• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 June, 2019 07:47 AM | Total Read Count 362
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जो हुआ उसके पीछे बारीक पॉपुलिज्म

तेईस मई को नरेंद्र मोदी ने जो इतिहास रचा, वह अकल्पनीय था। ऐसा इतिहास जिसकी गहराई, जिनके घने कारणों को भेदना असंभव सा है। जीत का आंकड़ा इतना बड़ा और ऐसा जबरदस्त है कि हर विश्लेषक और पत्रकार एक यहीं सवाल लिए हुए है कि भला इस जीत को कैसे समझें और कैसे विश्लेषण करें? जीत के बाद छपे संपादकीय पन्नों पर लेखों, फीचर और कवर स्टोरी से समझाने में भी कोर सवाल यहीं रहा कि मोदी-2 की जीत का आखिर क्या राज? ज्यादातर ने उन्हीं पुराने कारणों को दोहराया जिन्हें 2014 में भी मोदी की जीत के वक्त बतलाया गया था। बूझे गए मोटे कारण हैं-  मोदी का करिश्मा, कांग्रेस से लोगों का मोहभंग, राहुल गांधी की पप्पू इमेज और विपक्ष का बिखरा होना। ये कारण बार-बार लगातार विश्लेषणों के केंद्र में है। लेकिन क्या वाकई ये वे कारण हैं, जिनकी वजह से नरेंद्र मोदी को तीन सौ तीन सीटों की भारी जीत मिली? आखिर ऐसा क्या हुआ कि जाति का कार्ड नहीं चला और भाजपा के नए व्याख्याकार कैसे बहुत आत्मविश्वास से अब कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के खत्म होने या उनकी श्रद्वांजलि लिख दे रहे हैं? 

चुनावों के दौरान टाइम पत्रिका में आतिश तासीर ने एक लेख लिखा था। इस लेख से भारत में खलबली मची थी। हालांकि लेख में ऐसा कुछ नहीं था, जिसे लोग पहले नहीं कहते रहे हैं।  लेकिन इसमें एक महत्त्वपूर्ण बिंदु था जिसे अनदेखा किया गया। वह वाक्य था कि -महान लोकतंत्रों में पॉपुलिज्म, लोकलुभावनवाद में रंगा जाने वाला भारत पहले नंबर पर है। यह तासीर के लेख की पहली लाइन थी। इसमें पॉपुलिज्म, लोकलुभावनवाद प्रमुख शब्द और खास बिंदु है। पॉपुलिज्म का हिंदी में सटीक शब्द नहीं है। लोकप्रियतावाद, लोकलुभावनवाद जैसे जुमले वह भाव नहीं बताते हैं जो अंग्रेजी के पॉपुलिज्म में झलकता है। मतलब जादू-मंत्र, टोटको से जनता को बावला बनाना, लुभाना और लोकप्रियता के शिखर का आंदोलन बना लेना हिंदी के किसी शब्द में सटीक नहीं फिट हो रहा है।

बहरहाल, पॉपुलिज्म लेकर भारत मे कभी कोई चर्चा या बहस नहीं हुई, सिवाय तब जब अपने जानकार टीकाकार ब्रेक्जिट या डोनाल्ड ट्रंप पर बात करते हैं तब। हमारे राजनीतिक चिंतकों ने कभी अपनी राजनीति को समझने-बूझने के लिए पॉपुलिज्म (लोकप्रियतावाद) के चश्मे का इस्तेमाल नहीं किया। जो हो रहा है वह या तो नरेंद्र मोदी से है या राहुल गांधी की वजह से। राहुल गांधी और कांग्रेस लायक नहीं हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी ही देश का मूड बने हुए हैं क्योंकि वहीं एक विकल्प के रूप हैं। लेकिन हम भोलेपन में यह भी समझे बैठे हैं कि मोदी इसलिए हिट हैं क्योंकि दुनिया में इन दिनों जो ट्रेंड और मूड है उसका अपने यहां भी  डंका है। 

2004 में नीदरलैंड के एक नौजवान राजनीति विज्ञानी कास माउडे ने पॉप्युलिस्ट जेटगीस्ट’ नाम का परचा प्रकाशित किया। उसने इसमें लोकप्रियतावाद की नई और संक्षिप्त परिभाषा बताई। पहले पॉपुलिज्म की परिभाषा दी। समाज को दो समूहों में बांट उन्हें आमने-सामने खड़ा माना। एक तरफ सीधे-सच्चे (‘the pure people’) बूझें जो बुनियादी रूप से अच्छे हैं तो दूसरी और भ्रष्ट अभिजात्य समूह वाले लोग (‘the corrupt elite’) हैं जो मूलतः बेईमान माने जाते हैं और जिनका रोजमर्रा के जीवन से सरोकार नहीं होता। पॉपुलिस्ट जो राजनीति करता है वह सामान्य-सहज सोच (general will) की बातें करता है। उन इच्छाओं, उन चिंताओं या उम्मीदों में बात करता है जो सामान्य लोगों के कॉमन सेंस को छूती हैं। उसकी राजनीति मतलब सामान्य इच्छाओं की अभिव्यक्ति। इच्छाओं की छोटी-छोटी बातों का समूह। और वह ‘आम आदमी’ की इच्छाओं को दर्शाता हुआ। 

अब इस सिद्धांत को भारत के संदर्भ में जांचें। 2014 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के लिए आम जनता से जो अपील की थी वह एक सामान्य उम्मीदवार के रूप में थी। ऐसा विनम्र, सहज, सामान्य उम्मीदवार जो बहुत ही गरीब पारिवारिक पृष्ठभूमि से था। बाद में उन्होंने अपने को ‘कामदार’ बताना शुरू किया। इस तरह के दावे करते हुए मोदी ने सीधे-सच्चे (‘the pure people’) लोगों के मन में जगह बनाई। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पर यह कहते हुए हमले शुरू किए कि वह तो ‘नामदारों’ की पार्टी है जो अपने मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं। इस तरह ‘वंशवादी राजनीति’ को बहुत ही घटिया शब्द के रूप में स्थापित किया और उसे भ्रष्ट अभिजन (‘the corrupt elite’)का पर्याय बनाया। सीधे-सच्चे, सामान्य याकि आम जन को भावनात्मक रूप से बरगलाने का वह नैरेटिव था, जिसने 2014 में नरेंद्र मोदी की जोरदार जीत सुनिश्चित की। 

पांच साल बाद वह नैरेटिव और व्यापक बना और नरेंद्र मोदी की बातें, उनका काम ‘आमजन की इच्छा’ के रूप में भारी प्रचार के साथ अभिव्यक्त हुआ। इसने हिंदुओं के भीतर यह बात भी पैठाई कि वे अपने ही मुल्क में उत्पीड़न का शिकार हैं, उन्हें सताया जा रहा है।

पुलवामा के हमले और इसके बाद बालाकोट में कार्रवाई से धारणा और पुख्ता हो गई। नरेंद्र मोदी सामान्य हिंदू लोगों के भीतर यह भरोसा पैदा करने में कामयाब रहे कि अगर उन्हें पाकिस्तान और मुसलमानों से कोई बचा सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ वे ही (नरेंद्र मोदी) बचा सकते हैं। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के पार्टी और संगठन की विचारधारा को साथ जोड़ते हुए मोदी ने आम आदमी के मन में लोकप्रियता की वह जगह बनाई कि लोगों में याकि जनमन में पॉपुलिज्म घर-घर जा पैठा।

नरेंद्र मोदी पॉपुलिज्म का आंदोलन बन गए। ऐसा आंदोलन जो सतत भरोसे से लोगों की इच्छाओं को एकीकृत रूप मे बांधे हुए है। ऐसा करते हुए यह मैसेज भी कि करप्ट अभिजात्य प्रतिष्ठान की अपने स्वार्थ की योजनाओं, हितों पर उनका हथौड़ा चल रहा है। हालांकि विचारक माउडे स्पष्ट करते हैं कि पॉपुलिज्म, लोकलुभावनवाद कोई वाद या संपूर्ण रूप से कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है, जैसे कि समाजवाद या उदारवाद है। यह आधी-अधूरी सी एक पतली सी विचारधारा है। बाकी दुनिया की तरह भारत में भी लोकलुभावनवाद दक्षिणपंथी राजनीति से धक्का पाए हुए है।  यह पॉपुलिज्म टिका रहना है। इसकी कोई एक्सपायरी तारीख नहीं तय हो सकती। असल कहानी यहीं है कि लोकप्रियतावाद खासतौर से दक्षिणपंथी लोकप्रियतावादी दुनिया में हर जगह उभर रहे हैं और राजनीतिक परिदृश्य में इनका तेजी से फैलाव हो रहा है।

हालांकि भारत जैसे देश में राजनीतिक धाराएं, नुस्खे, पॉपुलिज्म हमेशा इतना आसान नहीं हैं। फिर भारत में जात, समुदाय का सांप-सीढ़ी खेल है तो लोगों की भावनाओं को भुनाने वाले क्षेत्रीय दल भी हैं। संभव है आगे विधानसभा चुनावों में यह सिद्धांत काम न करे और कोई और विचारधारा, नुस्खा इस पॉपुलिज्म को फेल कर दे। बावजूद देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस बार-बार लगातार जैसे लोगों को निराश कर रही है उसमें उसके द्वारा लोगों के लिए अपनी भाषा, अपना पॉपुलिज्म बनाना आसान नहीं होगा। नरेंद्र मोदी अलग तरह की भाषा बोलते हैं और उन्हें सुनने वाला वर्ग भी अलग ही है। उनकी जीत में हताशा, गुस्सा, चिंता और आक्रोश सबके अलग-अलग रूपों की समूह जीत है। हालांकि यह भी अपनी जगह लग रहा है कि भारी जीत के बाद जीत का वह संतोष नहीं है जो सीधे-सच्चे (the pure people) लोगों से झलकना चाहिए। खुशी में भी चिंता और विलाप की रेखाएं हैं। 

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