• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 18 March, 2019 07:02 AM | Total Read Count 408
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जंजीरों में जकड़ गई मीडिया की साख

बारह मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साथ कई ट्वीट किए। हर ट्वीट के पीछे मकसद आगामी चुनाव में वोट डालने के लिए लोगों से अपील थी। हालांकि हर ट्वीट के पात्र और शैली अलग-अलग थे। ब़ॉलीवुड से लेकर ट्रॉलीवुड, क्रिकेट से लेकर बैडमिंटन, कुश्ती और संगीत क्षेत्र की तमाम हस्तियों से इसमें आग्रह था। संदेह नहीं कि ये ट्वीट संदेश और विचारों के लिहाज से बहुत सोच-समझ कर तैयार किए गए थे। सबसे ज्यादा ताज्जुब तो यह कि नरेंद्र मोदी ने कुछ पत्रकारों, मीडिया प्रमुखों और मीडिया घरानों को भी इसमें शामिल कर आग्रह किया कि वे लोगों से वोट देने की अपील करें।

अगले दिन 13 मार्च को एक टीवी एंकर ने (जिन्हें ट्वीट में टैग नहीं किया गया था) ने अपने प्रोग्राम में एक थीसिस दी। उन्होने दलील दी कि निर्वाचित नेता जो प्रेस वार्ताएं करते हैं वे लोकतंत्र के मकसद को पूरा करने में मददगार नहीं होतीं, इसलिए नरेंद्र मोदी ने एक भी प्रेस कांफ्रेस नहीं करके एक नई शुरुआत की है। उन्होने कहा इसकी जगह मोदी ने ‘खुद के फायदे के लिए’ सीधे भारत की जनता से संवाद कायम करने की नई पहल की। और वह प्रधानमंत्री को राजनीतिक रूप में फायदेमंद भी हुई लगती है। जाहिर है एकंर ने पूरी बेशर्मी के साथ अपनी टीवी प्रोग्राम को ऐसे पेश किया जिसे देखने वालों ने बेखूबी समझा होगा कि यह सब मोदी को खुश करने के लिए बोला जा रहा है। सिर्फ और सिर्फ मोदी को खुश करने की कोशिश। 

नरेंद्र मोदी के ट्वीट और टीवी एकंर का प्रोग्राम मोदी राज में एक पत्रकार और राजनेता के बीच बने रिश्तों को उजागर करता है। इस पर गंभीर चिंता के साथ विचार होना चाहिए। भारत के पत्रकारों में भूख पनपी हुई है कि प्रधानमंत्री उन्हें पसंद करें और वे उनके चहेते बन जाएं और इसी वजह पत्रकार कठपुतली बनते जा रहे हैं और अब यह आम चलन-सा बन गया है। पिछले पांच सालों में ऐसे तमाम मौके देखने को मिले हैं जब पत्रकार पीआर (जनसंपर्क) एजेंट के रूप में काम करते नजर आए, सरकार की ऐसी उपलब्धियों का बखान करते दिखे जो न कोई देख पाया और न ही जो हकीकत में थीं। 

इन्हीं पत्रकारों ने फिर प्रधानमंत्री के ‘पूर्व नियोजित’ और ‘विशेष इंटरव्यू’ किए और दरबारी बनने की हौड में कीर्तिमान बनाए। और इस तरह से प्रधानमंत्री के चहेते और विरोधी पत्रकारों और मीडिया घरानों को लेकर एक साफ लकीर खिंच गई। एक पत्रकार होने के नाते यह मेरे लिए न सिर्फ पीड़ादायक है, बल्कि पत्रकारिता के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं और सवाल खड़े करने वाली बात है। अगर कुछ विवेकवान और संवेदनशील पत्रकारों और मीडिया घरानों को छोड़ दिया जाए तो लगता है कि पत्रकारों का बहुसंख्यक वर्ग विवेक और संवेदनशीलता को खो बैठा है। ये पत्रकार और मीडिया घराने भूल गए हैं कि पत्रकारिता क्या होती है और वे क्या कर रहे हैं।

पत्रकारिता का पेशा पहले से ही संकटों का सामना कर रहा है। गंभीर चुनौतियां हैं। ‘प्रेस’ शब्द को मीडिया शब्द तक सीमित कर दिया गया है, संपादकों की कामकाजी जिम्मेदारी एक तरह से खत्म ही हो गई है, बजाय इसके वे अपने मालिक और बॉस की हां में हां मिलाने वाले हो गए हैं। कारोबारी अखबार, चैनलों के मालिक बनते जा रहे हैं ताकि पत्रकारिता की आड़ में कारोबारी हितों को साध सकें। ऐसे में ज्यादातर मीडिया कारोबारी पत्रकारों की छुट्टी कर ऐसे स्वतंत्र पत्रकारों और फोटोग्राफरों को रख रहे हैं जो कम से कम पैसे में ज्यादा से ज्यादा काम करे और पूरी तरह मालिक के इशारे पर चले। ऐसे मीडिया में एकतरफा खासतौर से सत्ता के पक्ष में लेखन कराना कोई नई बात नहीं है।  सोशल मीडिया के आगाज ने तो खबरों की दुनिया का एक तरह से कबाड़ा ही करके रख दिया है। पत्रकारों के लिए खबरें निकालना और उन पर काम करना प्रतिस्पर्धी और मुश्किल काम हो गया है और इसके लिए वे एक तरह दौड़ में लगे रहते हैं, जिसमें सच्चाई से भरपूर समझौता होता है। 

ट्विटर पर फॉलोअर, टीआरपी और प्रसार संख्या के पैमाने की समस्या यह है कि वह सीधे-सीधे कमाई से जुड़ गया है। पत्रकारों के सवालों का जवाब देने या खबरों की सच्चाई की जांच करने के बजाय ट्विटर पर ट्वीट को ज्यादा अहमियत दी जा रही है।

तकनीक की चुनौती से कतई इंकार नहीं किया जा सकता। मीडिया कंपनियां तकनीक का इस्तेमाल इसलिए भी कर रही हैं कि कंपनी को न्यूनतम खर्च में चलाया जा सके, और साथ ही अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग से सूचनाएं पहुंचाने में पीछे भी न रहें। हालांकि इस तरह की पत्रकारिता से सिर्फ आर्थिक पत्रकारिता ही तेजी से बढ़ेगी, कंपनियों को मोटा मुनाफा होगा, लेकिन जो सबसे बड़ा खतरा है वह यह कि जल्द ही कहीं खबरों और लेखों पर कृत्रिम बुद्धि यानी रोबोटों का कब्जा न हो जाए।

पत्रकारिता के कर्म और प्रभाव को आज जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है वे उसके अपने भीतर और बाहर दोनों से हैं।

एक पत्रकार के नाते हम अक्सर पूछते हैं- विरोध करना कब बंद हो जाता है? आज यह सवाल खुद हमारे लिए प्रासंगिक है और इसी पर मीडियाकर्मियों को अपने आपसे से पूछना चाहिए।

पत्रकार कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं। एक विशेष मकसद से इसे शौक और पेशे के रूप में लेते हैं। लेकिन हमारा काम यह है कि हम तथ्यों की खोज में वहां तक जाएं जहां तक वे जाते हैं। हम ऐसी कोई अनदेखी नहीं कर सकते जिसमें किसी अच्छे काम या मकसद को गहरा धक्का लगे। हमारा लक्ष्य सच्चाई की तह तक जाना है तभी मकसद पूरा होगा। इसके लिए हमें सतर्क रहना होगा। न ही हम कोई वकील हैं जो अपने केस को सही साबित करने के लिए कहीं से भी तथ्यों को उठा कर रख दें। सच तो केवल एक ही होता है। हम इसे कैसे देखें, कैसे समझें यह सबके लिए अलग हो सकता है, लेकिन सच्चाई तो सच्चाई ही रहेगी।

हम कोई दुष्प्रचार करने वाले नहीं हैं, न कोई राजनीति चलाने वाले। यह हमारा कर्म भी नहीं है। हम मनोरंजन करने वाले या मॉडल भी नहीं हैं। हमसे यह उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए कि हर क्षण ट्वीटर या इंस्टाग्राम पर मौजूद रहें। ऐसे पेशे में भी नहीं हैं जो जिसमें कोई सेलेब्रिटी बन जाएं। हमारा पेशा और काम तो यह है कि लोगों को, देश को यह बताएं कि गलत क्या हो रहा है।

अपने साथियों और समकालीनों के प्रति मेरे मन में बहुत ही आदर रहा है, इस बात के लिए कि एक पत्रकार को जो करना चाहिए वे वही कर रहे हैं। हालांकि आज हम उतना अच्छा नहीं कर पा रहे हैं जितना कि कर सकते हैं। भरोसा अब टूट चुका है। शहरों, गांव-कस्बों में लोग बात करने से कतराते हैं, क्योंकि हमें कोई गंभीरता से लेता ही नहीं है। पत्रकारिता और जो हम करते हैं, उससे लोगों का भरोसा टूट गया है। इसी तरह राजनेता हमें देखते हैं, ताने मारते हैं, और संदिग्धता के साथ देखते हैं। वरना कोई प्रेस्टीट्यूट कैसे कह देगा! और सिर्फ इसलिए है कि टीवी चैनलों पर एकतरफा प्रोग्राम पेश करके ऐसे लोगों को जगह दे रहे हैं। यह हमारा खुद का दोष है कि हम कड़े सवाल पूछने की अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं। सिर्फ सरकार के जवाबों की पत्रकारिता कर रहे हैं। जार्ज ऑरवेल ने 1946 में पॉलिटिक्स एंड द इंगलिश लैंग्वेज लेख में लिखा था कि अगर पत्रकार के पास विचार और भाषा दोनों होंगे तभी सार्थक चर्चा में पारदर्शिता झलकेगी।

भारत के लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव- आम चुनाव होने को है। भटके और बिखरे मीडिया को अपनी ताकत के बारे में खुद नहीं पता है। न ही वह अपनी जिम्मेदारियों को समझ रहा है। ऐसे में कैसे हम नागरिकों को जागरूक बनाएंगे, यह बड़ा सवाल है। हमने जिन जंजीरों में अपने को जकड़ लिया है, उससे तो लगता है कि भारत में स्वतंत्र प्रेस एक सपना बनकर रह जाएगा। अब चुनाव में यह हमारे ऊपर है कि हम कैसे इस संकट से निपटें।…

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