• [WRITTEN BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 August, 2019 06:45 AM | Total Read Count 457
  • Tweet
कश्मीर है कोहिनूर और...

‘तुम कश्मीर से नहीं हो इसलिए कभी हमें नहीं समझ पाओगी।’ यह बात मुझे घाटी में बहुत लोग कहते मिले हैं, भले वह हिंदू हो या मुसलमान। मैं इस बात को सुनकर अनिच्छा से चुप तो हो जाती थी लेकिन भीतर यह सवाल उमड़ता रहता था कि आखिर मैं क्यों नहीं समझ सकती कि ये कैसे हालात से गुजरे हैं या गुजर रहे हैं! या ये कैसे खास हैं जो ऐसे सोचते है! मैं जब-जब भी कश्मीर घाटी गई हूं या घाटी के अपने दोस्तों से मिलती हूं या उनसे बात की है तो हमेशा लगा कि वे मुझसे कश्मीर पर बात करने से बच रहे हंै। तब मैं वजह समझने में हार मान उनके आगे दलील देना बदं कर देती थी। चुप रहती थी खासकर तब जरूर जब वे कश्मीर की राजनीति और ‘पहचान’ (जो हिंदू और मुस्लिम ग्रुप अनुसार अलग-अलग तर्क लिए हुए) पर बरस रहे होते थे, बढ़ी-बढ़ी बाते कर रहे होते थे।  

घाटी के हिंदू और पंडित इसलिए गुस्सा लिए होते है क्योंकि नब्बे के दशक में जब उनके साथ अत्याचार हो रहा था तब हम उनके साथ खड़े हुए नहीं थे। लद्दाखी गुस्से और शिकायत करते हुए इसलिए हैं क्योंकि उन्हें जम्मू-कश्मीर से जोड़ कर रखा गया। उनकी पहचान पर वे संकट बनने दिए जिसे बाहर का आदमी नहीं समझ सकता। मुसलमान का जहां सवाल है वह अपने को यह कहते हुए अलग बता देता है कि तुम ‘इंडियन’! तभी मैं कश्मीर घाटी में तब हैरानी, पीड़ा और गुस्से से गुजरी हूं जब घाटी में लोग ऊंगली उठा कर, या भाव-भंगिमा से अहसास कराने से चूकते नहीं कि मैं ‘एक भारतीय’ हूं! 

मतलब जम्मू-कश्मीर से बाहर के, शेष भारत से मैं हूं तो उनकी भावनाओं से कटी हुई। वे नहीं मानंेगे कि मैं उन्हे समझ सकती हूं। या तो उनकी बाते सुनते रहो, उनको खास माने रहे और उन्ही के बोलने, गरजने, बरसने और बातों पर विश्वास करते जाएं! 

तभी सोचती हूं यह सब क्या सात दशकों से चले आए अनुच्छेद 370 से तो नहीं है? अनुच्छेद 370 ही वह जड़, वह बेरियर. वह मनोविज्ञान है जिससे बार-बार झिड़की मिलती है कि तुम लोग नहीं समझ सकते। इस अनुच्छेद ने जम्मू-कश्मीर को शेष देश से और खुद जम्मू-कश्मीर को अलग-अलग अंचलों, ग्रुपो में बांटा है।  लद्दाखी अपने को कश्मीरी बताने से बचते है तो कश्मीरी मुसलमान अपने को भारत से नहीं जोड़ते। जम्मू के हिंदू का घाटी से, वहा के मुसलमानों से अलग व्यवहार बना रहता है। उधर हम-आप जम्मू- कश्मीर के लिए, कश्मीरियों की भावनाओं में बाहरी-बेगाने हैं। अपने ही देश में ‘बाहरी!’

मसला भावनाओं में दूरी, दरारों का है जिसको सात दशकों से अनुच्छेद-370 ने लगातार हवा दी है। जिससे वह दुराग्रह और हिंसा फैली जिससे न केवल प्रदेश बरबाद हुआ बल्कि शेष भारत में यह सवाल फैलता गया कि धर्म के आधार पर ऐसे कैसे दूरी याकि विशेषाधिकार बनने दिये जा सकते हैं। 

हफ्ते के शुरुआती तीन दिनों में संसद के दोनों सदनों में जम्मू-कश्मीर को ले कर बहुत सुना और समझा। कई सांसदों ने अपनी राजनीतिक विचारधारा से परे जाकर सरकार के कदम का समर्थन किया, जबकि कइयों ने असहमति जताई। असहमति में बुनियादी चिंता यह है कि कश्मीरियों की भावनाओं पर क्या गुजर रही होगी? पर भावना किसकी? भावना पर ही विचार होना है तो क्या सभी भावनाओं पर सम भाव कसौटी नहीं हो? क्या कभी उन भावनाओं को समझने की कोशिश की थी जो लद्दाख के सांसद जामयांग त्सेरिंग नामग्याल के भाषण में व्यक्त हुईं? क्या कभी किसी राजनीतिक दल या सांसद या नागरिक समाज (जिसमें हम पत्रकार भी शामिल हैं) ने यह जानने-समझने की कोशिश भी कि आखिर वहा के बौद्ध किस हालत से गुजर रहे हैं और क्या चाहते हैं? हमने लद्दाख की भावनाओं का खयाल ही नहीं किया और उसे एक कोने में पटके रहे।

तभी भावना की दलील पक्षधरता लिए हुए है। संसद की बहस में जिनकी आलोचना थी उनकी भावना में एक तो उनके (हमारे भी) दिल-दिमाग में पैठी यह बात है कि एक हिंदू-बहुल राष्ट्र होने के नाते मुसलमानों का मान-सम्मान संभव नहीं है। उनके साथ ज्यादती है। उनका विशेष ध्यान होना चाहिए। भला क्यों? अनुच्छेद-370 के बिना भी कश्मीर का मुसलमान वही समान अवसर लिए हुए है जो शेष भारत में हर जगह, हर मुसलमान को प्राप्त है।  जब राजस्थान, उत्तर प्रदेश या हैदराबाद के मुसलमानों का हिंदू की तरह ही जीना है तो कश्मीरी मुसलमान अपने खास होने या विशेष दर्जे की जिद्द लिए हुए हो तो यह भला कैसे वाजिब? 

मौटे तौर पर अनुच्छेद 370 एक हिपोक्रेसी थी जिसे निर्ममता से गृहमंत्री अमित शाह ने झटके में खत्म किया है। अमित शाह की बहादुरी इसलिए काबिले तारीफ है क्योंकि उन्होने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के वक्त से वहा लोगों की भावनाओं की चिंता, लोगों को विश्वास में लेने के प्रपंच, हिपोक्रेसी को मिटाने में रत्ती भर दुविधा नहीं दिखाई। उनकी दलील में ‘इन्क्लूसिव’ शब्द को लेकर जो निश्चय दिखा वह यह बतलाने वाला था कि वे राजनीति के बजाय शेष भारत, जम्मू-कश्मीर के लोगों के मनोविज्ञान को अलग-अलग तरह से साधने का फैसला ले रहे है। 

मेरे पति कश्मीरी हैं और उनका परिवार वहीं रह रहा है। नब्बे के दशक में जब उग्रवाद चरम पर था तब भी वहीं रहा, अभी भी वहीं है। जब मेरे अठहत्तर वर्षीय ससुर साहब को धारा 370 हटने की खबर मिली तो झुर्रियों वाले उनके चेहरे पर बच्चे जैसी मुस्कुराहट आ गई। उस वक्त उन्होंने थोड़ी सी बातचीत में मुझे बताया कि सात दशकों से बेचैनी और उत्पीड़न का जो बोझ चला आ रहा था, वह अब उतर गया है। अब शांति और चैन है। बातचीत में उन्होंने ‘शांति’ शब्द को बार-बार दोहराया। वह एक ऐसा खुशी का क्षण था जिसे हिंदू-मुसलमान से अलग, हर समझदार कश्मीरी महसूस कर रहा था। हां, यह भी सही है कि इस खुशी को जाहिर और महसूस करने में एक तरह की बेचैनी है।

जहा तक धारा 370 खत्म होने के बाद की बात है तो हमारे बुद्धिजीवी, पंडित और राजनेता लगातार इस बारे में लिखते रहेंगे कि गृह मंत्री अमित शाह ने जिस बेशर्मी भरे तरीके से धारा 370 को हटाने की प्रक्रिया अपनाई है, उसके भयावह दुष्परिणाम निकलेंगे। देश गंभीर संकट में पड़ जाएगा। जैसा कि कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने संसद में भाषण शुरू करते हुए कहा- ‘मुझे डर है कि यह कई मायनों में नोटबंदी जैसा ही कदम साबित होगा।’ हो सकता है यह उनका अपना मानना हो और पार्टी का रुख भी, जिसकी वजह से उन्होने ऐसा कहा। लेकिन मौटे पर वे और कई सुधीजन यह समझ नहीं पा रहे है कि धारा 370 खत्म करने से बेमतलब का एक बड़ा बोझ हटा है। राहत और ताकत मिली है। इतिहास का वह क्षण है जब हमें बोझ और पीड़ा से ऊबर कर, अंधेरी सुरंग से बाहर निकलते हुए नई शुरुआत करनी है। संभव है कि आगे देश के लोग और खुद स्थानिय लोग भी कश्मीर की वादियों, उसके भूगोल की खूबसूरती को भारत के कोहिनूर में देखने लगे। कुल मिलाकर जैसा कि मेरी मम्मी कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के असली कोहिनूर हैं, भारत का कोहिनूर है। इस पर जो खतरा था वह बहुत जल्द खत्म हो सकता है बेशर्ते कि सब एक राय से जो हो गया है उसे भूल कर भावनाओं को मिलाने में जुटे।   

 

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

Categories