• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 23 April, 2019 07:05 AM | Total Read Count 394
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‘सुरक्षित’ नहीं टेढी सीट में लड़ रहे हैं वैभव!

तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत का जोधपुर में जो जलवा है वह बेजोड़ है। एक राजनेता और सामान्य व्यक्ति दोनों रूप में उनकी असली पूंजी है जोधपुर के लोगों से सहज जुड़ाव, मिलनसारिता। हालांकि यह जुड़ाव और लगाव सिर्फ जोधपुर तक सीमित नहीं है, पूरे राजस्थान में यही उनको ले कर फील है। अशोक गहलौत ने अपने आपको ऐसे क्राफ्ट से इस अंदाज, में अपने को ढाला है कि उसके चुंबकीय आकर्षण में जहां राजनीति सधती गई वही सियासी विरासत पुख्ता होती गई। और वह विरासत है जिसके आगे 38 साल के वैभव गहलौत को जोधपुर में यह बताने की चुनौती है कि उनमें भी है दम!    

अशोक गहलौत और उनके बेटे वैभव गहलौत दोनों ने कल्पना नहीं की होगी कि जोधपुर का चुनाव पूरे भाऱत के कौतुक का केंद्र बनेगा। प्रदेश में अकेली उसी सीट पर फोकस बनेगा। पूरे देश की निगाह में वैभव होंगे। सचमुच कई मायनों में जोधपुर लोकसभा सीट के मुकाबले में अड़तीस साल के वैभव को पिता की विरासत को बचाए रखने की चुनौती और जिम्मेदारी भी गंभीर है।    

वैभव को ज्योंही कांग्रेस ने जोधपुर से अपना उम्मीदवार बनाया तो कई  राजनीतिक विश्लेषकों, टीकाकारों और विरोधियों ने नैरेटिव बनाया कि वैभव को उनके पिता और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सुरक्षित  ‘सीट’ से उतारा। लेकिन ऐसा मामला नहीं है। सीट आसान नहीं है। वैभव खुद इसे समझते हुए बहुत गंभीरता से चुनाव लड़ रहे हंै। वे लोगों से सीधे मिलना पसंद करते हैं लेकिन मीडिया से कम। जोधपुर के आरटीडीसी के एक होटल में नया इंडिया से उन्होंने बात की। कलप लगे सफेद कुर्ता-पायजामा पहने और गले में मालाएं और कार्यकर्ताओं से घिरे वैभव में कुछ झिझक के साथ सियासी चुस्ती- फुर्ती थी। वैभव विनम्र और मृदुभाषी हैं और चीजों को आसान बनाने में भरोसा रखते हैं। उनमें ऐसा कोई भाव नहीं झलकता जिससे यह लगे कि वे कांग्रेस के वरिष्ठ और ताकतवर नेता और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे हैं। उनका एजेंडा, मिशन, लक्ष्य सब एकदम स्पष्ट है और शायद तभी उनका राजनीतिक प्लेटफार्म तैयार हुआ है। लक्ष्य है अपनी राजनैतिक पहचान और वजूद बनाना।    

हालांकि वैभव कभी-कभार इस बात पर खीझ जरूर जाते हैं जब यह कहा जाता है कि वे पहली बार राजनीति में आए हैं। वे कहते हैं- मैं कोई पहली बार राजनीति में नहीं उतरा हूं जैसा कि कहा जा रहा है। मैं 2004 से राजनीति में हूं और एक कार्यकर्ता के रूप में अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां निभाई हैं। मैं राजनीति में सक्रिय रहा हूं और सवाई माधोपुर में चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाला है और पिछले पांच साल से पार्टी के प्रदेश महासिचव की जिम्मेदारी भी निभा रहा हूं।  

वैभव गहलोत राजनीति में लंबे से सक्रिय हैं और सवाई माधोपुर में उन्होंने अपना खासा प्रभाव बनाया है। लेकिन पार्टी के कुछ भीतरी राजनीतिक कारणों से उन्हें जोधपुर आना पड़ा। पहले भी उन्हें टिकट देने की बात चली थी, लेकिन तब हालात उनके पक्ष में नहीं थे। लेकिन अब उन्हें पार्टी ने चुनावी मैदान में उतार दिया है और उन्हें अपनी जीत को लेकर कोई फिक्र नहीं है। वे दिनभर मीटिंगों और सभाओं में व्यस्त रहते हैं। जहां भी जाते हैं, मुख्यमंत्री का बेटा होने का कार्ड नहीं खेलते।  वे भाषण हालांकि छोटा देते हैं, लेकिन ठोस देते हैं। 

जोधपुर से पचास किलोमीटर दूर भीकमकोर में उनकी एक चुनावी सभा में उन्होंने केंद्र और राज्य दोनों से भाजपा को साफ कर देने का आह्वान किया, लेकिन उनके इस आह्वान में खास बात यह थी कि उन्होंने यह बात किसी का नाम लिए बिना और बिना किसी गुस्से या आक्रोश के कही। इसमें कोई धमकी जैसे स्वर नहीं थे। उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया कि एक सांसद के रूप में उनकी पहली जिम्मेदारी इलाके में पानी लाना होगी। उनकी इस एक बात के जिक्र से लोगों खासतौर से महिलाओं के चेहरे पर खुशी दिखी। लोग वैभव को अशोक गहलोत के ही बेटे के रूप में नहीं देखते हैं, बल्कि कई परिवारों में अपने बेटे के तौर पर भी उन्हें देखा जाता है। एक महिला ने कहा- वह हमारा बेटा है... वह हमारे लिए पानी लाएगा।

वैभव शालीन व्यक्तित्व वाले हैं। यह बात उनके काम और व्यवहार दोनों में झलकती है, और ऐसी ही अपेक्षा वे दूसरों से भी करते हैं। भीखमकोर की सभा में उन्होंने लोगों में जो जोश और उत्साह पैदा किया वह मामूली नहीं था। बाद में लोग वहां उनकी तारीफ करते नहीं थके। इसमें कोई शक नहीं कि जोधपुर से उनका भावनात्मक जुड़ाव ही उनके आत्मविश्वास का आधार है और यह भाजपा उम्मीदवार गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला है।  

वैभव भले लोकसभा चुनाव में पहली बार उतर रहे हों, लेकिन वे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जरा भी परेशान नहीं हैं। वे गजेंद्र सिंह को अपने लिए कोई चुनौती या खतरा नहीं मानते है। न ही उन्हें ऐसा लगता है कि वे नरेंद्र मोदी के साथ कोई मुकाबला कर रहे हैं। वे साफ कहते हैं- मैं यह चुनाव भाजपा के साथ लड़ रहा हूं। और यह जवाब उन्हें सोच-समझ कर बोलने वाला विवेकशील नेता बनाता है।  वैभव को पता है कि उनके पिता की इमेज, विरासत ऊंची है। उसी से यह आत्मविश्वास है कि जनता से कनेक्ट हो जन नेता बनने का यह निर्णायक अवसर है। उन्हे अपने आपको जनता का नेता प्रमाणित करना है। इसका बतौर पिता अशोक गहलोत ने पत्रकारों से बात करते हुए 30 मार्च को जयपुर में जिक्र भी किया। कहां था – राजनीति में साबित करना होता है कि यदि ऊंची जिम्मेवारी का मौका मिला है तो अपने आपको साबित करों।‘ यही जोधपुर में वैभव गहलोत की चुनौती है कि वे इस चुनाव में जनता का विश्वास जीत पाने लायक अपने को प्रमाणित कर पाते है या नहीं?

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