• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 13 August, 2018 06:34 AM | Total Read Count 657
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एक चुनौती का नाम है इंद्रा नूई

साल 2002 में जब इंद्रा नूई ने दुनिया की विशालकाय कंपनी पेप्सी की कमान संभाली थी, तो एक तरह से वह क्रांति की आहट थी। दुनिया में महिलाओं के लिए एक बड़ा दरवाजा खुला था। दूसरे मुल्क से अमेरिका आकर बसने वाली बहुआयामी व्यक्तित्व की नूई में फॉर्च्यून-500 की बहुराष्ट्रीय कंपनी की सीईओ की जिम्मेदारी संभालने की सारी खूबियां थीं। नूई के इस सफर ने इतिहास में एक नए आंदोलन की शुरुआत कर दी थी। वे पेप्सी की सीईओ के रूप में कारोबारी दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं में शुमार रहीं। और पेप्सी के लिए तो उन्होंने जो किया, वह अद्भुत था। उन्होंने लोगों के स्वाद को पहचाना और इस पेय को नया रूप दे डाला। उन्होंने स्नैक्स और चीनी-पानी के मीठे घोल को इस रूप में पेश करने का बीड़ा उठाया जो सेहत के लिहाज से सबसे खरा निकला। उन्होंने कंपनी के लिए कई नए मानदंड कायम किए। 

तभी नूई के इस शीर्ष पद पर पहुंचने की कहानी ने नई उम्मीद को जन्म दिया। उन्होंने तब न सिर्फ कॉरपोरेट दुनिया में, बल्कि दुनिया की सारी कामकाजी महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण पैदा की।

लेकिन बारह साल बाद जब नूई ने पेप्सी छोड़ी और जब एक पुरुष सीईओ ने कंपनी संभाली तो फिर से एक नई सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है। इसे बिडंबना ही कहेंगे कि जैसे ही नूई पेप्सी से बाहर हुईं, तभी से और कंपनियों की भी महिला सीईओ अपना पद छोड़ती जा रही हैं और उनकी जगह कमान संभालने वाले पुरुष ही हैं। आंकड़े पर नजर डालें तो बहुत ही दुखदायी तस्वीर देखने को मिलती है। स्टैंडर्ड एंड पूअर्स का 500 कंपनियों वाला सूचकांक बताता है कि अब दुनिया की सिर्फ 24 बड़ी कंपनियां ही ऐसी हैं जिनकी सीईओ महिलाएं हैं। यानी सीईओ की कुल संख्या का मात्र 4.8 फीसद। 

इस आंकड़े को देखकर पीड़ा होती है। इससे तो ऐसा लगता है कि नूई के पेप्सी संभालने के पहले और छोड़ने के बाद हालात और मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया। इसे तोड़ने के लिए आज भी नूई जैसी ही ताकतवर महिलाओं की दरकार है।

ऐसा नहीं कि दुनिया बदली नहीं है। पर जो कुछ बदला है, वह भी पर्याप्त नहीं है। आधी सदी बाद कंपिनयों के बोर्डरूम महिलाओं के लिए खुलने का रास्ता बना। लेकिन अब भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के भविष्य का रास्ता बहुत ही कठिन है। दुनिया में हर तरह की तरक्की  (जिसने कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को भी बढ़ावा दिया है) के बावजूद महिलाएं आगे बढ़ते वक्त में पीछे क्यों रह गई हैं?    

जाहिर है पुरुष-प्रधान कुलीन समाज में महिलाओं के लिए तरक्की के रास्ते आज भी आसान नहीं हैं। महिलाओं के लिए कार्यस्थल आज भी एक मुश्किलों-भरी जगह साबित हो रही है। परिवार और अपने कैरियर में संतुलन बनाए रखने की चुनौती लिए महिलाओं को आज भी अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, अपनी जिम्मेदारियों को लेकर महिलाएं चाहे कितनी ही मेहनती और समर्पित क्यों न हों, लेकिन असलियत यही है कि उनके मुकाबले तेजी से तरक्की और पैसा पुरुषों को ही मिलता है। इसी का नतीजा है कि आज भी कॉरपोरेट बोर्डों में महिलाओं की तादाद बहुत ही कम है, तनखाह में भारी फर्क है और महिलाकर्मियों को आगे बढ़ने के लिए पुरुषों के मुकाबले अवसर भी बहुत ही कम मिल पाते हैं। और इसीलिए कंपनी में उच्च प्रबंधन तक महिलाएं आसानी से नहीं पहुंच पातीं। 

कई अध्ययन और आकंड़ों पर गौर करें तो पता चलेगा कि 35 फीसद महिला सीईओ सीधे बाहर से लाई गईं, यानी उसी कंपनी से किसी महिला को सीईओ नहीं बनाया गया। जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 22 फीसद है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि बाहर से लाई गई महिला सीईओ को बाहर का रास्ता दिखाना भी प्रबंधन के लिए आसान रहता है। इतना ही नहीं, जो प्रमुख महिलाएं भी अपनी कंपनियां चला रही हैं, उनमें भी यही हालत है।

नूई ने कहा था कि महिलाओं के लिए आज भी आसान नहीं है कि वे अपने कैरियर और घर की जिम्मेदारियों को एक साथ पूरी तरह से निभा लें। इन दोनों के बीच ही महिला को संघर्ष करना पड़ता है। और इस जटिल संघर्ष की परिणति इस रूप में होती है कि महिला को घर या कैरियर में से एक का चुनाव करने को मजबूर होना पड़ता है। और अंत में होता यही है कि वह घर की कीमत पर अपने पेशेवर करियर की बलि दे देती है। इसके लिए हमारे परिवार और समाज में वे महिला-पुरुष ही जिम्मेदार हैं जो परंपराओं के संकीर्ण सांचे से अपने को बाहर नहीं निकाल पाए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ दशकों में महिलाओं को नई ताकत मिली है, उनका सशक्तीकरण हुआ है। लेकिन अभी भी वह पुरानी लीक, ढर्रे वाली सोच के समाज से मुक्त नहीं हो पाई हैं। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में घर-परिवार और समाज का नजरिया बदलने में अभी कुछ दशक तो लग ही जाएंगे। तभी इसमें कुछ सकारात्मक बदलाव नजर आएगा। 

हमारी पूर्वज महिलाओं दादी-परदादी ने सड़कों पर आजादी की लड़ाई के लिए जो संघर्ष किया था, उसी का परिणाम है कि आज हम एक आजाद मुल्क में सांस ले रहे हैं और इसी से हमारे सशक्तीकरण की भी शुरुआत हुई। लेकिन दुख की बात है कि हमने आज इसे बहुत ही हल्के ढंग से सोचा है। यह हमारी ही कमजोरी है कि हमने अपने आपको सोच के स्तर पर इतना कमजोर कर लिया कि हम महिला हैं, कुछ नहीं कर सकतीं, हमें घर पर ही रहना चाहिए। हम इसे नियति, या भाग्य न मानें। दुनिया में बाहर निकल कर करने के लिए बहुत कुछ है। यह हमें तय करना होगा कि हमें क्या करना है। आगे बढ़ने का रास्ता तो हमेशा ही मुश्किलों और चुनौती भरा बना रहेगा। ऐसे में अगर हम पीछे हट जाएंगे तो फिर दशकों बाद ही कोई इंदिरा नूई पैदा होगी। आइए, इस चुनौती को स्वीकार करें।  

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