• [WRITTEN BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 31 August, 2019 06:52 AM | Total Read Count 488
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अमित शाह के सौ दिन

तो अमित शाह के बतौर गृह मंत्री सौ दिन पूरे हुए। यों भारत के गृह मंत्री या किसी अन्य वजीर के सौ दिनों पर विचार की परंपरा नहीं है। पर इस दफा होगा। इसलिए क्योंकि आजाद भारत के इतिहास में किसी गृह मंत्री ने उस समस्या, उस बर्रे के छत्ते में हाथ डालने का दुस्साहस नहीं दिखाया, जिसका नाम जम्मू-कश्मीर है। और अमित शाह ने न केवल जड़ मिटाई, बल्कि जम्मू-कश्मीर का ऐसे भूगोल बदला कि अभी भी बहुत लोग हतप्रभ हैं कि ऐसा कैसे हो गया! पर अमित शाह के गृह मंत्री बनने के साथ यह तय था। मुझे किसी जानकार ने बताई और बात क्योंकि अमित शाह की तासीर, वैचारिक घुट्टी से मेल खाती है तो इसे मानने में हर्ज नहीं है कि जम्मू-कश्मीर को ले कर उनका दिमाग पहले से बना हुआ था। बात कोई जून 2014 की है। वे पहली बार कश्मीर यात्रा पर गए। गैर-राजनीतिक, गोपनीय अंदाज में। उनके साथ राम माधव और एक करीबी थे। जैसे ही विमान घाटी में नीचे की ओर उतरना शुरू हुआ, खिड़की से झांकते हुए अमित शाह ने घाटी के पहाड़ों और झीलों पर एक नजर देख अकस्मात कहा- कश्मीर कोई समस्या नहीं है। सह यात्री ने सुना, आश्चर्य से देखा तो उन्होंने यह कहते हुए बात खत्म की- ऐसी समस्या नहीं, जिसे हल नहीं किया जा सकता। 

इस वाक्य के साथ जो आत्मविश्वास था, वह संकेत था कि अमित शाह ने कश्मीर को लेकर तय किया हुआ है। योजना है और पता है कि अमल के लिए क्या करना होगा। उस यात्रा में अमित शाह ने श्रीनगर में कई महत्त्वपूर्ण बैठकें कीं। घाटी को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। यात्रा समाप्त होने तक समस्या को हल करने का खाका बना लिया था। फिर तो बस समय का इंतजार था।

और वह दिन पांच साल अड़तालीस दिन बाद तब आया जब सत्रहवीं लोकसभा में गृह मंत्री की हैसियत से अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करते हुए प्रदेश को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दो हिस्सों में बांटा। दोनों केंद्र शासित प्रदेश! जड़ खत्म, ढर्रा खत्म और भूगोल नया! 

तभी एक गृह मंत्री के सौ दिन आज विचारणीय हैं। बड़ा फैसला, बड़ी लोकप्रियता और उस विचारधारा के महानायक, जिसमें अनुच्छेद 370 को खत्म करने का 70 सालों से आंदोलन चला हुआ था। पार्टी कार्यकर्ता फूले नहीं समा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने अपने गृह मंत्री के काम की खूब तारीफ की है उसे खम ठोंक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जायज करार दे रहे हैं। पर अमित शाह को जो जानते हैं वे मानते हैं कि उनका मिजाज इन सबसे फूल कर कुप्पा होने का नहीं है। वे चुपचाप अपने काम में लगे हैं। उनका एनआरसी, समान नागरिक संहिता, मंदिर और मोदी व अपने नए भारत के एजेंडे के एक के बाद एक काम हैं। 

अमित शाह को लोग ज्यादा नहीं जानते हैं। पिछले पांच सालों में वे कितने ही लाइमलाइट में रहे हों, मीडिया के बीच कितने ही बैठे हुए दिखे हों लेकिन वे बाहरी दुनिया के लिए अभी भी वहीं पहेली हैं, जो 2014 से पहले थे। मैंने उन्हें पहली बार तब आब्जर्व किया था जब वे दिल्ली के ताज होटल में ईटीवी के सेंट्रल हॉल प्रोग्राम के पांच साल पूरे होने के मौके के जमावड़े में आए थे और कोई घंटे-डेढ़ घंटे पत्रकारों के साथ गपशप की थी। वह दिल्ली में मीडिया से उनका पहला अनौपचारिक मिलन था। तब भी वे उतना ही आत्मविश्वास लिए हुए थे, जितना 2014 की जीत के बाद लोगों ने देखा है। 

बावजूद इसके अमित शाह की पहेली को जो जानते हैं वे बताते हैं कि मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल के अनुभव ने उनको बहुत पकाया। 

वह वक्त था जब सीबीआई ने उन्हें सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड में गिरफ्तार करके जेल में डाला था। फिर उन्हें गुजरात से बाहर तड़ीपार किया गया था। मुंबई और फिर दिल्ली में उन्होंने जो वक्त गुजारा, दिल्ली के गुजरात भवन, राजपथ-इंडिया गेट में देर रात चिंता और भय के साथ आकाश में तारों को देखते हुए उन्होंने जो संकल्प बनाए थे तो आश्चर्य नहीं कि आज उनके विरोधी भी भय-चिंता में वैसे ही वक्त काट रहे हैं। मगर जानकार बताते हैं कि अमित शाह में तब भी विश्वास था कि ईश्वर ने उन पर बड़े काम का जिम्मा डाला हुआ है। 

कोई माने या न माने, समर्थक या विरोधी की किसी भी नजर से देखें, अमित शाह के पहले सौ दिन बड़े काम वाले हुए हैं। अपने बॉस नरेंद्र मोदी की तरह वे भी अपने को मीडिया, लुटियन दिल्ली की चकाचौंध से दूर रखते हैं। सिर्फ कुछ करीबी सहयोगियों को छोड़ कर अमित शाह सभी के लिए पहेली बने रहना पसंद करते हैं। उन तक लोगों की पहुंच बन ही नहीं सकती है। 

एक संपन्न परिवार में जन्मे अमित शाह बायो केमिस्ट्री के छात्र रहे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता भी। गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्रित्वकाल में सिर्फ अमित शाह ही थे, जो बिना किसी खास पहचान के विधायक बने थे। वजह थी नरेंद्र मोदी का भरोसा। नरेंद्र मोदी और अमित शाह का संयोग सचमुच पूरी तरह वफादारी और भरोसे की कसौटी से था और है। 

अमित शाह के दिल्ली में निर्वासन में गेम चेंजर का मौका अन्ना का आंदोलन और उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रभारी बनना था। जंतर-मंतर पर आंदोलन से देश का मनोभाव बूझ अमित शाह ने मोदी से कहा तो दिल्ली चलो का प्रोग्राम बना और राजनाथ सिंह ने बतौर अध्यक्ष उन्हें यूपी का प्रभार दिया तो वह मोदी के लिए वोटों की फसल लहलहाने की निर्णायक उपलब्धि थी। जाहिर है 2014 से पहले के तड़ीपार वक्त में भयाकुल बनाने वाले ग्रह नक्षत्र में अमित शाह जीये तो उससे पके और राजनीतिक समझ व उदय के एवरेस्ट की चढ़ाई भी की। 

बाद में याकि 2014 के चुनाव में 272 से ज्यादा सीटें जीतने, कांग्रेस मुक्त भारत का नारा और एक के बाद एक चुनाव को वोट मैन्यूफैक्चरिंग असेंबली लाइन के अंदाज में लड़ते हुए जीतना अमित शाह की इस दृढ इच्छा या धारणा की पुष्टि है कि ईश्वर ने उन पर बड़े काम का जिम्मा डाला हुआ है। संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने, 2014 में लोकसभा चुनाव जीतने से ले कर 2019 के चुनाव में संगठन और राजनीतिक सूझ बूझ, सलाह सब मामलों में अमित शाह पर सौ टका विश्वास रखा। वह मामूली फैसला नहीं था जब मोदी ने अमित शाह को चुनाव लड़ने के लिए गांधीनगर की वह सीट दी, जहां लालकृष्ण आडवाणी चुनाव लड़ा करते थे। मोदी ने शुरुआती वक्त के अपने संरक्षक आडवाणी को सौ टका सुरक्षित गांधीनगर सीट दी तो 2019 में अमित शाह को वह सीट ट्रांसफर करके चुपचाप बताया कि अमित शाह का उनके लिए क्या मतलब है। 

फिर सौ दिन पहले नरेंद्र मोदी द्वारा उन्हें सरदार पटेल वाले गृह मंत्रालय में बैठाना। परिणाम क्या हुआ? मानो पटेल के बाद सीधे अमित शाह गृह मंत्री हों! सचमुच आज के नौजवानों और आने वाली पीढ़ी की याददाश्त में दो (पटेल और अमित शाह) नाम को छोड़ कर पूर्व गृह मंत्रियों का शायद ही कोई नाम अंकित रहेगा। अमित शाह सरदार वल्लभ भाई पटेल के बाद ऐसे दूसरे गृह मंत्री हैं, जिन्हें हमेशा याद किया जाएगा और पढ़ा जाएगा। जम्मू-कश्मीर में आगे क्या होता है और उससे देश का क्या बनता-बिगड़ता है यह वक्त बताएगा मगर यह तो स्थायी तौर पर अब दर्ज है कि अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर को भारत का अटूट अंग बनाने की दृढ लौहशक्ति दिखाई। अमित शाह ने विचारधारा, अपनी वैचारिकता में जो सोचा उसे परिणामों की चिंता किए बिना जिस दृढता, सहजता और आसानी से जो अमली शक्ल दिया है उसने लोगों में यह आश्चर्य भी बनाया हुआ है कि अमित शाह किस मिट्टी के बने हुए हैं!   

अमित शाह तेजी से उभरती राजनीतिक छवि को लेकर परेशान नहीं दिख रहे हैं। न ही यह लगता है कि वे थमने वाले हैं। समान नागरिक संहिता, अयोध्या में मंदिर आदि का हिंदू एजेंड़ा आगे बढ़ता लगता है। बावजूद मोदी के पहले कार्यकाल और दूसरे कार्यकाल के सौ दिन में जो फर्क दिखा है उसने कई सियासी जानकारों में खटका बनाया है कि इस सबमें नरेंद्र मोदी और अमित शाह में आगे रिश्ते कैसे ढलेंगे? मोदी और अमित शाह का बनाया जा रहा नया भारत क्या सत्ता संघर्ष का चश्मदीद नहीं बनेगा? 

जवाब आने वाला वक्त देगा। फिलहाल तो वक्त अमित शाह के सौ दिन पर विचार का है। 

 

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