• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 01 April, 2019 06:43 AM | Total Read Count 613
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मोदी का शुरू प्रचार, पर जोश कहां?

28 मार्च को मेरठ में जो दिखा वह जस का तस है। 28 मार्च को चुनाव प्रचार अभियान की शुरूआत का नरेंद्र मोदी का पहला पड़ाव मेरठ था। मेरा भी लोगों के मूड को समझने की शुरूआत का पहला पडाव। सभा स्थल के बाहर मैंने पूछना-बूझना शुरू किया। पहला जवाब सुना -  

‘मोदी की लहर है’ , 
और उसने चाय की चुस्की ली और सीधे मेरी ओर देखा। मैंने कहां- अच्छा। मुझे उसके भीतर क्या चल रहा है, यह समझ आ गया था। इसके बाद उसने मुझे बताना शुरू किया कि मोदी लहर के पीछे आखिर क्या कारण हैं। उस शख्स ने कहा- ‘अकेले मोदी ही हैं जो भारत को आगे ले जा सकते हैं। बालाकोट देखा आपने!..’   एक बार मुझे फिर देखा, मैंने समझते हुए गर्दन हिलाई। 

एक भाजपा समर्थक के नाते वह अपने जवाब पर मेरी सहमति, पुष्टी चाहता था। फिर भी उसके चेहरे पर हैरानी-सी झलक रही थी। आगे बोला- ‘फिर भी कांटे की टक्कर है।’ 

मैंने हैरानी से पूछा- अगर मोदी लहर है तो कांटे की टक्कर कैसे हुई? उसका जवाब था- यूपी में जातियां खेलती हैं और यूपी पर देश खेलता है। एलायंस भारी पड़ेगा।

इसके बाद मैंने उससे और कुछ नहीं पूछा। वह अपनी बेटी के बारे में बात करने लगा जिसने अपने कॉलेज में टॉप किया था, और उस भतीजे के बारे में जो दिल्ली में एक न्यूज चैनल में पत्रकार है। मेरठ में सुबह बहुत तड़के साढ़े छह बजे राष्ट्रीय राजमार्ग-58 पर हम एक ढाबे पर थे। कुछ घंटे बाद ही यहां से नरेंद्र मोदी को चुनावी अभियान की शुरुआत करनी थी। लेकिन तब तक यहां कोई ज्यादा हलचल नजर नहीं आ रही थी। उनींदा, ठंडा माहौल। 

8.30 सुबह के। माहौल में गरमी आने लगी थी। जिस मैदान में रैली होनी थी वह तैयार था। चारों ओर सफेद कपड़ों के पंडाल में लिपटा हुआ। नीले आसमान और मार्च की ठंडी-सी हवा में पंडाल में भगवा रंग के झंडे लहरा रहे थे। पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों के अलावा वहां कोई नजर नहीं आ रहा था। कहा जा रहा था कि करीब एक लाख समर्थक रैली में पहुंचेंगे। नौ बजे तक सारा हाईवे खाकी और नीली वर्दी पहने जवानों से पट चुका था।

सुबह के 10 बजे। हलचल शुरू होने लगी थी। थोड़े-थोड़े करके भाजपा समर्थक और कार्यकर्ताओं का पहुंचना शुरू हो गया था। रैली स्थल के ठीक बाहर सड़क के एक किनारे एक वैन में नमो ब्रांड और ‘मैं भी चौकीदार’ लिखे टी-शर्ट, टोपी, मुखौटे आदि मिल रहे थे। कुछ उत्साही नौजवान नरेंद्र मोदी के फोटो फ्रेम के साथ अपनी तस्वीरें ले रहे थे। लगता है इन लोगों ने ऐसा वहां मौजूद प्रेस फोटोग्राफरों और टीवी कैमरामैनों का ध्यान खींचने के मकसद से ही किया होगा। इसी तरह ‘मैं भी चौकीदार’ वाले मग भी बिक रहे थे। और सबसे दिलचस्प चीज तो थी मोदी दीवार घड़ी जिसमें यह संदेश लिखा था कि- ‘आओ समय के साथ चलें, नए भारत का निर्माण करें।’ 

हालांकि मैं बीस मिनट तक वहां रही, लेकिन किसी को भी इनमें से कोई सामान खरीदते नहीं देखा, मगर हां, नरेंद्र मोदी के कटआउट के साथ सेल्फी सबने ली।

नरेंद्र मोदी के पहुंचने का वक्त लगभग बारह बजे का था। साढ़े दस बजे तक भीड़ जैसा कुछ नहीं लग रहा था। फूलों से सजा मंच अब नेताओं की चिंता बढ़ा रहा था। हालांकि लोगों को संबोधित करते हुए स्थानीय नेता भीड़ जुटाने और आए लोगों को रोकने की कोशिशों में लगे थे। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ दो बार भीड़ का जायजा लेने रैली स्थल पर आए। मंच पर मौजूद मंत्री लोगों से अपनी जगह बैठने को कह रहे थे। करीब सवा ग्यारह बजे एक मंत्री ने सुरक्षा बलों और पुलिस से कहा कि अब सबको आने दिया जाए।

ठीक बारह बजे रैली स्थल पर मोदी का पदार्पण हुआ। लोगों ने उनके नाम- मोदी, मोदी- के नारे लगाते हुए स्वागत किया। लोगों की कोशिश थी कि मंच की तरफ आगे आएं ताकि भाषण दे रहे मोदी के साथ मीडिया में उनकी भी तस्वीर आ जाए। लोगों में एक उत्सुकता तो थी, लेकिन जो जोश होना चाहिए था वह नहीं दिख रहा था। मोदी के भाषण के दौरान कई मौके ऐसे भी आए जब उन्हें लगा कि लोगों से जोरदार प्रतिक्रिया मिलेगी, लेकिन नहीं मिली। कई अहम मुद्दों पर लोग खुश भी दिखे। कई बार तो लोगों का भाव ऐसा रहा जब मोदी ‘भाइयों और बहनों’ वाली शैली में बोलते थे और लोग उन्हें जिस रूप में लेते थे।

मगर कुल मिलाकर सभा में, सभा का कैसा, क्या जोश? कुछ नहीं, सपाट। सभा एक तरह से फीकी ही रही। खासकर उस अनुभव में कि एक वक्त था और वह वक्त देखा है जब लोग मोदी को देखने और सुनने के लिए घंटों पहले पहले पहुंच जाते थे और लाइनों में खड़े रहते थे। ऐसा भी वक्त था कि मोदी की सभा से घंटो पहले रास्ते जाम हो जाते थे और चारों ओर उन्हें देखने-सुनने वाले ही नजर आते थे। एक पत्रकार ने बताया कि जब वह पिछली बार यानी 2014 में यहां आया था तो सड़क के रास्ते आने में आठ घंटे लग गए थे। लेकिन इस बार तो दिन में डेढ़ बजे तक सारा यातायात सामान्य हो चुका था, कहीं कोई जाम नहीं!   

2014 में भी मोदी ने मेरठ से ही चुनाव प्रचार की शुरुआत की थी। तब वह सुपरहिट रहा था। लगता है, तब यहां जिस तरह का जोश-खरोश लोगों में मोदी को दिखा था, उसी को देखते हुए इस बार भी चुनाव अभियान के लिए मेरठ को ही चुना गया। मेरठ और इसके आसपास की सीटों पर 11 अप्रैल को वोट पड़ने हैं, इसी वजह से लोगों को ध्यान में रखकर मेरठ को चुना गया। मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल, मुजफ्फरनगर से संजीव बालियान, बिजनौर से कुंवर भारतेंद्र सिंह और  बागपत से सत्यपाल सिंह मैदान में हैं। इतने दमदार उम्मीदवार और ग्यारह बजे मैदान खाली पड़ा रहना, कुर्सियां खाली रहना जैसी बातें आखिर सवाल तो उठाती हैं। हालांकि भाजपा समर्थक इस सवाल को खारिज करते हुए सफाई देते हैं कि पिछली बार रैली मेरठ के बीचों-बीच शहर में थी  जहां लोगों का पहुंचना आसान था। इस बार रैली स्थल जरा दूर रखा गया है, इसलिए लोगों को यहां तक पहुंचने में मुश्किलें आई हैं।

लेकिन नरेंद्र मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक हैं। सारा चुनाव प्रचार उन पर ही केंद्रित है। नामुमकिन अब मुमकिन है और मोदी हा तो मुमकिन है- जैसे नारे लिखी चीजें, चुनाव प्रचार सामग्री, कटआउट, बड़े-बड़े पोस्टर सबके केंद्र में मोदी ही हैं। ऐसे में अगर लोग नरेंद्र मोदी को देखने और सुनने के लिए आने की ‘कोशिश’ नहीं कर रहे हैं तो क्या इससे मोदी की कैमिस्ट्री और मोदी के गणित दोनों की तस्वीरें साफ नहीं होती हैं?

अरविंद शर्मा जैसे मोदी के कट्टर समर्थक जो सुबह साढ़े नौ बजे से मैदान में आकर जम गए थे, बाद में महसूस कर करते हैं कि ये अब 2014 वाले नरेंद्र मोदी नहीं हैं। अरविंद ने भी कहा कि गठबंधन ने एक झटका तो दे दिया है।

भले मोदी का गणित इस बार अच्छा नहीं नजर आ रहा हो, लेकिन उनकी केमिस्ट्री में कोई कमी नहीं है। जो जोश पहले नजर आता था, वह हाल तक था भी। लेकिन मेरठ में वह नहीं दिखा, लगा वह बेकार हो गया।

रैली स्थल के बाहर खाने-पीने की ठेलियां लगाने वालों की मौज जरूर दिखती है। नरेंद्र मोदी के लिए इनके मुंह से दुआएं इसलिए निकल सकती हैं कि मोदी के चक्कर में दो-दो हजार रुपए तक कमा लिए। नमों ब्रांड का सामान बेचने वाले ने कोई दस हजार की भीड़ में 22 लाख तक कारोबार कर लिया।... और यह कह कर वह मुस्कराया भी।

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