• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 01 January, 2019 11:35 AM | Total Read Count 130
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शिवराज सिंह चौहान होने का मतलब

अजय सेतिया का यदे से मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद कमल नाथ का जगह जगह स्वागत होना चाहिए था । आखिर उन की अध्यक्षता में कांग्रेस ने 15 साल का भाजपा शासन उखाड़ फैंका है । वह मामा शिवराजसिंह चौहान को हटा कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे हैं । पर प्रदेश भर में शिवराज सिंह का स्वागत हो रहा है । वह सुर्ख़ियों में छाए हुए हैं , कभी पालथी मार कर घर में लकड़ी के चूल्हे के सामने बैठ कर भोजन करते हुए दिख रहे हैं तो कभी बंदेमातरम के नारों के बीच कम्बल की बुलकी मार कर ट्रेन से उतरते हुए दिख रहे हैं ।

कभी भीड़ के बीच क्रिकेट खेलते हुए, कभी साईकिल पर, तो कभी मोटरसाईकिल पर अपनी जय जय कार के नारे लगवाते हुए प्रदेश भर में घूम रहे हैं ।  हारे हुए शिवराज सिंह मुख्यमंत्री कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में हीरो की तरह छाए हुए थे । वह लोकतंत्र के सही रहनुमा बन कर सामने आए और कमलनाथ की ताजपोशी वाले मंच पर लोकतंत्र की जीत का जश्न मनाते हुए दिखाई दिए । उन्होंने मंच से हाथ हिला कर कमलनाथ के समर्थकों का भी दिल जीत लिया था ।

शिवराज सिंह के इस लोकतान्त्रिक उदारवादी रूप को देख कर हर कोई उन का मुकाबला नरेंद्र मोदी से कर रहा है । इस का कोई कारण नहीं है, लेकिन मुकाबला इस लिए हो रहा है क्योंकि नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि अधिनायकवाद की बना ली है । कर्नाटक के तिरंगा विवाद में मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती के वारंट निकलने के कारण “एक्सीडेंटल मुख्यमंत्री” बनने वाले शिवराज सिंह की उस समय प्रदेश व्यापी लोकप्रियता नहीं थी । जबकि नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे तो उनकी राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता थी । अपने साढ़े चार साल के शासन काल में नरेंद्र मोदी ने अपनी लोकप्रियता का जितना नुकसान किया है , शिवराज सिंह ने अपने 15 साल के शासनकाल के बावजूद लोकप्रियता में वृधि की है । 

नितिन गडकरी ने खंडन किया है कि उन्होंने भाजपा नेतृत्व पर तीनों राज्यों में हार की जिम्मेदारी लेना का बयान दिया था । लेकिन सच यह है कि तीनों राज्यों में भाजपा की हार के बाद नितिन गडकरी , शिवराजसिंह और राजनाथ सिंह की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है । राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी चुनावों में अपनी लोकप्रियता साबित की है । वसुंधरा राजे ने भाजपा के बड़े बड़े नेताओं के शुरुआती आकलन गलत साबित किए हैं कि भाजपा राजस्थान में 30-35 सीटों सिमट जाएगी । राजस्थान का आकलन तो यहाँ तक है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व अगर वसुंधरा राजे की बात मान कर 20 टिकट और काट देता तो वसुंधरा राजे फिर सरकार बनाती ।

नितिन गडकरी के तथाकथित बयान ने भाजपा में यह सोच जरुर पैदा कर दी है कि क्या “डबल ईंजन” की सरकारों वाले इन तीनों राज्यों में “डबल एंटी-इन्केम्बेन्सी” काम कर रही थी । भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व पर जिम्मेदारी की बात शिवराजसिंह और वसुन्धरा राजे भी नहीं कर रहे ,लेकिन केंद्र सरकार की एंटी- इन्केम्बेन्सी पर मंथन शुरू हो चुका है । शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे के कुछ करीबी लोगों का यहाँ तक कहना है कि भाजपा हाईकमान का एक वर्ग चाहता ही नहीं था कि इन दोनों राज्यों में दुबारा भाजपा की सरकार बने , इसी लिए छतीसगढ़ की जीत को तो सुनिश्चित बताया जा रहा था , लेकिन इन दोनों राज्यों के बारे में ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया गया ।

जबकि छतीसगढ़ में भाजपा की लुटिया बुरी तरह डूबी , दोनों ही भाजपा मुख्यमंत्रियों की हाईकमान से नाराजगी की झलक चुनावों के दौरान भी दिखी थी । शिवराज सिंह तो एक बार घर बैठ गए थे , फिर चुनाव के आख़िरी दिनों में उन्होंने संघ कार्यालय जा कर मदद की गुहार लगाई थी , आखिर उन्हें ऐसा क्यों करना पडा। इस का कारण उन की ताजा सक्रियता में ढूंढा जा सकता है । शिवराजसिंह ने जनता में लोकप्रियता के भले ही झंडे गाड़े हों, पार्टी के भीतर दुश्मन कम नहीं पैदा किए । कुछ सीटों की हार का ठीकरा तो नरेंद्र सिंह तोमर पर फूटा हुआ है ।

नरेंद्र सिंह तोमर के अलावा नरोतम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय , प्रभात झा उन प्रमुख नेताओं में हैं , जो शिवराज के दोस्त से राजनीतिक दुश्मन बने हैं । राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर कमलनाथ ने समर्थन देने वाले विधायकों को तुरंत मंत्रिमंडल में शामिल नही किया तो उनकी सरकार कभी भी लुढक सकती है । कमलनाथ की समस्या यह है कि वह लोकसभा चुनाव तक अपनी सरकार की छवि बना कर रखना चाहते हैं, जबकि समर्थन देने वाले विधायक राजनीतिक कीमत वसूलना चाहते हैं ।

बताया जा रहा है कि इन सातों विधायकों के साथ भाजपा की बात हो गई थी , इसीलिए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह ने पहले दिन ही बयान दिया था कि बहुमत भाजपा के पास है । सवाल खड़ा होता है कि अगर ऐसा था तो भाजपा हाईकमान ने हरी झंडी क्यों नहीं दिखाई । मध्यप्रदेश के राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अब बजट सत्र में कमलनाथ सरकार गिरती है तो भाजपा शिवराजसिंह की बजाए नरोतम मिश्रा को मुख्यमंत्री बनाएगी । हाईकमान शिवराजसिंह चौहान को दिल्ली बुलाना चाहता है ।

लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं है , इसलिए वह मैदान में उतर कर मध्यप्रदेश में अपनी लोकप्रियता साबित कर रहे हैं । नरोतम मिश्रा काफी सक्रिय हैं और सातों विधायकों के अलावा कांग्रेस के कुछ विधायकों के भी सम्पर्क में हैं । रणनीति यह है कि गोवा की तरह तीन चार कांग्रेस विधायक इस्तीफा दे कर बहुमत साबित करने की संख्या घटा दें । दूसरी तरफ शिवराजसिंह उखाड़ पछाड की राजनीति करने के बजाए जनता के बीच कूद पड़े हैं  और जनता उन्हें हाथों हाथ ले भी रही है । वह खबरों में मुख्यमंत्री की तरह ही छाए हुए हैं , जिस से कांग्रेस में तो बेचैनी है ही, भाजपा में भी बेचैनी है ।

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