• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 15 April, 2019 07:24 AM | Total Read Count 616
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चुनावः कहां है खुशी और अच्छी बातें?

सन 2014 का चुनाव ‘उम्मीद’ शब्द पर था। मूड आशावाद का और खुशी-जोश चेहरों से झलका हुआ। और चुनाव का नतीजा जश्न बनवाने वाला। हां, उम्मीद, आशावादी मूड, खुशी, अच्छे दिन जैसे शब्दों और जुमलों में लिखा हुआ था 2014 का चुनाव। 

पांच साल बाद 2019 के चुनाव में आज मूड? किस शब्द में बांधे?  2014 के शब्द वक्त के अनुवाद में अर्थ गंवा बैठे है। कल के शब्द आज नहीं है। तब का मूड आज नहीं। सो चुनाव 2019 के लिए अंग्रेजी का उपयुक्त शब्द लगता है मिलन्कॉली (Melancholy) याकि उदासीनता, विषाद। मतलब स्पष्टता नहीं, उम्मीद नहीं और हकीकत पर लिपटा पर्दा। उदासीनता समुदायगत है न कि निजी। राजनैतिक बुनावट लिए हुए न कि पुरजोशी याकि पोइटिक। इसमें डर है, चिंता है, बिखराव, कलह. सहमापन है।  

हवा में खौफ, यों काफी समय से पसरा हुआ है। पर वह सहमापन बढ़ता जा रहा है। सहमे होने का, खौफ का ऐसा माहौल चारों ओर है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से लेकर पिछले साल दिसंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव तक सभी और लोगों का बोलना, बताना सहमें हुए अंदाज में था और वह इस चुनाव में भी घूमते हुए जस का तस कायम है, पहले से कहीं ज्यादा।

हाल में मैं एक युवती से मिली जो पच्चीस साल से ऊपर की होगी। 2014 के चुनाव में उसने पहली बार वोट डाला था। तब वह नरेंद्र मोदी की भक्त थी। इसीलिए उसने मोदी के लिए वोट किया था। भक्ति का आलम यह था कि वह मोदी का बिल्ला लगाए रहती थी। लेकिन पीट-पीट मार डालने की घटनाओं, विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की हिंदूवादी राजनीति, कठुआ और उन्नाव के बलात्कार कांड और नोटबंदी जैसी घटनाओं ने उसकी सोच को बदला। उसके दिमाग में मोदी को लेकर जो छवि बनी थी, वह धूमिल हो गई और उसने नए सिरे से सोचना शुरू किया। 

लेकिन एक घटना ऐसी घटी जिसे उसने खुद महसूस किया। जिसे वह शायद ही कभी भूल पाए। वह रोजाना की तरह बस में चढ़ी थी। बस भरी हुई थी। कौन किस जाति या धर्म का है कोई नहीं जानता था, सिवाय एक को छोड़ कर जो मुसलिम टोपी पहने हुए था। दोपहर का वक्त था और ट्रैफिक सामान्य। अचानक से बस रुकी। मालूम चला बाहर कोई मुसलमानों का जुलूस निकल रहा है, इसलिए जाम लग गया। इस जरा-सी परेशानी से एक महिला यात्री इस कदर बौखला उठी कि उसने उस मुसलिम युवक की ओर देखते हुए कहा- ‘तुमने हमारे देश को तबाह करके रख दिया है। तुम्हें यहां नहीं रहना चाहिए। चले जाओ वापस पाकिस्तान...। सात-सात आठ-आठ बच्चे पैदा कर देते हैं, भारत की आबादी बढ़ा रहे हैं, आतंक फैला रहे हैं।.. तुम सबको पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए।’

अचानक किसी का ऐसे फूट पड़ना। हैरानी की बात जो बस में एक भी सवार नहीं बोला। कुछ ने हां में हां मिलाई, कुछ चुप्पी साधे देखते रहे। बस का ड्राइवर और कंडक्टर भी कुछ नहीं बोले। लेकिन बीच में दखल देकर उसे बोलने से रोकने वाला कोई नहीं निकला। चिल्लाने वाली महिला हिंदू थी। दूसरे यात्रियों को सुनाती हुई आगे बोली- तुम लोगों की वजह से ही ये यहां इतने मजे में रह रहे हैं। तुम लोगों को भी यहां नहीं रहना चाहिए। तभी दो लड़कियां भी जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। देखते-देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया और सारे लोग उस मुसलिम युवक की ओर देखने लगे। हद तो तब हो गई जब बस से लेकर देश तक में फैले तनाव के लिए उसे जिम्मेदार ठहराने लगे। एक क्षण के लिए तो लगा कि बस के सारे लोग उस मुसलिम नौजवान पर हमला कर देंगे और माहौल सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लेगा। तभी संयोग से बस चल पड़ी और अगले स्टॉप पर वह मुसलिम नौजवना उतर गया।

इस घटना ने उस महिला के जहन में एक ऐसा जख्म छोड़ा जिससे वह आज भी नहीं उबर पाई होगी। निश्चित रूप से 2014 में उसे जो उम्मीद  थी, आज खत्म हो चुकी थी और वह अब एक खौफ में है। वह आज वोट नहीं देना चाहती। लेकिन उसे लगता है ऐसा नहीं करके वह गलती करेगी। उसे लग रहा है कि उसके वोट से जो बदलाव पिछली बार 2014 में आया था, वह इस बार नहीं आ पाएगा। वह कहती है- ‘आज एक औरत के नाते मैं जब भी बस में चलती हूं तो मुझे अपनी सुरक्षा को लेकर डर नहीं लगता, लेकिन इस तरह की धार्मिक कटुता का खौफ अब बढ़ गया है।’

यह कोई अकेली महिला नहीं है। इसी की तरह और भी नौजवान, प्रौढ़ और वृद्ध महिलाएं हैं जो अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं। बड़ी संख्या में कई भारतीय हैं जो धार्मिक उन्माद और अलगाव की पीड़ा झेल चुके हैं। धार्मिक समूहों के बीच इस तरह का नफरत फैलाने वाला जहरीला वाकयुद्ध सामान्य हो चला है। इसी से देश में खौफ और अनिश्चितता का माहौल बन गया है। 

ऐसा नहीं है कि यह खौफ केवल हिंदू, मुसलमान (दलित) का ही हो। इससे भी बड़ा खौफ एक और है- खुलकर बात रखने का खौफ। एक वक्त था जब देश में राजनीति सामान्य हुआ करती थी। कोई इस तरह की उग्रतापूर्ण या अलगाव भरी बातें नहीं करता था। लेकिन आज राजनीति का चेहरा विद्रूप हो चुका है। राष्ट्रवाद को धर्म से जोड़ दिया गया है। कइयों के लिए तो धर्म राष्ट्रवाद में घुस गया है। लोग अधिकारपूर्वक सही बात कहने से घबरा रहे हैं। अगर आप राष्ट्रवादी हैं लेकिन हिंदू नहीं हैं तो हिंदू-विरोधी हैं। हिंदू विरोधी होने का मतलब है देश विरोधी होना जो कि पाकिस्तानी होने के समान है। भारत में पिछले पांच सालों में एक ऐसा माहौल बना है जिसमें लोग आपस में ही खुल कर बात करने से कतराने लगे हैं। हर कोई दूसरे को संदिग्ध नजरों से, खौफ भरी निगाहों से देख रहा है। 

2014 में विचार में, मूड में एकता थी। जाति, लिंग, धर्म जैसी बातों को भूलकर लोग एकजुट होकर ऐसी सरकार की मांग कर रहे थे जो देश को बेहतर ढंग से चला सके। हर कोई ऐसा राजनीतिक दल चाहता था जो सुशासन दे सके, ऐसी पार्टी जो वंशवाद की जगह सच्चा लोकतंत्र दे सके। इसी विकल्प के रूप में लोगों ने भाजपा को चुना था। भाजपा का खुद मानना है कि विचारधारा, उद्देश्य और लोगों के जोश व भक्ति से ही भाजपा सत्ता में आ पाई। पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी के साथ राजनाथ सिंह, नीतिन गडकरी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ नेताओं ने नरेंद्र मोदी को एकमत से चुनाव प्रचार अभियान का चेहरा बनाया था तो उस एकजुटता के पीछे भी वह भाव था। तभी चुनाव प्रचार में ‘सबका साथ सबका विकास’ का जुमला भरोसेमंद बना।

पांच साल बाद भाजपा में खुद खौफ, सहमेपन की चरमराहट है। पुराने नेताओं को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है। ये नेता उन मध्यकालीन सिक्कों की तरह हो गए हैं जिन्हें सिर्फ सजावट के तौर पर रखा जा सकता है, लेकिन मूल्य शून्य है। 

राजनाथ सिंह, नीतिन गडकरी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, सुमित्रा महाजन, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सब किनारे हुए दिख रहे है। अब भाजपा का मतलब सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही हैं। चुनाव प्रचार के सारे माध्यमों और साधनों जैसे पोस्टर, बैनर, घोषणापत्र सब पर सिर्फ और सिर्फ एक ही आदमी नजर आता है और वह है नरेंद्र मोदी। पांच साल में ‘सबका साथ’ ‘मोदी है तो मुमकिन है’ में तब्दील हो चुका है। जैसा बिखराव पार्टी में हुआ वैसा ही देश में जनता के स्तर पर देखने को मिल रहा है। लोग मान रहे हैं मोदी की राजनीति ने लोगों को बांट कर रख दिया है, विचारों और जनमत के स्तर पर लोग एक दूसरे को खांचों में देख रहे हैं। 

2014 का चुनाव भ्रष्टाचार, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और जनकल्याण जैसे मुद्दों पर लड़ा गया था। भाषणों में सुनहरे भविष्य की झलक दिख रही थी और बहसों में गुजरे वक्त को खारिज किया जा रहा था।

आज चुनाव उत्पीड़न (आयकर के छापे) की आड़ में लड़ा जा रहा है। इससे और गंभीर चिंता व खौफ का माहौल है। लेकिन यह चिंता और खौफ सिर्फ विपक्ष में ही नहीं है, यह सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेताओं में भी साफ नजर आ रही है। सभी के भीतर आशंका पैदा हो रही है। कांग्रेस नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और दक्षिण के नेताओं पर जिस तरह से आयकर के छापे पड़े हैं उससे मोदी और शाह की मंशा और आशंकाओं का पता चलता है। 

तभी जो प्रचार अभियान है उसमें नरेंद्र मोदी के जैसे जो भाषण है उनसे चिंता और खौफ बन रहा है। अलगाव पैदा करने वाली बाते हो रही हैं। और ऐसा करने वाले सिर्फ नरेंद्र मोदी ही नहीं हैं। राहुल गांधी, मायावती, ममता बनर्जी भी अपने भाषणों में खौफ को ही भुनाने में लगे हैं। इनके भी प्रचार अभियान में कोई सकारात्मक या खुश करने वाली बात सुनने को नहीं मिलती।  सचमुच इस चुनाव के भाषणों में, इसके हल्ले में वह सब है जिससे मतदाताओं में खौफ है तो गहरी हताशा भी बनी हुई है।

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