके बाद वहां मुसलिम शासक आए। दक्षिण कश्मीर में मार्तंड मंदिर से लेकर पाक अधिकृत कश्मीर में शारदा पीठ तक है और इस तरह कश्मीर हमेशा से ही भारत का अटूट सांस्कृतिक-भौगोलिक हिस्सा रहा है।
 
तीसरा बड़ा फर्क अलगाववाद और आतंकवाद से है। इसकी भी एक चश्मे से दोनों मसलों को देखने वाले पूरी तरह से अनदेखी किए हुए है।
 
कश्मीर में आतंकवाद बहुत ही आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ा और फिर यह वहां के जनमानस में अलगाववाद की भावना को पनपाता गया जबकि हांगकांग मे ऐसा नहीं रहा, वहां कोई आतंकवाद नहीं है। उलटे, चीन ने प्रदर्शनकारियों को आतंकी कहते हुए उनकी गतिविधियों को गैरकानूनी करार दिया है, जबकि प्रदर्शनकारी न हिंसा पर उतारू हैं, न कानून हाथ में ले रहे हैं। हांगकांग अलग भी नहीं होना चाहता है। दूसरी ओर कश्मीर में स्थानीय नौजवान अलगाववादी और उग्र विचाधारा के रास्ते पर हैं, कानून-व्यवस्था हाथ में लेते हैं, पत्थरबाजी करते हैं। उन्हे प्रायोजित ढ़ग से, ‘आजादी’ के लिए बंदूकें उठाने को सीमा पार से तैयार किया गया है। 
 
कश्मीर में पिछले कई सालों से हुर्रियत जैसे संगठन नौजवानों को उकसा कर हिंसा का रास्ता अपनाने को प्रेरित किए हुए हैं। इसी से कश्मीर समस्या बड़ी और गंभीर हुई है। कश्मीर की आजादी के लिए धारा 370 तो उनके लिए बहाना भर था। पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्तिस्तान जो कश्मीर के अतंर्गत आता है लेकिन पाकिस्तान के नियंत्रण में है, वहा तो आजादी की मांग कभी नहीं उठी। जब 1984 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्तिस्तान से विशेष प्रावधान वाला शासन खत्म किया तब कोई हल्ला नहीं मचा। पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रह रहे लोगों को वहां संपत्ति खरीदने की इजाजत मिल गई थी इससे वहां जनसांख्यिक बदलाव भी हो गया। इसके बाद पिछले साल निकाला गया गिलगित-बाल्तिस्तान आदेश आया और पाकिस्तान ने पूरे क्षेत्र पर अपना शासन लागू कर दिया। 
 
उस आदेश को विवादित क्षेत्र को पाकिस्तान के पांचवे प्रांत के रूप में बनाने की इस्लामाबाद की कोशिश के रूप में दुनिया ने जाना हुआ है। इसी से पाक अधिकृत कश्मीर की जमीन चीन को देने का रास्ता खुला था। ध्यान रहे यह सब तब होता रहा जब पाकिस्तान की गोद में पलने वाले हुर्रियत नेता और उग्रवादी जम्मू-कश्मीर में न सिर्फ आतंक फैला रहे थे बल्कि नौजवान लड़के-लड़कियों के दिमाग में अलगाव की, आजादी की आग पैदा कर रहे थे। तब अंतरराष्ट्रीय मीडिया, नेता और समुदाय ने इन बातों की तरफ से आंखें मूंदे रखी। तभी दलील है कि यदि पाक अधिकृत कश्मीर गिलगित-बाल्तिस्तान को पाकिस्तान का ‘अंदरूनी’ मामला माना गया, उनकी आजादी ताक पर तो फिर जम्मू-कश्मीर को लेकर इतनी आवाज क्यों उठाई जा रही है?
 
सवाल है कि हांगकांग और जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को एक साथ रख कर देखना क्या उचित है? अगर मानवीय आधार पर देखें तो कहेंगे हां। कश्मीर में एक महीने से जो घरों को कैदखाने में बदल दिए जाने से जो हालात बने हुए हैं, वह गलत है। साथ ही, हांगकांग में प्रदर्शनकारियों पर जिस बर्बरता के साथ लाठी-गोली बरसाई जा रही है और आंसू गैस छोड़ी जा रही है वह भी गलत है। लेकिन इससे भारत और चीन की स्थिति एक-सी नहीं बन जाती है। भारत सरकार ने संचार सुविधाओं पर जो पाबंदी लगाई है, स्थानीय कश्मीरी नेताओं को हिरासत में ले रखा है और पूरी घाटी में फौज तैनात की हुई है तो वह भडकाएं जाने की कोशिशों को रोकने का एक अल्पकालीन बंदोबस्त है। इसमें आम कश्मीरी नागरिक की सुरक्षा भी जुड़ी हुआ है। पाकिस्तान जिस तरह से लगातार ‘धार्मिक’ भावनाएं भड़का रहा है और कश्मीर घाटी में अलगाववादी, अपनी मनमानी का जैसा ट्रैक रिकार्ड लिए हुए है उसमें सरकार की पाबंदियों एहितियाती और कुछ दिनों की मानी जा सकती है।

इसलिए कश्मीर और हांगकांग एक जैसी समस्याएं नहीं हैं। भारत और चीन एक जैसे नहीं हैं, और हो भी नहीं सकते हैं। नरेंद्र मोदी का भारत उसी तरह चीन से अलग है जैसे डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका से। मगर बात मानवाधिकार, मानवीय गरिमा और आजादी की भी है तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया एक नजर में, एक चश्में से एक ही तराजू में दोनों समस्याओं को पाठकों के आगे परोस रहा है। इसका असर दुनिया में है। तभी मेरे कुछ विदेशी दोस्तों ने प्रभावित हो (निश्चित ही हांगकांग के मसले पर अधिक कौतुक से) कर जानना चाहा कि चीन जैसे भारत क्या कर रहा है! 

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