• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 03 August, 2019 05:42 AM | Total Read Count 298
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बोरिस है ब्रिटेन की नई सुबह!

तो  बोरिस जॉनसन हुए ब्रिटेन के पचपनवें प्रधानमंत्री! न्यूयार्क टाइम्स ने क्या खूब तंज करते हुए लिखा- ‘बोरिस जॉनसन यानी ब्रिटेन का खत्म होना।” जबकि न्यूयार्कर ने उन्हे बताया ‘डोनाल्ड ट्रंप का पुतला’। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा- “बोरिस हांकू भी। बोरिस उनका पहला नाम नहीं बल्कि अलेक्जेंडर है।”  ब्रितानी मीडिया ने भी नए प्रधानमंत्री को जमकर धोया। आब्जर्वर ने उन्हें “जहरीला भविष्य” बताया तो ‘द इकॉनोमिस्ट’ ने लिखा- “ऐसा प्रधानमंत्री जिसके हाथों में किसी को देश सुरक्षित नहीं लग रहा।”

सो बोरिस जॉनसन जब से 10, डाउनिंग स्ट्रीट के प्रधानमंत्री निवास में पहुंचे है तबसे से उन पर हमलों ने मीडिया में खासी जगह बना ली है। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के वीडियो वायरल हो रहे हैं कि मेयर, विदेश मंत्री और एक राजनेता के रूप में वे कैसे फूहड़ और अक्षम साबित हुए। मतलब पूरी तरह अनफिट। ब्रिटेन और अमेरिका याकि अटलांटिक के दोनों तरफ मीडिया में बोरिस ज़ॉनसन की बतौर प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्ति का मखौल और आलोचना दोनों। 

लेकिन हकीकत इन सबसे अलग है। इसलिए क्योंकि उनके घर के लोगों ने, पार्टी ने बोरिस को प्रधानमंत्री चुना है। राजनीतिक इतिहासकार लॉर्ड हेनेसी ने बीबीसी से बातचीत में कहा- “(ब्रिटेन के लिए) यह एक ऐसा कीमियागर (an alchemist) है जो ब्रेक्जिट की आधार धातु को ऐसे बदलेगा जो चमचमाचा और उल्लेखनीय निकलेगा।”

संदेह नहीं 2016 में ब्रिटेन का राजनीतिक माहौल ऐसा बदला कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार ब्रिटेन ने अपने आपको भंवर में पाया। एकदम बंटा हुआ देश, डावांडोल होती अर्थव्यवस्था और बाकी दुनिया के साथ रिश्तों को लेकर उत्पन्न हुए संकट जैसी समस्याएं कई आ खड़ी हुईं। और तीन साल बाद दो नाकाम प्रधानमंत्रियों के बाद. अब कमान उन खांटी बोरिस जानसन के हाथों में है जो उत्तेजक भाषणों और बनावटी नौटंकी से ब्रिटेन के लोगों में उम्मीद पैदा कर ही देते है। 

बोरिस जॉनसन ने थेरेजा मे के इस्तीफे के ठीक पहले कहा था- हम 31 अक्तूबर को ईयू ( यूरोपियन यूनियन) छोड़ देंगे, चाहे समझौता हो या न हो!’ 

ब्रेक्जिट के आलोचकों के लिए यह भले निरर्थक और घिसीपिटी बात हो, लेकिन ब्रेक्जिट को समर्थन देने वाली आम जनता के लिए तो यह नया भरोसा पैदा करने वाली बात थी। लॉर्ड हैनेसी की बात का पुरजोर समर्थन करते हुए ब्रिटेन में मेरे दोस्त भी बोरिस जॉनसन को बतौर प्रधानमंत्री सकारात्मक रूप में स्वीकार कर रहे हैं। कुल मिलाकर ब्रिटेन में लोग आज  की जस तस स्थिति से ऊबे हुए है। वहा लोगों का जो मूड है उसमें बोरिस जॉनसन जैसे नेता की जरूरत है, यही ज्यादातर लोगों का मानना है। दलील है कि हालात जब अस्वभाविक है तो बोरो जैसे अस्वभाविक नेता में क्या हर्ज!

साफ है, ब्रिटेन में भी बोरिस जॉनसन को एक परिवर्तक, सुधारक के रूप में (जैसे अमेरिका में ट्रंप को और भारत में नरेंद्र मोदी) देखा जा रहा है, क्योंकि बोरिस का व्यक्तित्व जादुई है, वे लोगों को तुरेंत ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। फिर गजब के वक्ता तो हैं ही। वे लोगों के बीच लोकप्रिय इसलिए नहीं हुए कि उनके अपने कोई सिद्धांत हैं (जो कि हैं भी नहीं) बल्कि उस आकर्षण और भरोसे की वजह से जो वे देते आए हैं। वे लोगों के बीच चुटकुलेबाजी और हंसी-मजाक करने में माहिर हैं। उनकी इस हास्य कला ने ही उन्हें लोगों का मुरीद बना डाला। अपने समर्थकों के लिए बोरिस एक ऐसे नेता हैं जिनके भीतर अकुलाहट है, उत्साह है, उनमें कुछ खौलता-सा दिखता है और सबसे बड़ी बात तो उनमें अपने को लेकर पक्का भरोसा है। लोग उन्हे एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो कुछ देने वाला, उनका उद्धार करने वाला हो सकता है। 

बोरिस दो बार लंदन के मेयर रहे और महानगर की शान को, उसके गौरव को एक हद तक लौटाया। लोग उनमें एक ऐसे नेता को देखते हैं जिसकी रणनीति ही यूरोपियन यूनियन के नेताओं को निपटा सकती है। लोग बोरिस जॉनसन के मुरीद इसीलिए हैं कि यही वह शख्स है जो लंबे समय से चिल्ला-चिल्ला कर कहता आया है कि करार हो या न हो, ब्रेक्जिट होकर रहेगा। 

वे ब्रिटेन के आर्थिक हालात को लेकर सरकार की भविष्यवाणियों को दरकिनार कर देते हैं और यह समझाते हैं कि एक बार अलोकतांत्रिक ईयू से अलग हो जाने के बाद लोकतांत्रिक ब्रिटेन कैसे तरक्की करेगा। यही वे कारण हैं जिनसे ब्रिटेन के लोगों को लग रहा है कि लंदन की शान को बोरिस ही वापस ला पाएंगे, और ऐसा कर पाने का माद्दा बोरिस में ही है। बाहर से फूहड़ दिखने वाले बोरिस जॉनसन भी ब्रेग्जिट योजना को लेकर भले ठोस न दिखें, लेकिन हकीकत यह है कि जब आप लोकलुभावनवाद और इसकी रूपरेखा को देखते-समझते हैं तो आपको लगेगा कि यह तरीका, एप्रोच उतनी ज्यादा खराब भी नहीं है। आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं जब दुनिया के ज्यादातर देशों में लोकलुभावनवाद की लहर चल रही है और लोग पुरानी लकीरों को तोड़ते हुए नए स्वतंत्र और उनमुक्त जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। यही लोगों की उम्मीद है। 

आज के दौर में चर्चिलीयाई लफ्फाजी वाली ब्रितानी राजनीति यदि ‘खून, आंसू और पसीने” के बजाय चुटकुलों और हास्य भरे प्रहसनों, नौटंकियों पर भरोसा कर रही है और उसी से ब्रिटेन यदि फिर महान बनने के ख्याल में है तो वह मेरे-आपके-दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकता है लेकिन ब्रिटेन के लिए नहीं। बदले वक्त की बदली हवा वहा पहुंच चुकी है। धुरी बदल गई है तभी शायद गोधूली की बजाय वह सूर्योदय वाली नई सुबह हो।     

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