• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 04 May, 2019 06:55 AM | Total Read Count 210
  • Tweet
मोदी के गोद लिए गांवों में बंटे लोग!

एक छोटा-सा सामुदायिक पार्क। बाशिंदे इसे  कहते हैं ‘भागबैठक’ की जगह! हरे गमलों और विशालकाय पेड़ों से आच्छादित इस  पार्क के बीचोंबीच बीआर आंबेडकर की मूर्ति लगी है। ‘भागबैठक’  को गांव एक केंद्रीय स्थल मान सकते है। और गांव है बनारस से बीस किलोमीटर दूर नागेपुर। इस गांव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद ले रखा है। बावजूद इसके यह अजब मूड लिए हुए है।  यहां वैसा कोई माहौल नहीं मिलता जो बनारस में दिखती मोदी भक्ति, उम्मीद और श्रद्धा के भाव से मिलता हुआ हो।

2016 में जयापुर के बाद नागेपुर दूसरा गांव था जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने आदर्श गांव बनाने में गोद लिया था। चूंकि इसके विकास की देखभाल खुद प्रधानमंत्री कर रहे थे, इसलिए फैसले के बाद गांववालों की खुशी का तब कोई ठिकाना नहीं था। उनमें बड़ी उम्मीदें जगीं थीं, आशाएं थीं। उस बात को दो साल से ज्यादा हो गए और वे उम्मीदें धुंधली पड़ती गईं। लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरा।

तीस साल के सतीश कुमार मौर्य अपने अट्ठावन साल के पिता शीतला प्रसाद के साथ काम पर निकल रहे थे, तभी नया इंडिया की उनसे बात हुई। सतीश जौनपुर में एक माइक्रो फाइनेंस कंपनी में काम करते हैं और हफ्ते की छुट्टी में घर आ जाते हैं। उनके पिता को प्रधानमंत्री मोदी से राष्ट्रीय स्तर पर तो बहुत उम्मीदें हैं, लेकिन अपने गांव को लेकर वैसी उम्मीद नहीं है।          

गांव की हालत दिखाते हुए दुख के साथ संतोष बताते हैं, “पहले साल में कुछ काम हुआ था... शौचालय बनाए गए, एक बैंक आया, पानी की टंकी लगी, सड़क ठीक हुई..। पर फिर सब ऐसा ही हो गया, आप देख ही रहे हैं।”  वे बताते हैं कि पार्क के चारों ओर दो-तीन कच्चे-पक्के घर बने हुए थे और लोग इन्हीं के पीछे शौच जाते थे। सड़क संकरी और टूटी थी। नया इंडिया ने तब भी इस गांव का दौरा किया था। तब वहां बिजली नहीं थी।

स्कूल?
संतोष बताते हैं- “एक प्राइमरी स्कूल है.. बाकी को पढ़ने के लिए घर से दूर जाना पड़ता है।” संतोष के दो बच्चे एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने पांच-छह किलोमीटर दूर जाते हैं।

तभी हमारी बातचीत को ध्यान से सुन रही एक दुर्बल-सी महिला गुस्से से फट पड़ी और बोली- “नागेपुर में मोदी जी ने कुछ नहीं किया..., मेरा जो पैसा आता था वो भी बंद हो गया”। उसका इशारा नोटबंदी के वक्त का था जब बैंक में जमा उसका पैसा भी उसे नहीं मिल रहा था। उसके बीमार किसान पति को किसान आवास योजना के तहत मकान मिलना था जो आज तक भी नहीं मिल पाया है। यह महिला अकेली ऐसी नहीं है। संतोष के पिता भी किसान हैं और सरकारी योजना के तहत उन्हें जो मिलना चाहिए था, वह आज तक नहीं मिला। नरेंद्र मोदी के कामकाज के तरीके से खफा शीतला सिंह कहते हैं- पहले भी जो था, आता था सब बंद हो गया। सिर्फ उम्मीद ही लगाए बैठे हैं। काम कुछ है नहीं।  

बंटा हुआ है नागेपुर
गांव के भीतर जाने पर पता चलता है कि लोगों में किस तरह से अलग-अलग राय है। लोग कैसे खुल कर बोलते हैं और बातचीत में गरमा-गरमी तक होने लगती है। हमने यहां जाटव समुदाय की बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों से बात की। जब से राज्य में योगी की सरकार आई है तब से इन लोगों की मुश्किलें बढ़ी हैं। लोग परेशान है, इसीलिए गुस्से में हैं। योगी सरकार के सत्ता में आने से पहले इनके खाते में हर महीने पैसा आ जाता था। लेकिन पिछले दो साल से यह बंद हो गया। बिना बताए मनमाने तरीके से बंद कर दिया गया।     

चेतन लाल तिराशी ने बताया- “पैसा भी बंद कर दिया और हमको मारते भी हैं”। उनके आसपास खड़े जाटव समुदाय के लोगों ने भी इस बात की पुष्टि की। एक घटना को याद करते हुए चेतन ने बताया कि किस तरह से राजभर और मौर्य जाति वालों ने उन्हें सिर्फ इसलिए पीटा था, क्योंकि उनके घर की ओर जाने वाली सड़क की सफाई नहीं की थी। संकरी गलियों में सटे-सटे बने घर हैं जो अलग-अलग समुदाय के लोगों के हैं। जिस तरह गलियां घरों को बांटती हैं उसी तरह यहां के लोग भी बंटे हुए हैं। इस गांव में मौर्य और राजभर के मुकाबले जाटवों की तादाद ज्यादा है। 

मौर्य और राजभर जाति का झुकाव गठबंधन की ओर है। नागेपुर के जाटव इस गांव को प्रधानमंत्री के गोद लेने से कतई खुश नहीं है। जाटव समुदाय के लोगों ने पूरी बातचीत में एक बार भी प्रधानमंत्री के यहां से जुड़ने पर कोई संतोष जाहिर नहीं किया। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या उन्हें प्रधानमंत्री से 2014 जैसी उम्मीद अभी भी है, तो जवाब जैसे निकला ही नहीं, मौन ही सब कुछ गया, जो कहा भी वह मौर्य जाति के लोगों के शौर में दब गया। इसमें कोई शक नहीं कि मौर्य जाति के तीस साल के सतीश और तेईस साल के शिवनाथ मौर्य को आज भी प्रधानमंत्री से उम्मीदें हैं और वे अभी भी पूरी वफादारी के साथ मोदी के साथ हैं। शिवनाथ मौर्य यहां जाटव बस्ती के पास एक जन-सुविधा केंद्र चलाते हैं। वे इस बात को फिजूल बताते हैं कि गांव को लोगों का मूड बंटा हुआ है। चार महीने पहले तक वे उन कुछ लोगों में से थे जिन्हें किसान आवास योजना के तहत चार हजार रुपए मिले थे। एकदम प्रशंसा के भाव में शिवनाथ ने कहा, “ये तो मोदी हैं, चाहे लोग कुछ भी बोलें।”

पर जयापुर में लोगों का मूड उलट देखने को मिला।
जयापुर पहला गांव था जिसे 2014 में सांसद ग्राम योजना के तहत नरेंद्र मोदी ने गोद लिया था और 2016 तक इसे ‘आदर्श’ गांव बना दिया गया था। विकास के नाम पर यहां जो हुआ उसमें दो बैंक, एक एटीएम, सौर ऊर्जा से चलने वाली लाइटें, पानी की टंकी, शौचालय, पक्की सड़कें, प्राइमरी स्कूल, एक पोस्ट ऑफिस और महिलाओं के लिए एक चरखा कार्यशाला शुरू की गई थी। इसके बाद काम खत्म।

तीन साल बाद अभी की तस्वीर? यहां जो देखने को मिला है वह यह कि सोलर लाइटें बंद पड़ी हैं, उनकी बैटरियां चोरी हो गई हैं, कोई इनकी देखभाल करने वाला नहीं है। शौचालय जर्जर हालत में हैं जिनमें एक तो ठीक चरखा कार्यशाला के बाहर ही है, उनके दरवाजे टूटे पड़े हैं। चरखा कार्यशाला जिसे एक कन्या विद्यालय के रूप में विकसित किया जाना था, में महिलाओं के लिए शौचालय जैसी कोई सुविधा नहीं है। यहां घर कच्चे और पक्के दोनों हैं। लेकिन कोई अस्पताल नहीं है, न कोई स्वास्थ्य केंद्र है। और इन सबसे बड़ी समस्या तो बेरोजगारी की है। लोगों के पास कोई काम ही नहीं है।

बावजूद इसके पचहत्तर साल के पन्नारास, जो किसानी करते थे, का मानना है कि जयापुर का जितना विकास है वह काफी हुआ है, “और क्या चाहिए!” चरखा कातने वाली आशा देवी भी यही कहती हैं। रोजाना पचास रुपए कमाने वाली आशा को तीन से चार महीने में एक बार पैसा मिलता है। इसलिए पच्चीस साल की आशा नरेंद्र मोदी के काम से खुश है। हालांकि उसे अभी काफी उम्मीदें हैं। आशा को लगता है कि 2019 में उसकी कमाई और बढ़ेगी और गांव में सेकंडरी स्कूल भी बनेगा। चरखा कार्यशाला में काम करने वाली रीता को भी मोदी से ऐसी ही उम्मीदें हैं।  जयापुर में लोगों से मिलने पर लगता नहीं है कि यहां लोगों का मानस अलग-अलग होगा, या कोई जातिगत बंटवारा है। लोग नरेंद्र मोदी के प्रशंसक और समर्थक हैं। मोदी से उन्हें काफी उम्मीदें हैं। जयापुर में घुसते ही चाय की दुकान चलाने वाले बंसराज गिरि यह कहते हुए बात पूरा करते हैं- “हमने बहुत से प्रधानमंत्री देखे... नेहरू, इंदिरा, राजीव..   किसी ने भी हमारे गांव को आकर देखा? मोदीजी आए और उन्होंने हमें ये सब दिया। हमारा वोट मोदी जी के साथ है।”

दो गांव। दोनों को ही प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल शुरू होते ही गोद लिया। लेकिन दोनों भुला दिए गए। फिर भी, दोनों गांवों में आज लोगों के अलग विचार हैं, अलग मूड है। जयापुर के लोग खुश हैं और उन्हें लगता है मोदी ने उन्हें सब कुछ दिया। जबकि नागेपुर के लोगों को वादे पूरे होने का इंतजार है। अगर जयापुर के लोग मोदी से खुश हैं तो नागेपुर के लोगों ने मौन धारण किया हुआ है। अगर जयापुर को लोग खुलकर मोदी का समर्थन कर रहे हैं, तो नागेपुर के लोग बंटे हुए नजर आ रहे हैं और सोच रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को इस बार समर्थन दें या नहीं।     

और यह बात सिर्फ जय़आपुर और नागेपुर तक ही सीमित नहीं है। पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसा ही देखने को मिल रहा है जहां मोदी को समर्थन देने के मसले पर लोग बंटे हुए नजर आ रहे हैं। 2014 की उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं। बातचीत में अब उम्मीदों का कोई मतलब नहीं रह गया है। उम्मीदें अब खत्म हैं। अब तो बस समर्थन या विरोध में वोट देना है, वह भी कास्ट, जाति के खांचे में। 

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

Categories