• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 11 May, 2019 07:18 AM | Total Read Count 330
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भोपाल ही है 2019 का सूरमा रणक्षेत्र!

लोकसभा चुनाव 2019 की लड़ाई में बतौर रणभोपाल हमेशा याद रहेगा। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव का केंद्र, एपिसेंटर  यदि वाराणसी था तो माने कि 2019 के लोकसभा चुनाव का केंद्र भोपाल है। दिग्विजयसिंह और प्रज्ञा ठाकुर ने छह महिने पहले कल्पना नहीं की होगी कि वे भोपाल में आमने-सामने चुनाव लड़ेंगे। वह भी ऐसी लड़ाई जिस परपूरे देश का फोकस होगा। देश के सेकुलर बनाम हिंदुत्व विचार की प्रतिनिधी लड़ाई उन दो चेहरों से उस भोपाल में होगी जहां मिजाज सौम्यता का, सूरमा भोपालियों (शिवराजसिंह, बाबूलाल गौर आदि) का मिजाज भी सियासी दंगलों से तौबा करने का है। वही भोपाल आज आईडिया ऑफ इंडिया की परस्पर घोर विरोधी दो धाराओं के टकराव का केंद्र यदि है तो यह 2019 के बाकि तमाम मुकाबलों के आगे सबसे बड़ा मुकाबला है। 

भोपाल में दिग्विजयसिंह के उम्मीदवार होने के फैसले ने नरेंद्र मोदी, अमित शाह, संघ परिवार को लंबे विचार में डाला। इन्हे समझ आया कि उनसे लड़ने के लिए भाजपा के खांटी सूरमा भोपालियों में लड़ने का दमखम नहीं है जबकि दिग्विजयसिंह के भोपाल से लड़ने का मतलब जबरदस्त है। भोपाल से पूरे प्रदेश में कांग्रेस के आत्मविश्वास का मैसेज, दिग्विजयसिंह के आकर्षण के राजनैतिक मायने गंभीर होते हंै, इसे समझते हुए भाजपा ने ऐन वक्त तक दिग्विजयसिंह, कांग्रेस सभी को संदेह, भ्रम और अबूझ पहेली में उलझाए रखा।  जब ‘हिंदुत्व कार्ड’ के अल्टीमेट चेहरे प्रज्ञा ठाकुर की घोषणा हुई तो भोपाल का रणक्षेत्र तुरंत लड़ाई का केंद्र बिंदु बना और अब यह अखिल भारतीय सवाल है कि देश का दिल, दिल का केंद्र भोपाल सनातनी हिंदू पर ठप्पा लगाएगा या हिंदुत्ववादी प्रज्ञा ठाकुर को चुनेगा?

भोपाल में कितना बड़ा फैसला होना है! भोपाल का फैसला मध्यप्रदेश का भी फैसला होगा? यदि भोपाल में दिग्विजयसिंह हारते है तो पूरे प्रदेश में मोदी,मोदी हवा का हल्ला सत्य साबित होगा लेकिन यदि दिग्विजयसिंह जीते, प्रज्ञा ठाकुर हारी तो यह मानने में हर्ज नहीं कि तब भाजपा का प्रदेश में भी प्रदर्शन औसत होगा।

पर भोपाल में एक जानकार ने बतायाकि ऐसा नहीं सोचे। यह लड़ाईयों की लड़ाई है। आश्चर्य नहीं करें यदि इस सीट पर प्रदेश की आम धारा से अलग फैसला आएं। भोपाल की लड़ाई को एकदम अलग, दिग्विजयसिंह की अकेले की माने।

बात ठीक भी है। कांग्रेस के दिग्विजयसिंह का बतौर मुख्यमंत्री आखिरी दिन कोई 21 साल पहले था। एक जमाना गुजर गया। इतना वक्त व्यक्ति को राजनीति में खत्म कर देता है। लेकिन 21 साल बाद दिग्विजयसिंह आज एक विचारधारा, राजनैतिक संस्कृति के बतौर प्रतिनिधी ऐसी लड़ाई लड़ रहे है जिसकी उनके विरोधियों नेऔर न ही समर्थकों ने कभी कल्पना की थी। 71 वर्ष की उम्र में भोपाल के रणक्षेत्र में दिग्विजयसिंह अपने आपको पूरी तरह रिइनवेंट कर घर-घर, मौहल्ले-मौहल्ले घूमते हुए विश्वास दिला रहे है कि मैं भोपाल का कायाकल्प करने आया हूं। मैं विकास के लिए चुनाव ल़ड रहा हूं। भोपाल को ले कर मेरा विजन पत्र है।

उनके लिए भरोसा बनाना आसान नहीं है। भोपाल में लोग अभी भी याद करते है उनके मुख्यमंत्री काल के वे दिन जब बिजली ही नहीं आया करती थी। ‘ लाइट ही नहीं आती थी उन दिनों...हम क्यों इनके विजन डॉक्यूमेंट को माने!’  ऐसी नाराजगी, ऐसा उलाहनाभोपाल में कई जगह सुनाई दिया।

जबकि प्रज्ञा ठाकुर पर लोगों का रिएक्शन सपाट है। दिग्विजयसिंह को ले कर पक्ष में हो या विरोध में लोग बाते करते मिलते हैं। भोपाल में प्रज्ञा ठाकुर बतौर चेहरा रणक्षेत्र में है। उनके लिए भाजपा, संघ संगठन, हिंदूवादी घर-घर जा रहे हैं जबकि दिग्विजयसिंह के लिए यों भले पूरी कांग्रेस, प्रदेश से आ-जा रहे कांग्रेसी नेता, कार्यकर्ताओं की भीड़ दिखेगी लेकिन हकीकत में दिग्विजयसिंह निपट अकेले 2019 के चक्रव्यूह को भेदने को लड़ते दिखलाई देते हंै। 

दिग्विजयसिंह चुनावों का पुराना अनुभव रखने वाले महारथी हंै।‘एक ऐसे नेता जो सांस ही राजनीति मे लेते हंै।“ उनके भाई का यह कहा वाक्य दिग्विजयसिंह के निवास से ले कर प्रचार की हर जगह हर तरह से झलकता है। 

भोपाल में पत्रकारों, नेताओं, जानकारों में किसी से बात करें सभी की जुबां, दिल-दिमाग में कौतुक दिग्विजयसिंह के चलते है। वे कैसे चुनाव लड़ रहे है, कैसी मेहनत कर रहे है, उनको कैसी मुश्किले है या वे प्रचार और वोट के लिए कैसे-कैसे जुगाड़, कैसी रणनीति बना रहे है, इसकी बात हर जानकार, पार्टी नेता बताता मिलेगा। ऐसा प्रज्ञा ठाकुर को ले कर नहीं है। एक हिसाब से प्रज्ञा ठाकुर चुनाव लड़ नहीं रही है उन्हे चुनाव लड़वाया जा रहा है। उनको ल़ड़ाते हुए भाजपा, संघ परिवार के संगठन सभी ने माना हुआ है कि जैसे मध्यप्रदेश में हवा है वैसे भोपाल में भी हवा है। मोदीजी की हवा है और मोदीजी प्रज्ञा ठाकुर को जीतवा देंगे। जाहिर है ‘हिंदुत्व का कार्ड’ मोदीजी के जलवे पर आश्रित है! तभी बात समझ नहीं आती कि यदि मोदीजी की हवा से भोपाल में जीतना तय था, तय है तो बतौर हिंदुत्व कार्ड प्रज्ञा ठाकुर को दिग्विजयसिंह के आगे उम्मीदवार बनाने का फैसला क्यों करना पड़ा? क्या इसलिए कि दिग्विजयसिंह भोपाल में मोदी हवा को काटने का दमखम लिए हुए थे? नरेंद्र मोदी का जादू और प्रज्ञा ठाकुर के हिंदुत्व चेहरे के दोहरे कार्ड का भोपाल में उपयोग बताता है कि दिग्विजयसिंह ने 72 वर्ष की उम्र में भोपाल की तैयारियां बारीकी से की हुई है।

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