• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 09 September, 2019 07:25 AM | Total Read Count 84
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मोदी-दो सरकार के सौ दिन!

शशांक राय

नरेंद्र मोदी की दूसरी सरकार ने रविवार को एक सौ दिन पूरे किए। इस मौके पर अलग से पार्टी या सरकार ने कोई बड़ा आयोजन नहीं किया पर दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके सरकार के सौ दिन की उपलब्धियां बताईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के रोहतक में इस मौके पर एक रैली की और राज्य में चुनाव अभियान की शुरुआत की। वैसे भी सरकार जब पूर्ण बहुमत वाली है, पांच साल के लिए चुनी गई है और निरंतरता वाली है यानी पिछले पांच साल से चल रही है तो सौ दिन की उपलब्धियों का कोई मतलब नहीं होता है। लेकिन नब्बे के दशक में जब अस्थिर सरकारें बन रही थीं तब से सरकार के सौ दिन के कामकाज का लेखा जोखा करने का चलन शुरू हुआ है। इस सरकार के बारे में भी कहा जाता है कि चुनाव नतीजों से पहले ही नरेंद्र मोदी ने अधिकारियों से सौ दिन का एजेंडा बनाने को कहा था। नए बनाए गए मंत्रियों से भी सौ दिन के अंदर अपने कामकाज का एजेंडा और आगे की योजनाओं के बारे में बताने को कहा गया था। सो, इस वजह से पहले सौ दिन के कामकाज का लेखा जोखा बनता है।

नरेंद्र मोदी की दूसरी सरकार का पहला सौ दिन जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को खत्म करने और राज्य को दे केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फैसले के लिए याद किया जाएगा। यह भारत के इतिहास का एक निर्णायक क्षण था, जब अनुच्छेद 370 हटाया गया और जम्मू कश्मीर का भारत संघ में विलय मुकम्मल किया गया। पर यह एक सौ दिन के कामकाज के एजेंडे में नहीं गिना जा सकता है क्योंकि यह भारतीय जनसंघ और फिर भाजपा के 70 साल के एजेंडे का हिस्सा था। भाजपा इस निर्णायक क्षण का इंतजार और इसकी तैयारी दशकों से कर रही थी। जम्मू कश्मीर में भी इसकी तैयारी पहले से हो रही थी। अलगाववादियों की फंडिंग की एनआईए जांच और उनके खिलाफ हुई कार्रवाई इस तैयारी का हिस्सा थी। सो, यह फैसला भले सरकार बनने के 68 दिन के बाद किया गया पर यह एक लंबी योजना और तैयारी का ही विस्तार था। 

हां, पांच अगस्त को हुए फैसले के बाद पिछले एक महीने से ज्यादा समय से जम्मू कश्मीर में सरकार ने जिस तरह से नियंत्रण किया है और पाबंदियों के जरिए या सेना व अर्धसैनिक बलों की तैनाती के जरिए जिस तरह से शांति बनाई है उससे नरेंद्र मोदी की सरकार के आगे के 57 महीनों के कामकाज का अंदाजा लगता है। जम्मू कश्मीर पर फैसला और उसके बाद राज्य में लगी पाबंदियां एक झलक देती हैं कि आगे सरकार अहम मसलों पर किस तरह से फैसले करेगी उसे कैसे लागू करेगी। 

जम्मू कश्मीर के फैसले से इतर मोदी-दो की सरकार के पहले एक सौ दिन का कामकाज मिला जुला रहा है। राजनीतिक मोर्चे पर सरकार ने कमाल किया है तो आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से ठप्प या फिसड्डी साबित हुई है। सरकार बनने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल की पहले से मौजूद समितियों के अलावा दो नई समितियां बनाई थीं। उन्होंने कौशल विकास व रोजगार पर एक समिति बनाई और दूसरी विकास और निवेश पर बनाई। इससे यह उम्मीद जगी थी कि प्रधानमंत्री को आर्थिकी और रोजगार के गहराते संकट का अंदाजा है और वे गंभीरता से इससे निपटने का प्रयास करेंगे। पर अफसोस की बात है कि इन दोनों मंत्रिमंडलीय समितियों ने सौ दिन में क्या किया इसका अता पता नहीं है और इस बीच आर्थिकी और फिसलती गई। रोजगार का संकट और बढ़ता गया। कोर सेक्टर के उत्पादन में सुधार नहीं हुआ और विकास दर की गिरावट थमी। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर पांच फीसदी तक गिर गया। इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने कर से जुड़े और दूसरे मामलों में कई बजट प्रावधानों को बदला और बैंकों के विलय का एक ‘मास्टर स्ट्रोक’ चला पर इनसे कुछ भी काबू में नहीं आने वाला है। सरकार को कुछ ठोस और बड़े आर्थिक सुधार करने हैं, जिनके लिए अभी सरकार तैयार नहीं दिख रही है।

राजनीतिक मोर्चे पर सरकार के पहले सौ दिन में इसे सौ में सौ अंक दिए जा सकते हैं। इन एक सौ दिनों में सरकार ने संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष की हवा निकाल दी है। संसद का इस बार का बजट सत्र ऐतिहासिक रहा। सौ फीसदी से ज्यादा काम हुए। सरकार ने राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद तीन तलाक बिल पास कराया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दो अहम बिल पास कराए। राष्ट्रीय जांच एजेंसी, एनआईओ को ज्यादा अधिकार देने का बिल पास हुआ तो गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून, यूएपीए के संशोधन को भी पास कराया। 

इतना ही नहीं इस संशोधन के पास होने के एक महीने के अंदर इस कानून के आधार पर हाफिज सईद, मसूद अजहर, जकी उर रहमान लखवी और दाऊद इब्राहिम को आतंकवादी घोषित किया। सरकार की इच्छाशक्ति का नमूना है कि उसने नया मोटर व्हीकल कानून पास कराया और उसे लागू कर दिया। इसके तहत जुर्माने की रकम दस गुना तक बढ़ाई गई है और देश भर में इसका विरोध हो रहा है पर सरकार को इसकी परवाह नहीं है। 

पहले एक सौ दिन का आकलन केंद्रीय एजेंसियों के कामकाज को देखे बगैर पूरा नहीं होगा। केंद्रीय एजेंसियों ने एक के बाद एक नेताओं को पकड़ा है और उन्हें जेल तक पहुंचाया है। कांग्रेस के दो दिग्गज नेता पी चिदंबरम और डीके शिवकुमार जेल में बंद हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे को सीबीआई और ईडी ने जेल में डाला है। जेट एयरवेज के संस्थापक रहे नरेश गोयल केंद्रीय एजेंसियों की जांच झेल रहे हैं। भ्रष्टाचार से लड़ने के एजेंडे के तहत सरकार ने राजस्व सेवा के दर्जनों अधिकारियों की सेवा समाप्त की है। और देश के 20 से ज्यादा राज्यों में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर सीबीआई ने छापेमारी की है। इसका मकसद चाहे जो हो पर सरकार आम लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने का मैसेज देने में कामयाब रही है।

एक तथ्य यह भी है कि सरकार के पास गृह व वित्त मंत्रालय और केंद्रीय एजेंसियों के अलावा दर्जनों और भी विभाग होते हैं। सौ दिन में उनके कामकाज की कोई झलक नहीं दिखी है। न नई शिक्षा नीति का मसौदा विवादों के बाद फिर ठंडे बस्ते में चला गया है। पिछली सरकार के सबसे सफल मंत्री रहे नितिन गडकरी का मंत्रालय सड़क निर्माण से ज्यादा ट्रैफिक के जुर्माने को लेकर चर्चा में है। 

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